श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 569, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय ५५३
फँसाता है। वेद ने स्वर्ग का जो फल बताया है वह मुख्य नहीं है। जिस प्रकार वैद्य बच्चे को दवा खाने के लिये
गुड़ का लालच दिखाता है, उसी प्रकार यह स्वर्ग भी एक लालच ही है। औषधि खाने से क्षयरोग दूर हो जाता
है, लेकिन बच्चा गुड़ चाटता रहता है। उसी प्रकार वेद का हृद्गत यह है कि स्वर्गफल की आशा दिला कर मूर्खों
को मुक्त करने के लिये स्वधर्माचरण कराना। तुम कहोगे, कर्मवादी लोग वेद को प्रवृत्तिपरक कहते हैं, उसी वेद
को निवृत्तिपरक कैसे माना जाय ? इसका उत्तर यह है कि श्रुति का अर्थ यदि प्रवृत्तिपरक होता तो वेद अनर्थकारी
सिद्ध होता है। इसलिये उस प्रवृत्ति को ही दोष देकर श्रीकृष्ण वेद का अर्थ निवृत्तिपरक है इसका स्पष्टीकरण
करते हैं।
उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।
आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु ॥ २४॥
न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।
कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः ॥ २५॥
जन्म लेते ही प्राणिमात्र को अपना देह अच्छा लगने लगता है। 'मैं ही देह हूँ' यह मानकर वह जीवभाव से
विषय पर लुब्ध रहता है। विषय की आसक्ति के कारण मन में स्त्री पुत्रों के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है। स्वजनों पर
और धन पर अत्यन्त प्रेम जागृत होता है। वह स्वाभाविक स्थिति अनिवार्य रहती है। जिसके कारण अधोगति को
जाना पड़ता है, वह कामासक्ति प्राणियों को नैसर्गिक ही रहती है। वही विषय की प्रवृत्ति यदि वेद विधिपूर्वक
बताये तो वह वेदवाणी सबको डुबोने वाली अर्थात् महाअनर्थकारी होगी। मरने वाले को चाबुक की मार दी
जाय, डूबने वाले के मस्तक पर पत्थर मारा जाय अथवा अन्धे को कुएँ में ढकेला जाय, उसी प्रकार वेद भी
अनर्थकारक होगा। वेद ही यदि विषयों में लिप्त करने लगे तो प्राणियों को और कौन छुड़ाएगा ? राजा ही अगर
सर्वस्व लूट ले तो गरीबों को कौन मुक्त करेगा ? वेद का अर्थ समझे बिना जो स्वयं ही विषयासक्त हो जाता है,
वह श्रुति के अर्थ को प्रवृत्तिपरक ही मानता है और इसीलिये वह मूर्खों के लिये अनर्थकारी होता है। ग्रहण के
समय पुत्र ने पिता से कहा, सुबह बनी हुई खीर खा लें। तिस पर बाप ने कहा, ग्रहण छूटने पर हम हमारे घर में
बना ताजा खाना ही खाएंगे। वैसा ही मेरा वेद कहता है। निषेध मुख से प्रवृत्ति दिखा दी है। सारांश, विषय की
निवृत्ति यही वेद का मनोगत है। विषयों में डूबने वालों के लिये ही मेरी वेदवाणी है, जो उनका उद्धार करती है।
वह सकाम नहीं है। किन्तु जो मंदबुद्धि के लोग हैं, वे पूर्णतयः विषयांध होते हैं। वही लोग वेद के सकाम होने
की रट लगाते हैं। उनकी दुर्बुद्धि के बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं।
एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः।
फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि ॥ २६॥
सकाम लोग फल की इच्छा छोड़कर स्वधर्माचरण कभी नहीं करते, इसलिये स्वधर्म की ओर प्रवृत्ति होने
के लिये वेद ने फलश्रुति बतायी है। नमक जब समुद्र से मिलने जाता है तो उसका खारापन समाप्त हो जाता है,
उसी प्रकार स्वधर्म की ओर प्रवृत्ति होने पर उसकी सकामता रहती ही नहीं। दो बातियों को मिलाकर यदि एक
बाती कर दी जाय तो जिस प्रकार उनमें कोई भेद नहीं दिखायी देता, कपूर अग्नि में मिल जाने पर वह भी अग्नि
ही हो जाता है, उसी प्रकार स्वधर्म कर्म का आचरण करने पर अपने आप ही निष्कर्मता प्रकट होती है। कर्माकर्म