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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 557, कुल 869 में से

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पृष्ठ 557

बीसवाँ अध्याय ५४१
जहाँ जन्म नहीं है और मरण भी नहीं है, उस परब्रह्म तक वे पहुँचते हैं। जहाँ ध्येय नहीं, ध्यान नहीं, जहाँ ज्ञेय
नहीं है, ज्ञान नहीं है; जहाँ 'मैं' और 'तू' का वाद नहीं है उसी परिपूर्ण ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। जिसे माँ नहीं
और बाप भी नहीं; जो देव भी नहीं है और देवता भी नहीं है; जो एक भी नहीं है और अनेक भी नहीं है, उस
परब्रह्म तक ही वे सचमुच पहुँचते हैं। जिसमें वर्ण नहीं है और आश्रम भी नहीं है; जिसमें क्रिया नहीं है और
कर्म भी नहीं है और जिसमें माया का भ्रम भी नहीं है; उस ब्रह्म तक वे पहुँचते हैं। जो गुण-अवगुण से परे होता
है; जो लक्ष्यलक्षण रहित होता; जो सदा-स्वानंद से परिपूर्ण रहता है वह ब्रह्म मेरे भक्तों को प्राप्त होता है उद्धव !
पूर्ण कृपा को वह ज्वार मैं देवाधिदेव नहीं सँवार सका। तभी यह एकादश स्कन्ध का विश्राम मैंने तुम्हें दिया है।
उद्धव ! जहाँ अहंभाव का नाश होता है; माया शून्य हो जाती है, वहीं एकादश स्कन्ध का विश्राम मैंने तुम्हें दिया
है। जहाँ देवभक्तों का पूर्णरूप से मिश्रण हो जाता है वह एकादशस्कंध का यह विश्राम मैंने तुम्हें दिया है। स्वानंद
यदि प्राप्त करना है तो वह कष्ट सहकर प्राप्त करना होता है। उस स्वानंद की तैयार निधि मैंने एकादश स्कन्ध के
रूप में तुम्हें सौंपी है। इस प्रकार स्वानंद निर्भर होकर श्रीकृष्ण ने बीसवें अध्याय की कथा उद्धव को
आनन्दपूर्वक सुनायी। अब स्वानंद सुख की बाढ़ जो इक्कीसवाँ अध्याय है, वह तुम्हें सुनाता हूँ। वेदों में वर्णित
शुद्ध-अशुद्ध का लक्षण यही अगले अध्याय का निरूपण है। इसलिये एकाजनार्दन विनती करता है कि श्रोतागण
मेरी ओर ध्यान दें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे भगवदुद्धव संवादे
एकाकार टीकायां वेदत्रयी विभाग योगनाम विंशति तमोध्यायः ॥ २०॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।