श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 563, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंरखने से वह पवित्र होता है लेकिन पिण्ड का स्पर्श होने से दर्भ अपवित्र हो जाता है। श्रुति के अनुसार धर्मशास्त्र
वस्तु की शुद्धि-अशुद्धि इस प्रकार बताता है जो वस्तु संदेहास्पद रहती है उसकी शुद्धि के लिये ब्राह्मण वचन
पर्याप्त रहता है क्योंकि ब्राह्मण वचन हरिहर को भी मान्य है। घृत के संस्कार से अन्न शुद्ध होता है; होम के
संस्कार से नवधान्य शुद्ध होता है; और अग्नि के संस्कार से नमक शुद्ध होता है ऐसा शास्त्र कहते हैं। 'रा' अक्षर
के आगे 'म' जोड़कर उच्चार करने से पातकों का भार कम होकर वह पुरुष शुद्धात्म हो जाता है। उसी 'म'कार
के आगे 'ध्य' अक्षर लगाने से और उसका उच्चार करने से घोर पाप सिर पर लगता है और उससे वह पुरुष
बन्धन में पड़ जाता है। रजस्वला चौथे दिन शुद्ध होती है, मेघोदक चौथे दिन शुद्ध होता है। वृद्धि अथवा सूतक
दस दिन के बाद निवृत्त होता है। इसी रीति से काल की शुद्धता है। पिछले दिन का अन्न अगले दिन दूषित होता
है और जिसमें बासीपन आ गया, वह अन्न भी अशुद्ध रहता है। लेकिन घी में तली हुई चीज की बात वैसी नहीं
है। वह बहुत दिन तक शुद्ध रहता है। जिसमें खटास आ जाती है, वह तत्काल ही अपवित्र होता है। एकत्र किये
हुए पानी को यदि चांडाल स्पर्श करे तो वह बिलकुल अपवित्र हो जाता है। उसे बिलकुल स्पर्श नहीं करना
चाहिये। लेकिन वही पानी यदि सोते के जलाशय का हो, तो चांडाल के स्पर्श से वह अपवित्र नहीं होता। वह
नित्य निर्मल और पवित्र ही रहता है। थोड़ा खाना बना हो और उसे कुत्ता और कौआ छू ले तो पूरा खाना ही
फेंक देना चाहिये, क्योंकि वह अन्न अपवित्र होता है। यदि वही खाना सहस्र भोजन का हो तो जितने भाग में
कुत्ता या कौआ स्पर्श किया हो और जिस-जिस स्थानपर उसका मुँह लगा हो उतना भाग निकाल कर फेंक दिया
जाना चाहिये। शेष अन्न को ग्रहण करने में दोष नहीं है।
शक्त्याशक्त्याथवा बुद्ध्या समृद्ध्या च यदात्मने।
अघं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारतः ॥ ११॥
चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण लगने पर स्वस्थ आदमी स्नान न करे तो उसे दोष लगता है; किन्तु बालक,
वृद्ध और रोगी यदि स्नान न करे तो उसे कोई दोष नहीं है। पुत्र जन्म पर, जितने भाई उन सबको दस दिन का
अशौच अवश्य है। किन्तु दूसरे देश में रहने पर यदि अशौच बाधा समाप्त होने के बाद पुत्र जन्म का समाचार
मिले तो अशौच पालने की आवश्यकता नहीं है। बीते दिन यदि किसी के भाई की मृत्यु होती है तो उसके
गोत्रजों को सूतक लगता है। लेकिन अगले दिन अगर कोई और मरता है तो पहले सूतक में ही दूसरा सूतक मिट
जाता है। जिसने विष लिया हो वह यदि साँप से कटवा ले तो उसके विष से पहला विष समाप्त हो जाता है।
उसी प्रकार सूतक से ही सूतक नष्ट होता है। हम जानकर जो पाप या पुण्य करते हैं, उसका फल भोगना ही
पड़ता है। लेकिन बुद्धि को जिसका पता नहीं होता, वह अनजाने में होने के कारण वह बाधक नहीं होता। हमारे
अंतःकरण को आत्मज्ञान पवित्र करता है, यही विवेकयुक्त वैराग्य की 'बुद्धि की शुद्धि' है। जो धनी है उसके
लिये पुराना वस्त्र परिधान करना अपवित्र है। सीया हुआ कपड़ा भी उसके लिये अपवित्र है। किन्तु गरीब के
लिये वही अत्यन्त पवित्र है। वेद का रहस्य अत्यन्त गहन है। स्मृतिकारों ने उसे विशद कर दिया है। भोजन में
किसी को साथ न लेना धनी आदमी के लिये अशुद्ध अन्न है लेकिन गरीब के लिये अकेले बैठ कर भोजन करना
अत्यन्त पवित्र है ऐसा वेद ने ही कहा है। पंचमहायज्ञ किये बिना अन्न ग्रहण करना पाप भक्षण करने जैसा है।
अतिथि को विन्मुख भेज दिया जाय तो सारे पुण्य पर पानी फिर जाता है। अपने गाँव में रहने पर सारे आचार
करें, दूसरे देश में जाने पर केवल आधे का ही निर्वाह करें। किसी शहर में या नगर में जाने पर केवल एक