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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 869 में से

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पृष्ठ 571

इक्कीसवाँ अध्याय ५५५
न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।
उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८॥
तुमने वेद के रहस्य का मर्म पूछा था, इसलिये उसकी गुह्य बातें मैंने तुम्हें बतायीं। वेद के ये विभाग सुनकर
उद्धव को अत्यन्त आनन्द हुआ। इससे सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने उद्धव को, 'हे अंग' कहकर सम्बोधित किया।
जो सकाम होते हैं उनकी काम पर आसक्ति होने के कारण, वे सबके हृदय में रहने वाले मुझ परमात्मा को नहीं
पहचानते। मैं हृदय में अवश्य रहता हूँ लेकिन इतने से मैं एकदेशी नहीं हो जाता। जिस प्रकार समुद्र लहरों के रूप
में प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार मैं जगदाकार के रूप में प्रतीत होता हूँ। अलंकार का रूप लेने पर भी जैसे वह
शुद्ध सुवर्ण ही होता है, उसी प्रकार मैं श्रीकृष्ण संसार के आकार की परिपूर्णता से पूर्ण ही हूँ। नाम, रूप अथवा
अनेक वर्ण अथवा यह संसार इस प्रकार का जो बोध है वह मेरे ही ज्ञानप्रकाश के कारण होता है। फिर भी
नामरूप अथवा जातिभेद आदि का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है। आकाश भले ही जल में डूबा हुआ दिखायी दे
लेकिन वह जल से गीला नहीं होता। उसी प्रकार मैं भी संसार के आकार का होते हुए भी उसके दोषों से अलिप्त
रहता हूँ। मेरे जैसा विश्वात्मा और विश्वंभर, विश्वमूर्ति और विश्वेश्वर होते हुए भी शिश्नोदर परायण अज्ञानी
लोग मुझे नहीं पहचानते। जिसकी आँखों के आगे अँधेरा छाया रहता है अथवा जो भयानक गुफा में फँस जाता
उसे अगला या पिछला कुछ नहीं दिखायी देता और वह अकस्मात गड्ढे में गिर पड़ता है। उसी प्रकार मोह ममता
की भ्रान्ति से, अज्ञानरूपी निद्रा में अंतर्बाह्य व्याप्त होकर मैं निकट होते हुए भी वे मुझे नहीं देखते और अज्ञान की
विशाल गर्त में जा गिरते हैं। मेरे वेद का अर्थ न समझने के कारण जो पूरी तरह कामासक्त हो जाते हैं वे मैं निकट
में रहते हुए भी मुझे नहीं पहचानते और अपना अधःपतन करा लेते हैं। तो मैं निकट किस प्रकार हूँ यह पूछोगे तो
ज्ञान का प्रकाश देने वाला मैं सबके हृदय में रात दिन वास करता हूँ। मेरे वेद का वास्तविक अर्थ कामासक्तों की
समझ में नहीं आता। उसी सम्बन्ध में स्वयं श्रीकृष्ण स्पष्टीकरण दे रहे हैं।
ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मकाः।
हिंसायां यदि रागः स्याद् यज्ञ एव न चोदना॥ २९॥
मेरे वेद का भाव अगम्य है। उसका गूढ़ार्थ न समझने के कारण सकाम पुरुष बड़े उत्साह से स्वर्ग को ही
सत्य मान लेते हैं। वेद ने स्वर्ग का उल्लेख केवल रुचि उत्पन्न करने के लिये किया है; लेकिन वही उसका
वास्तविक अर्थ समझ कर कामालुब्ध लोग अनेक प्रकार के स्वर्गादिक साधनों का प्रयोग बड़े उत्साह से करने
लगते हैं। उसमें स्वयं मांस भक्षण करने के लिये यज्ञ का बहाना करते हैं। उनकी दृढ़ प्रवृत्ति अपनी इच्छा पूरी
होने के प्रति ही होने के कारण अविधि से ही पशु की हत्या करते हैं। ऐसे लोगों की हत्या तो उन्होंने मारे हुए
पशु ही करते हैं। हाथ में लपलपाती तलवारें लेकर, बदला लेने के लिये वे यम के द्वार पर खड़े रहते हैं। उन्हें
स्वर्गसुख कैसा ? पेटभर मांस खाने के लिये स्वेच्छा से पशु मारने पर नियंत्रण लगाने के लिये वेद ने केवल यज्ञ
के लिये पशु का हनन करने की अनुमति दी है। उसमें भी देश, काल, वर्तमान, मंत्र, विधि, विधान और सारे
द्रव्य शुद्ध हों ऐसा भी प्रतिबन्ध लगा दिया है और कर्ता भी सशक्त हो, ज्ञानसम्पन्न और श्रीमान हो क्योंकि मुट्ठी
के प्रहार से पशु को मारते समय यदि 'में' 'में' ऐसा शब्द पशु ने निकाला तो उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता है।
वेद में अनेक कठिन प्रायश्चित्त बताये गये हैं। फिर भी महामूर्ख सकाम लोग पशु मारने के लिये तत्पर रहते हैं।
इस प्रकार पशु को मारने के बाद अपने हिस्से में जितना आये उतना ही मांस भक्षण करना चाहिये। वह भी इस