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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 869 में से

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पृष्ठ 544

५२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडं वनस्पतिम्।
खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पटः ॥ १५॥
किसी वृक्ष की चोटी पर कोई पक्षी घोंसला बना कर रहता है और कोई निर्दय व्यक्ति उस वृक्ष की जड़
काटने लगता है। यदि वह पक्षी यह देखकर अपने घोंसले से पलायन करता है तभी उसका कल्याण होता है।
यदि वह वहीं रह गया तो उसकी मृत्यु निश्चित है। उस वृक्ष की ही तरह देह का मरण भी अटल है, उसमें जीव
रहता है तो उसे भयंकर दुःख भोगना पड़ता है, वह कभी नहीं टलता।
अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः।
मुक्तसङ्गः परं बुद्ध्वा निरीह उपशाम्यति ॥ १६ ॥
रात-दिन आयु कम होती रहती है। कलिकाल का वेग तो भयंकर रहता है। यह एक नित्य नया रोग शरीर
में लगा हुआ है। काल कालमान के अनुसार आयु का क्षय करता रहता है। इसी में आयुष्य का विनाश होता है,
यह ध्यान में रखकर और नरदेह का कभी भी पतन होगा यह जानकर जो घरबार के प्रति उदासीन होता है वह
देह की क्षणभंगुरता जानकर देहाभिमान छोड़कर भक्तिज्ञान प्राप्त करने के प्रति अत्यन्त जागृत रहता है। यदि
देहाभिमान नहीं छोड़ा तो मृत्यु कभी भी शरीर पर आक्रमण करेगा इस भय से उसका शरीर काँप उठता है और
वह पूर्ण वैराग्य धारण करता है। वैराग्ययुक्त भक्ति करने से देहाभिमान की निवृत्ति होती है। तब ज्ञान सम्पत्ति घर
में प्रवेश करती है और चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़ती हैं। इस प्रकार निजात्मप्राप्ति होने पर प्रवृत्ति अपने
आप रुक जाती है और निवृत्ति की भी निवृत्ति हो जाती है और फिर संसार की अपने आप शान्ति हो जाती है।
इस प्रकार नरदेह प्राप्त कर अनेक लोगों ने आत्मानंदसुख प्राप्त किया। ऐसा होते हुए मूर्ख लोग अपना सुख नहीं
साधते, उसकी श्रीकृष्ण निंदा कर रहे हैं।
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ॥ १७॥
चौरासी लाख जीवयोनी हैं। इसमें मनुष्य देह के सिवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का कोई अधिकारी नहीं है।
नरदेह से मेरी प्राप्ति होती है इसलिये देह को 'आद्य' कहा गया है। इसकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। बड़े भाग्य
से नरदेह प्राप्त होता है। सुदृढ़ अर्थात् सभी अवयवों से युक्त, कहीं कोई व्यंग्य नहीं, न बहरा, न अन्धा, न पंगु,
न गूँगा, इस प्रकार सर्वांग से सम्पूर्ण और यह सब भरतखण्ड में प्राप्त होना, अत्यन्त भाग्य का लक्षण है और
तिस पर यदि अंतःकरण में परमार्थ के बारे में विवेक है तो मैं परमात्मा उसका आज्ञाधारक बन जाता हूँ। जब
स्वयं मैं ही उसका आज्ञाधारक हूँ तो बाकी देवताओं और मनुष्यों की क्या बिसात है ? लेकिन यह नरदेह पुनः
प्राप्त नहीं होगा। पुण्य और पाप का पलड़ा जब बराबर रहता है तभी नरदेह प्राप्त होता है, यह ध्यान में रखो।
ऐसा नरदेह ही पुनः मिलेगा यह नाप कर कोई कर्माचरण नहीं कर सकता। पुण्य अधिक हो जाय तो स्वर्ग
भोगना आवश्यक हो जाता है और पापों का पलड़ा भारी हो जाय तो नरक भोगना पड़ता है। इस प्रकार कर्म
की गति अत्यन्त गहन है। उसमें काकतालीय न्याय से ही संसाररूपी भवसागर पार करने के लिये नरदेहरूपी
जहाज अपने भाग्य से मिलता है। 'सुलभ' अर्थात् अविकल, और 'सुकल्प' अर्थात् विचारशील को उस पार ले
जाने वाला नाविक केवल गुरु ही है। गुरु मंत्र कान में देता है इसलिये उसे 'कर्णधार' कहते हैं। भक्तों का
उद्धार कान पकड़कर करने के कारण गुरु सभी दृष्टियों से 'कर्णधार' है। संसाररूपी सागर में नरदेह ही जहाज