श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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नहीं दिखायी देता, इसलिये पग-पग पर आत्मघात होता रहता है। जड़-मूढ़ होकर वह बेसुध की तरह स्तब्ध हो
जाता है और अज्ञान के कारण मन मसोसता रहता है। इस प्रकार न ठीक तरह से सजीव और न ठीक तरह से
निर्जीव, इस प्रकार मूढ़ होकर रहता है, और प्राप्त लाभ से वंचित होकर व्यर्थ का अनर्थ भोगता है।
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।
वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्वसन्॥ २२॥
इस प्रकार विषय की आसक्ति के कारण जब तमोगुण वृत्ति को ग्रस लेता है तब किसी भी बात का
स्मरण नहीं रहता। मैं कौन हूँ, इसका भी स्मरण नहीं रहता। दारू पीने पर जिस प्रकार मनुष्य बदहवास हो
जाता है और उसके स्मरण का विस्मरण होकर मन में भ्रम उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मनुष्य भ्रम के जाल में
फँसा हुआ है। अथवा विषमज्वर में मनुष्य चाहे जैसी बातें करने लगता है, उसे अपना और पराया भी याद
नहीं रहता, व्यर्थ की बकवास करता रहता है। चित्त भ्रमित होने के कारण उसे किसी भी बात का ठीक से
स्मरण नहीं होता। इस प्रकार प्राणी संकट भोगता रहता है अथवा शरीर में भूतसंचार होने पर वह हुँः हुंः करता
रहता है और भ्रम के कारण स्वयं को श्वान समझ कर भूँकने लगता है। इसी प्रकार सोया हुआ व्यक्ति अपना
अस्तित्व भूलकर जैसे स्वप्न में घबरा रहा हो और कह रहा हो, मैं रण में फँस गया हूँ, वैसे ही ये सारे प्राणी
मोह में फँसे हुए हैं। ऐसी झूठी भूलभुलैया में फँस कर प्राणी काम के मोह में व्याप्त हो गये हैं। जड़मूढ़ होकर
अन्तःकरण में पागल हो गये हैं। बकरी के नाक में कीड़ा घुस जाये तो वह घबरा कर खें-खें करके अपनी
व्यथा प्रकट करती है। उसी प्रकार दुःख के आवेश में प्राणी विह्वल हो जाते हैं और सन्मार्ग न मालूम होने के
कारण मोहमद में भूलकर मूक होकर विह्वल होते रहते हैं। अहंकार के बल से शरीर में वायु भर जाती है और
वही बाधक होकर वे पिछले रास्ते से चलकर गहरे कुएँ में गिर पड़ते हैं। तेली का बैल जिस प्रकार आँख पर
बँधी पट्टी के साथ चलता जाता है, उसका रास्ता कभी खत्म नहीं होता। जल्दी-जल्दी अपने चारों ओर घूमता
जाता है लेकिन उस घूमने का कोई अंत नहीं होता। घान का चक्कर लगाते-लगाते उसे चक्कर आने लगता है।
उसी प्रकार विषय निरन्तर चलने वाला संसारचक्र है। किन्तु विधि की माया समझ में नहीं आती। सर्प पगलाता
है तो जिस प्रकार भागता फिरता है, उसी प्रकार सारे विषय भागते रहते हैं। अमावस्या के अन्धकार की तरह
वह जड़ मूढ़ और स्तब्ध हो जाता है। उसे अपने और पराये का भान नहीं रहता। सारे संसार में अन्धकार फैल
जाता है। लोहार के भाते की तरह साँसे अवश्य चलती रहती हैं। जिस प्रकार वृक्ष तटस्थ खड़े रहते हैं, उसी
प्रकार वे भी न ठीक से जीवित, न ठीक तरह से मरी हुई स्थिति में खड़े रहते हैं। अब तुम कहोगे कि सकाम
कर्म करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है ऐसा वेद में बताया गया है, लेकिन यह भी लालची लोगों का ही
कहना है। तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
फलश्रुतिरियं नृणां न श्रेयो रोचनं परम्।
श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम्॥ २३॥
मूर्ख लोग निष्काम कर्म कभी नहीं करते, इसलिये उन्हें फलश्रुति दिखला कर स्वकर्म के लिये प्रवृत्त किया
है। सकाम कर्म करने की और निष्काम कर्म करने की प्रक्रिया एक जैसी ही होती है लेकिन दोनों के फल का
उद्देश्य अलग-अलग होता है। स्वाती का जल सीप में गिरता है तो मोती बन जाता है लेकिन वही जल यदि सर्प
प्राशन करे तो वह विष बन जाता है। उसी प्रकार निष्काम कर्म मुक्ति दिलाता है तो सकाम कर्म दृढ़बन्धन में