श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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तरह खाना चाहिये कि दाँत न लगे। इस प्रकार अपना हिस्सा खाते समय यदि कोई स्वाद लेता है तो उसे भी
प्रायश्चित्त लेना पड़ेगा ऐसा निर्देश भी वेद ने दिया है। सारांश, मांसभक्षण करने की वेद की आज्ञा नहीं है,
बल्कि मांसभक्षण की निवृत्ति करने के लिये ही यज्ञ का विधान लगा दिया है। अपनी इच्छा से पशु न मारें
इसलिये यज्ञ में पशु मारने का नियम बना दिया गया है और मांसभक्षण न करें इसलिये यज्ञ के भाग को निश्चित
कर दिया है। लेकिन वेद का यह नियम भी मूर्खों की लालच पर नियंत्रण करने के लिये है। वास्तव में, पशु
हिंसा करना और मांस भक्षण भी न करना यही वेद का सच्चा गुह्य है।
हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया।
यजन्ते देवता यज्ञैः पितृभूतपतीन् खलाः ॥ ३०॥
वेदोक्त विधि की परवाह न कर जो लोग पशु हत्या का खेल खेलते हैं, वे अविधि से पशु वध कर याज्ञिक
होने की शेखी बघारते हैं। अविधि से प्राण लेकर उस पशु से यज्ञ करते हैं; और फिर निश्चिंत होकर पितृ-देव-
भूतगण इन सबको हविर्भाग देते हैं। खोखला बीज यदि खेत में डालें तो फसल से हाथ धोना पड़ेगा। बीज तो
नष्ट होगा ही सरकार का लगान अलग से देना पड़ेगा। अविधि से यज्ञ करने वालों की यही गति होती है। स्वर्ग
तो स्वप्न में भी नहीं दिखायी देता, लेकिन यह नरदेह छूट जाता है और अन्त में यमयातना के दुःख भोगने पड़ते
हैं। पशुओं को व्यर्थ ही दुःख देते हैं और स्वयं भी दुःखी होते हैं। इस प्रकार याज्ञिकों की गति विलक्षण हो जाती
है। उसी के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।
आशिषो हृदि संकल्प्य त्यजन्त्यर्थान् यथा वणिक् ॥ ३१॥
स्वप्न दिखायी देता है और तत्काल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार संसार कल्पना में ही दिखायी देता है।
कामना से पगलाये सकाम पुरुष स्वर्ग को सत्य समझ बैठते हैं। मृगजल बिलकुल मिथ्या है, उसके शीतल जल
के लिये बालक हठ करे उसी प्रकार सकाम पुरुष स्वर्ग का हठ कर बैठते हैं। 'पीपल पर से मार्ग है' यह सुनकर
जो उस वृक्ष पर चढ़ने लगता है और भ्रमजल में फँस जाता है, उसी प्रकार स्वर्ग का वैभव सुनकर सकाम की
गति होती है। मनुष्य स्वधर्म के मार्ग पर चले इसलिये वेद स्वर्ग का एक गौण फल दिखलाता है; लेकिन सकाम
पुरुष भ्रम में उसी स्वर्ग के पीछे दौड़ते हैं। 'पीपल पर से रास्ता है' सुनकर बुद्धिमान पुरुष उस मार्ग की ओर
ध्यान देकर चलता है और पीपल की परिक्रमा कर आनन्दपूर्वक अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचता है। इस प्रकार
जो स्वधर्म के अनुष्ठान में स्वर्ग के फलों की उपेक्षा करता है, उसका चित्त शुद्ध होकर वह स्वयं ब्रह्मसमाधान
प्राप्त करता है। उस स्वधर्म मार्ग को छोड़कर सकाम पुरुष सुनने में मधुर लगने वाले स्वर्गसुख के पीछे दौड़
पड़ते हैं। मृग घंटानाद के भुलावे में आ जाते हैं। उसी प्रकार कर्मभूमि में जन्म लेकर धन, धान्य आदि खर्च कर
स्वर्ग सुख के मोह में अनायास प्राप्त हुए नरदेह को व्यर्थ ही खो देते हैं। जिस प्रकार कोई वणिक, दूसरे द्वीप में
जाने से अधिक लाभ होगा यह सुनकर पुराना जहाज लेकर समुद्र में प्रवेश करता है और उन्मत्त खलासी के
कहने पर टूटी-फूटी नौका के साथ समुद्र में डूब जाता है, वैसी ही गति सकामों की होती है। बेचारे स्वर्ग की
इच्छा मन में दबाकर संसार सागर में डूब जाते हैं। स्वर्गसुख की इच्छा करने से स्वधर्मरूपी सारा धन डूब जाता
है, चित्तशुद्धि का मूल ही नष्ट होकर नरदेहरूपी मूलधन भी नष्ट हो जाता है। इतनी हानि का कारण भगवान यह
बताते हैं कि सकाम्यता के मूल त्रिगुण हैं जिनके विशेष लक्षण वे बताते हैं।