सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 566

५५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
में लेने से मद्यपान का दोष लगता है। कटहल खाने में मीठा लगता है, लेकिन अधिक खाने पर पेट में दर्द उठ
ब्रह्माण्ड फटने जैसा कष्ट होता है। सूर्य की पूजा करने से पुण्य लगता है लेकिन यदि कहीं बेल का पत्ता चढ़ा
दिया तो पुण्य की बात दूर उलटे पाप ही लगता है। ऐसे कर्म में ही कर्म का विधि निषेध प्रकार रहता है। कभी-
कभी गुण ही दोष बन जाता है, तो कभी-कभी दोनों ही से ढेरसारा पुण्य प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ, जिस रास्ते
पर चोर हों वहाँ प्रातःकाल स्नानकरने वाले ब्राह्मण को वह कर्म न करने दे और उसे कहीं दूर ले जाएँ तो वह
दोष ही है किन्तु गुण सिद्ध होता है। अग्निहोत्र करना गृहस्थ का गुण है, लेकिन यदि वह कोई संन्यासी करे तो
वह दोष होता है। वेदमंत्र का पठन ब्राह्मण का विहीत गुण है लेकिन वह शूद्र के लिये दोषकारक होता है।
विषय से निवृत्ति प्राप्त करने के लिये गुणदोषों के सुगम नियम बनाये गये हैं। वेद का मर्म न समझने के कारण
इसमें भ्रमिष्ट लोगों को विषय का भ्रम होता है। जब तक भ्रान्ति रहती है तब तक कर्मप्रवृत्ति रहती है। अँधेरी
रात में ही जुगनू चमकते हैं, उसी प्रकार अज्ञान स्थिति में ही गुणदोषों का महत्त्व होता है। गुणदोषों में पतन यह
अवश्य ही किसी दिन माथे पर गिरता है। इसी अर्थ का निरूपण भगवान कर रहे हैं।
समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।
औत्पत्तिकोगुणः सङ्गो न शयानः पतत्यधः ॥ १७ ॥
महार, भील, मछुआरे अपने कर्म से ही पतित हुए हैं। ऐसे पतितों को मद्यपान आदि दोषों से अधिक
पतन नहीं है। नील में डुबाये हुए काले कपड़े को काजल और अधिक क्या काला करेगा? अथवा अन्धकार
को स्याही लगाने से वह और क्या अधिक मैला होगा? उसी प्रकार जो स्वयं ही चांडाल कुल में पैदा हुआ है
उस पर किसकी छूत का असर पड़ सकता है? काजल को और अधिक काला करने की शक्ति कीट में नहीं
होती। निर्जीव को विष देने से उसे क्या दुःख होगा? उसी प्रकार पतित के लिये पातक कभी बाधक नहीं
होता। जो नीचे ही सोया है उसे गिरने का क्या भय ? उसी प्रकार जिस पर देहाभिमान का असर होता है, वह
नीच से भी अधिक नीच बन जाता है। रजंतमादि गुणों की संगत से जो विषयलंपट हो जाता है, उसे कामभोग
बुद्धि नयी नहीं लगती। जो धतूरे का बीज खाकर बकने-झकने लगता है और नाचने-गाने लगता है, उसकी
गाँठ से धन चोरी हो जाय तो उसकी उसे परवाह ही नहीं होती। उसी प्रकार जो देहाभिमान के कारण उन्मत्त
हो जाता है, अत्यन्त काम लोलुपता के कारण जो कामासक्त हो जाता है, उसे अपने स्वार्थ की होने वाली हानि
समझ में नहीं आती। जिस पर विष का असर होता है उसे सुअर की विष्टा खिलाते हैं, उसी प्रकार
विषयालोलुप पापी लोगों के लिये मैंने स्वपत्नीनिष्ठा की मर्यादा बना दी है। क्योंकि जिस पर विष का प्रभाव
रहता है, उसे उस समय सुअर की विष्ठा औषधि के रूप में देनी चाहिये ऐसा ज्ञानी लोगों का कहना है। उसी
प्रकार जब तक स्त्री और पुरुष हैं, तब तक विषयलंपट का स्वेच्छाचार वेद ने सपत्नी निष्ठा की सीमा बाँध दी
है। फिर भी वेद की आज्ञा के अनुसार, कहीं लोग अपनी स्त्री के साथ दिन-रात गमन न करें इसलिये उन्होंने
प्रतिबन्ध लगाया कि केवल ऋतुकाल में ही गमन करना चाहिये। उसमें भी यदि पुत्र का जन्म हो जाय तो
'आत्मा वै पुत्रनामासि' इस वाक्य से वेद ने स्त्रीकाम से परावृत्त किया है। विष का प्रभाव पूरी तरह समाप्त
होने पर वह सुअर की विष्ठा हाथ में भी नहीं लेता, उसी प्रकार अंतःकरण में विरक्ति उत्पन्न होने पर वे स्वस्त्री
का भी त्याग करते हैं। इस प्रकार विषय की निवृत्ति ही वेद में बतायी गयी है। वह वेदोक्ति गुणदोष दिखाकर
विषय पर से आसक्ति हटा देती है।