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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 869 में से

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पृष्ठ 548

५३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। अब यह श्रेष्ठ किन्तु कठिन साधन जिससे नहीं होगा, उसका मन निश्चल होने के
लिये भगवन् एक अन्य साधन बताते हैं।
निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः।
मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया॥ २३॥
जन्म-मरण के भयंकर भँवर में गोते लगाते हुए साधक वैराग्य से अत्यन्त संतप्त होता है इसलिये विष
मिलाये हुए पकवान की तरह उसे विषय में विरक्ति प्राप्त होती है। खुशबूदार अमृतफल हो और उस पर सर्प
जहर उगल दे, उसी प्रकार सभी विषयों में उसे अत्यन्त बाधा दिखाई देती है। ऐसे विवेक से जो विवेकशील
हुआ है; साथ ही श्रद्धायुक्त गुरुभक्त, गुरु ने बताया हुआ अर्थ जो हृदय से नहीं भूलता, गुरु के उपदेश को सदा
हृदय में धारण करता है और मन में जिस अर्थ का विचार किया है उसी अर्थ का पुनः पुनः मनन करता है।
प्रत्यगात्मा का अखण्ड चिन्तन करने से मन संकल्प विकल्प छोड़ देता है। फिर वह स्वयं देहाभिमान छोड़ कर
स्वयं ब्रह्मसम्पन्न हो जाता है। ऐसे ब्रह्मसम्पन्न होने पर मन स्वरूप में लीन हो जाता है। इस एक उपाय को भी
ध्यान में रखो। लेकिन यदि यह भी न हो सके तो एक और उपाय बताता हूँ, सुनो।
यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया।
ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मनः॥ २४॥
सारे विषय भोग छोड़कर यमनियमों के साथ योगमार्ग का आश्रय करें। अच्छी तरह आसन पर बैठकर
(गुदस्थान की ओर के) 'मूलाधार' चक्र पर दृष्टि केन्द्रित कर मुद्रा साधें। उस समय अपानवायु ऊर्ध्वमुख से
(लिंगस्थान की ओर के) 'स्वाधिष्ठान' चक्र तक पहुँचने तक बढ़ता जाता है और प्राणवायु प्राणायाम से अटक
कर पुनः नाभिस्थान की ओर लौट जाता है। तब प्राण और अपान ये दोनों जब सम हो जाते हैं तो स्वयं वायु
शरीर का मलक्षालन कर पिण्ड ब्रह्माण्ड की शुद्धि करती है। कफ और पित्त दोनों को खाकर नाड़ी का शोधन
कराती है। पुराने मल संचित रहते हैं, उन्हें भी तत्काल नष्ट कर डालता है। वायु का सामर्थ्य बहुत अधिक और
विलक्षण है। वह पिण्डों के और ब्रह्माण्ड के सारे मल साफ कर निर्मल कर देता है। इतनी पवित्रता केवल इस
महायोग से होती है। लेकिन उस समय अनेक रोग प्रकट हो जाते हैं। बड़े-बड़े विघ्न आ जाते हैं। नाना विकल्प
मन में उभरते हैं और सिद्धियों को लूटना चाहते हैं। उद्धव! इतने विघ्न सिर पर आ जाए तो साधक यदि धैर्य
नहीं खोता, तभी प्राणापान सम होगा यह ध्यान में रखो। प्राणापान का मिलन होने पर 'कुण्डलिनी' शक्ति जागृत
होती है और वह उन प्राणापान को लेकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है। वह असाधारण आदि शक्ति पश्चिम
का बड़ा घाट (मेरुदण्ड) चढ़ने लगती है। वहाँ के षडचक्रों का कोलाहल समाप्त कर वायु पहले से ही उसका
मार्ग समतल कर देती है। उस मार्ग से जब कुण्डलिनी जाने लगती है तो आधिव्याधि की लहरें बंद हो जाती हैं।
विकल्प की राहें बन्द हो जाती हैं और बड़े-बड़े विघ्नों की झड़ी भी बाधा नहीं पहुँचाती। उल्हाट शक्ति की बाट
लाँघ कर आगे बढ़ने पर ब्रह्मरन्ध्र का द्वार खुलता है और सहस्रदल कमलों में से अत्यन्त शुद्ध और मधुर
चन्द्रामृत के झरने बहने लगते हैं। कुण्डलिनी बाला उसका प्राशन कर, सन्तोष से गरल निकाल देती है। इससे
शरीर पर तेज उभरने लगता है जिससे देहभाव बदलने लगता है। कला शरीराकार में उलीची जाने के कारण
उसका शरीर अत्यन्त सोज्ज्वल दिखायी देने लगता है इतना कि वह ब्रह्मरस का पुतला प्रतीत होने लगता है या
कि जैसे ब्रह्मसुख की कली खिली हो। उसके अवयवों का क्या वर्णन किया जाय? जीव का जीवन खिल जाए