श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 559, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय ५४३
अपने गौरव के लिये प्रेमादर से वेद के विभाग जिसमें बताये वह एकादश स्कंध का बीसवाँ अध्याय उद्धव को
उत्तम रीति से बताया। इससे भक्त और ज्ञानी इन दोनों को वेदार्थ की पहचान हुई; लेकिन कर्मठ ये गुण दोष
देखने के कारण सन्देह में पड़ गये। उस सन्देह का निवारण करने के लिये इक्कीसवें अध्याय का निरूपण कर
गुणदोषों का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। गुणदोषों का प्रकार बताकर श्रीकृष्ण विषय का त्याग करने के
लिये विस्तृत उपायों का निरूपण कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
य एतान्मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान् ।
क्षुद्रान्कामांश्चलैः प्राणैर्जुषन्तःसंसरन्ति ते॥१॥
भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग ये तीन विभाग जो मैंने बताये, वे शुद्ध वेदमार्ग हैं। उन्हें छोड़कर जो भी लोग
विषयसुख की इच्छा करते हैं, देह का सम्बन्ध क्षणभंगुर है यह पूरी तरह भूल कर सांसारिक तथा स्वर्ग के
सुखोपभोग प्राप्त करने के लिये लोभी सकाम कर्म की जल्दीबाजी करते हैं। चंचल प्राण की संगत से काल देह
को ग्रसता ही रहता है। ऐसा होते हुए मूर्ख लोग इस लोक के अनेक प्रकार के विषयोपभोगों में तथा उसके
प्रयासों में ही सुख मानते हैं। कामभोगों का भोग करते समय काल जीवन को ग्रसता रहता है यह समझ ही नहीं
पाते; जन्म-मरण के फेरे में दुःख के आवेग सहते रहते हैं। काम्यकर्म और नित्यकर्म आचरण करते समय एक
जैसे लगते हैं, फिर उनके फल में उसका विषमत्त्व अर्थात् अच्छे और बुरे परिणाम क्यों होते हैं? तो यह
कर्मवैचित्र्य की बात संकल्प के कारण ही होती है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।
विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्चयः ॥२॥
वैसे विचार किया जाय तो सारे कर्म एक जैसे ही हैं। लेकिन उनके अधिकार भिन्न-भिन्न होते हैं। उनके
ही कारण सुख और दुःख भोगना पड़ता है। भोजन करना मुँह का काम है वह यदि नाक से करने लगे तो सुख
के स्थान पर भयंकर दुःख का सामना करना पड़ेगा। पैरों से चलने का काम यदि सिर से करें तो रास्ता तो
कटेगा नहीं लेकिन अनेक कष्ट भोगने पड़ेंगे। उसी प्रकार अधिकार के अनुसार जो कर्म निश्चय ही सुखमय है,
वही कर्म अनधिकार से करने पर दुःसह-दुःख भोगना पड़ेगा। हाथी के हौदे से गधे का गौरव नहीं बढ़ेगा, वह
तो उसके बोझ से मर ही जायेगा। उसी प्रकार अनधिकार किये हुए कर्म की गति है। मेघ निर्मल जल की ही
वृष्टि करता है, लेकिन जिस प्रकार बिजली कड़कती है उसी प्रकार फल मिलता है। किसी प्रदेश में केवल
भाँग तैयार होती है, तो दूसरे प्रदेश में केले उत्पन्न होते हैं। दूध कितना ही उत्तम क्यों न हो वह ज्वर के रोगी
को कड़वा लगेगा लेकिन स्वस्थ व्यक्ति को मधुर लगेगा और पीने से स्वास्थ्य बनता है। उसी प्रकार इच्छा
रखकर किया हुआ कर्म अत्यन्त बाधक सिद्ध होता है। वही कर्म निष्काम बुद्धि से करने पर मोक्षप्राप्ति का
साधन बनता है। अपने अधिकार के अनुसार कर्माचरण करना यही यहाँ पर प्रमुख गुण है और अनधिकार
किया हुआ कर्म यहाँ अवगुण अर्थात् महादोष है। इस प्रकार कर्माचरण गुण और दोष उत्पन्न करता है और
शास्त्र के ज्ञाता इसी गुणदोष का लक्षण बताते हैं। यही गुणदोष लक्षण शुद्ध-अशुद्ध का कारण है। इसी अर्थ का
निवेदन भगवान करते हैं।