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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 869 में से

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पृष्ठ 552

५३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
न देख स्वयं ब्रह्मसम्पन्न हो यह परिपूर्ण कृपा हम कैसे प्राप्त करें ? तो उसी का निरूपण भगवान कृपा करके
कर रहे हैं। उद्धव ! मेरी कृपा का आश्रयस्थान मेरी भक्ति है।
जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्णः सर्वकर्मसु ।
वेद दुःखत्मकान्कामान् परित्यागेऽप्यनीश्वरः ॥ २७॥
मेरी कथा श्रवण करने से संसार का बन्धन टूट जाता है, ऐसा जिसका विश्वास होता है, पानी में डूब कर
प्राण जाते समय यदि मन में हरिकथा का स्मरण होगा तो जन्म-मरण का फेरा चुक जायेगा ऐसा जो कहता है,
इतनी जिसकी मेरी कथा पर भक्ति रहती है, इतना जिसका भाव दृढ़ रहता है उसमें अनिवार विरक्ति उत्पन्न होती
है। उसे कर्म की प्रवृत्ति नहीं रुचती और विषय की आसक्ति भी अच्छी नहीं लगती। उसे गृहस्थी की गल्प
कथाएँ अच्छी नहीं लगतीं, लौकिक संसार से भी प्रेम नहीं होता; लेकिन सब कुछ छोड़ देने का साहस भी नहीं
होता। यदि ऐसा है तो उसे एकनिष्ठा से और प्रेम से भजन ही करते रहना चाहिये। इसी से सम्बन्धित निरूपण
श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्दृढनिश्चयः ।
जुषमाणश्च तान् कामान् दुःखोदर्काश्च गर्हयन् ॥ २८ ॥
सब कुछ छोड़ देने का सामर्थ्य जिसमें नहीं होता, उसे जब विषयोपभोग लेने का प्रसंग आता है तो वह
इस प्रकार उपभोग लेता है, जैसे उसे सूली पर चढ़ाने के लिये सजाया गया है। सूली पर चढ़ाये जाने वाले मनुष्य
को यदि अच्छे केले दिये जाएँ या होठों को घी शक्कर चढ़ाई जाये तो उसे सूली का भय सताने लगता है। उसी
प्रकार विषय का उपभोग लेते समय उसे अत्यन्त भयंकर नरक दिखाई देता है और वह कहता है, मुझे नारायण,
मधुसूदन, माधव क्यों भूल गया ? हे कृपालु कृष्ण ! मैं विषयरूपी बन्दीगृह में पड़ा हूँ, आप गरुड़ पर बैठकर
शीघ्र आइये और मुझे छुड़ाइये। मैं विषयरूपी नरक के विशाल जबड़ों में फँस गया हूँ, इसलिये आप जिस प्रकार
गजेन्द्र के लिये कूद कर आये थे उसी प्रकार मेरे लिये भी कूद कर आइये। हे गोविन्द ! दौड़ कर आओ और मुझे
बचाओ। मेरी विषय बाधा दूर करो। हे मुकुन्द ! गदा लेकर शीघ्र दौड़ते हुए आओ। मेरी उपेक्षा मत करो। गोविन्द
तुम अटके हुए के सहायक हो तथा भक्त कार्य के पोषक हो। मैं विषयसागर में डूब रहा हूँ, अतः शीघ्र मेरा
उद्धार करो। मैं विषय सागर में डूब गया हूँ, कामलोभ की लहरों में हिचकोले खा रहा हूँ, क्रोध ने तो मेरी पूरी
तरह से दुर्दशा कर दी है और अभिमानरूपी सुरसा ने मुझे निगल लिया है। हे श्रीहरि ! तुम दीनदयाल हो। अपनी
बात तुम सच करके दिखाओ। निजबोध के हाथ से थाम कर मुझ दीन का उद्धार करो। विषय की यह बाधा
बहुत कठिन है। श्रीहरि मेरे पास क्यों नहीं आते ? इस प्रकार आक्रोश कर वह श्रीहरि का स्मरण करता है। विषय
की यह पकड़ नहीं छूटती। काम की दाढ़ में फँस गया हूँ। किसी भी तरह इस पकड़ से नहीं छूट पाता। इसलिये
हे श्रीकृष्ण ! शीघ्र आओ। उद्धव इस प्रकार मेरे भक्त की पुकार मैं एक क्षण के लिये भी सहन नहीं कर सकता।
इस प्रकार जब स्वाभाविक रूप से पूरी तरह अनुताप होता है, तभी मेरी कृपा होती है। उद्धव ! जहाँ सच्चा
अनुताप नहीं है वहाँ मेरी कृपा कभी नहीं होती। देह में अनिवार अनुताप होना यही मेरी कृपा का लक्षण है।
सचमुच, मेरी कृपा के बिना मेरी भक्ति उत्पन्न नहीं होती। जिसे मेरी कृपा प्राप्त होती है, वही मेरी अनन्य भक्ति
करता है। मेरी कृपा का यही लक्षण है कि प्राप्त विषयों का भोग करते समय मेरे भजन में खण्ड नहीं पड़ता।
इसी का नाम है मेरी 'पूर्ण कृपा'। मेरा ऐसा कृपापात्र भक्त बढ़ते प्रेम के साथ मेरी नित नयी भक्ति करता है। मेरी