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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 869 में से

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पृष्ठ 553

बीसवाँ अध्याय ५३७
प्रीति के लिये वह अपना घरबार, स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति और धन धान्य खर्च कर देता है। अपने प्राण तक देने से वह
पीछे नहीं हटता। इस प्रकार सदासर्वदा उसका अनन्य भजन चलता रहता है। मेरे भजन पर उनका कुछ विशेष
ही प्रेम रहता है। वह दिन-रात मेरा स्मरण करना नहीं छोड़ता। उसे विस्मरण ही नहीं होता। उससे क्या फल
प्राप्त होता है, उसे श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मासकृन्मुनेः।
कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते ॥ २९ ॥
मेरी निज भक्ति के बारे में मैंने पहले तुम्हें जो बताया था, उसी पद्धति से वे भक्त अत्यन्त प्रेम से मेरा यजन
करते हैं। क्षण-क्षण, पल-पल बिना भूले, मेरा स्मरण करते एकनिष्ठा से मेरा भजन कर स्वयं को मदर्पण कर
'मैं' बन जाते हैं। दिन प्रतिदिन प्रतियोगिता की तरह उसका प्रेम बढ़ता ही जाता है। नित्य नया स्वाद मिलने के
कारण प्रेम से, बार-बार वही भजन करते रहते हैं। भजन की पुनरावृत्ति से वह कभी नहीं ऊबता, बल्कि हर्ष
होने के कारण भजन में उसे उल्हास ही होता है। मुझे अपने हृदय में बिठा कर भजन से मनःपूर्वक प्रेम हो तो
जिस प्रकार सूर्य के सामना जुगनू निस्तेज होता है उसी प्रकार सारी इच्छायें निस्तेज हो जाती हैं। सिंह को देखने
पर मदमस्त हाथी जिस प्रकार बेतहाशा भाग खड़ा होता है, उसी प्रकार मैं परमात्मा के प्रकट होते ही हृदय से
सारी विषयेच्छाएँ भाग जाती हैं। लेकिन 'मैं प्रकट हुआ' यह कहना शायद ठीक नहीं होगा क्योंकि मेरे बिना जब
कोई स्थान है ही नहीं तो 'मैं प्रकट हुआ' यह कौन कहेगा? क्योंकि उद्धव! मैं सचमुच ही सदा हृदय में ही
रहता हूँ। भक्तों की भ्रान्ति दूर होते ही मैं स्वाभाविक रूप से प्रकट ही हूँ, यह ध्यान में रखो। भक्त मेरी भक्ति कर
अपनी भ्रान्ति दूर कर देते हैं। तब मैं श्रीकृष्ण स्वयंभू वहाँ प्रकट ही हूँ। मेरे हृदय में प्रकट होते ही भक्तों को
अलभ्य लाभ प्राप्त होता है और संसाररूपी संकट दूर होता है। उसी बात को सविस्तार बता रहा हूँ।
भिद्यंते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ॥ ३० ॥
उद्धव! मैं जिससे हृदय से मिलता हूँ, तो कहीं एक स्थान पर एकत्र नहीं रहता बल्कि सर्वात्मा सर्वरूपों में
ही प्रकट होता हूँ। मेरा स्वरूप लघुकाय नहीं है। इस प्रकार जब मैं प्रकट होता हूँ तो संसार दिखायी ही नहीं
देता। गुणों के साथ भेद का त्रिकुट विलीन हो जाता है और भवभय तत्काल भाग जाता है। सूर्य के किरण
निकलते ही घृत का कड़ापन समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार मुझ नारायण के प्रकट होते ही लिंगदेह नष्ट हो
जाता है। हवा के झोंके से जिस प्रकार चारों ओर का धुँधलका उड़ जाता है, उसी प्रकार मेरे स्वप्रकाश के सामने
वासना का जाल समूल नष्ट हो जाता है। वासना का समूल उच्चाटन होते ही, जीवप्राण के साथ संशय नष्ट हो
जाता है। तब जिस प्रकार सूर्य के सामने अँधेरा नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार कर्म का भी क्षय हो जाता है। उसी
प्रकार अपने कार्य के साथ गुणों का भी नाश हो जाता है, अज्ञान के साथ अविद्या नष्ट होती है, शिवत्व के साथ
जीव का नाश होता है और चिदचिद् ग्रन्थि के साथ अहंकार का भी नाश होता है। तब 'सोहं हंस' का क्षालन
अपने आप हो जाता है यह ध्यान में रखो। जन्म-मरण भय से ही भाग जाता है और संसारबाधा समाप्त हो जाती
है। इस प्रकार भक्त गण भक्तियोग से मेरा भजन करते हैं और ऐसे निजभजन से ही समाधान पाते हैं। इस प्रकार
भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग इन तीनों योगों के भेद मैंने तुम्हें बताये। मेरी प्राप्ति का यही सबसे उत्तम मार्ग है। इसमें
विशेष रूप से मेरी भक्ति ही श्रेष्ठ है। वह किसी की सहायता की अथवा किसी साथी की अपेक्षा नहीं करती।