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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 869 में से

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पृष्ठ 551

बीसवाँ अध्याय ५३५
है। इस प्रकार अन्न सम्पर्क किससे करना चाहिये, कैसे करना चाहिये, इसका नियम भी वेद ने बना दिया है।
अन्यथा वेदों के बिना समाज में वर्णसंकरों की ही बाढ़ आ जाती है। उस वर्णसंकर को बचाने के लिये व
विषयप्रवृत्ति टालने के लिये ही वेदों ने वर्णाश्रम का प्रकार बतलाया। उद्धव! विषयों की प्रवृत्ति ही
'अविद्याबाधा' है और विषयों की निवृत्ति ही 'मुक्ति' है। वेद ने विषयों की प्रवृत्ति के लिये ही कर्मप्रवृत्ति का
मार्ग बतलाया। वर्णाश्रम के आचार की स्थिति भी विषयासक्ति नष्ट करने वाली है। नित्त नैमित्तिक कर्मतंत्र
तथा गुणदोषों के नाना प्रकारों का वेदों ने जो साधिकार वर्णन किया है वह इसीलिये कि मनुष्य में विरक्ति
उत्पन्न हो। स्वकर्म से चित्तशुद्धि होती है और उससे सच्चा वैराग्य प्राप्त होता है और वह विषयेच्छा का नाश
कर रज-तम पर भी नियंत्रण रखता है। तब केवल सत्त्वगुण ही शेष रहता है जिससे गुरुभजन की लगन उत्पन्न
होती है और ज्ञान विज्ञान घर में आता है। पूर्ण भगवद्भक्ति करें तभी गुरुभजन का अधिकार प्राप्त होता है।
सद्गुरु की महिमा का क्या वर्णन किया जाय? गुरु का आज्ञाकारी हूँ। गुरु जिस पर अनुग्रह करता है उसका
मैं भगवंत उद्धार करता हूँ। बड़े प्रेम से उसे मस्तक पर बिठाकर अपने ऐश्वर्य पर बैठाता हूँ। गुरु जिसका
परमेश्वर, परमात्मा है ऐसा जिसे विश्वास है, उसका मैं संसार का जगदीश अंकित होकर रहता हूँ। जब मैं
स्वयं ही अंकित हो जाता हूँ तो समाधि के साथ ज्ञान-विज्ञान भी गुरुभक्तों के घर में आ जाते हैं। उनके सामने
सिद्धियों की क्या बिसात है? उस गुरु की अवहेलना कर जो मेरा भजन करेगा, उसने समझ लो मेरे पकवान
में विष मिला दिया। मुँह में ग्रास और कपाल पर टोला ऐसी ही गति होती है, उस भजन की। स्वयं डूब कर
वह अपना ही बैरी हो जाता है। विषयों का त्याग कर अपने अधिकार बल से ही लोग तर जाएँ इसलिए वेद
ने गुरु का इतना महात्म्य बताया है। इसलिये जिसका जो अधिकार हो उसका उसे जरा भी उल्लंघन नहीं
करना चाहिये। लोग स्वकर्म करें इसलिये वेदों ने भी वही निश्चय दुहराया है। तो फिर कर्म ही पावन करने
वाला है ऐसा तुम कहोगे तो वैसा भी कभी नहीं होता। अपने अधिकार के सिवा कर्माचरण करना भी अत्यन्त
घातक है। संन्यासी यदि गृहस्थ धर्म का पालन करे तो वही उसके लिए पाप का कारण होता है। गृहस्थ
करतल भिक्षा माँगे तो वही उसके लिये अधर्म हो जाता है। हित के लिये औषधि लेने में यदि अनुपात गलत
हो जाय तो वही उलट कर दुःख देता है और शायद मृत्यु का भी कारण बनता है। उसी प्रकार अधिकार न
होते हुए यदि कर्म किया जाय तो वही बाधक होता है। यह मर्म जानकर ही वेद ने प्रत्येक के लिये सुगम धर्म
निश्चित कर दिये हैं। अपने अधिकार के अनुसार अपने धर्म पर निष्ठा रखना यही पुरुष का सबसे बड़ा गुण
है। इसी योग से गुणकर्म का मैल घुलकर वह विष्णु को प्रिय होता है। इसलिये वेद ने जो गुण बताया है उसी
को हमें स्वीकार करना चाहिये और वेदों ने जिसमें दोष दिखाया है उसे पूरी तरह छोड़ देना चाहिये। यही
गुणदोषों का लक्षण है। वेदानुरोध से इसका विचार करते समय बड़े-बड़े ज्ञानी भी उलझन में पड़ जाते हैं
क्योंकि वेद का अर्थ मेरी कृपा के बिना समझ में नहीं आता। निषिद्ध का त्याग कराकर वेद विषय का साथ
छुड़वाता है। यह मर्म जानकर जो बुद्धिमान है वह सर्वसंग परित्याग कर महायोगी बन जाता है। उद्धव!
जिसके लिये बड़े-बड़े देवता, मनुष्य, ऋषि और तपस्वी भी कष्ट करते हैं वह वेदतत्त्वसार मैंने तुम्हें बताया।
मेरी कृपा के बिना यह किसी के हाथ नहीं आता लेकिन तुम्हारे हित के लिये मैंने तुम्हें यह बताया है।
गुणदोष का विवेचन करना यह भी एक दोष है यह जो मैंने तुम्हें बताया था उसका भी स्पष्ट विवेचन मैंने
तुम्हें बताया। दूसरे के गुणदोष देखना मेरा वेद वचन बिलकुल नहीं है, लेकिन दोष त्याग कर केवल गुण
ग्रहण करना यही वेद का उद्देश्य है। लेकिन यह भी मेरी कृपा के बिना सम्भव नहीं होता। दूसरों के गुण दोष