श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसे निश्चल रखता है। लेकिन मन आत्मस्वरूप में किस प्रकार निश्चल होता है? उसका उपाय भी श्रीकृष्ण
बता रहे हैं।
धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्वनवस्थितम्।
अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥१९॥
आत्मस्वरूप में ही ध्यान केन्द्रित कर बैठने से यदि मन स्थिर न रह पाये, अपने चंचल स्वभाव के कारण
वह अपना गुण न छोड़े, अथवा साधक आलस्य के कारण विकल हो जाय या विषयों के सुख का स्मरण करने
लगे, तो उससे मन अपने चंचल स्वभाव के कारण स्वरूप में से पलायित हो जाता है। ऐसी अवस्था में अपना
आसन अटल कर, स्वयं सावधान होकर सद्गुरु के चरणों का स्मरण कर मन को स्वरूप में ही रखना चाहिये।
मन को यदि विषयदान न दिया जाय तो वह हठ से कुछ अधिक ही क्षुब्ध हो जाता है। ऐसे समय
स्वरूपानुसंधान न छोड़, उसे विधिपूर्वक दाना पानी देते रहना चाहिये। (आशंका) सर्प को अमृत पिलाने से वह
विष ही हो जाता है; उसी प्रकार मन को भी विषयसुख देने से वह पहले से भी अधिक क्षुब्ध हो उठेगा। इसलिये
मन को ऐसे विषयभोग देने चाहिये जिसके योग से वह स्वतंत्र रहे। इसी अर्थ का निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण अगले
श्लोक में बताते हैं।
मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रियः।
सत्त्वसम्पन्नया बुद्ध्या मन आत्मवशं नयेत्॥२०॥
मन को स्वतंत्र न छोड़, स्वरूपानुसंधान न छोड़ अन्न, पानी और निद्रा ये विषय मन को देना अपने हित
में रहता है। साधक भले ही साधन के द्वारा इन्द्रियों को और प्राणों को जीत ले लेकिन मन को उसे स्वतंत्र नहीं
छोड़ना चाहिये। उसे स्वरूप में ही स्थिर रखना चाहिये। जो मन पर विश्वास करता है उसे कामक्रोध कहीं का
नहीं छोड़ते; संकल्पविकल्प उसे लूट लेते हैं और महामोह ग्रस लेता है। मन का बल बहुत बड़ा है यह ध्यान
में रखकर उसके पैर में विवेक की सिकड़ी बाँध देनी चाहिये। मन और विवेक इन दोनों का ऐक्य होते ही
बुद्धि सत्त्वगुण से युक्त होकर विषय की जड़ ही उखाड़ देती है और विकारयुक्त उपाधि तोड़ देती है। मन
जिधर-जिधर भागने का प्रयास करता है, उधर-उधर विवेक उसका पीछा करता रहता है और फिर वह
सात्त्विक बुद्धि के सहारे मन के पैर ही तोड़ देता है। इस प्रकार मन का बल टूट जाने पर जिस प्रकार पानी का
प्रवाह नदी के जल में ही रहता है, उसी प्रकार मन भी स्थिर रहता है। इस प्रकार जब मन स्वयं ही स्वरूप में
शान्त हो जाता है, तभी योग श्रेष्ठ होने के कारण उसके योग से जीव और शिव दोनों का ही समाधान होता है।
जीव और परमात्मा में ऐक्य स्थापित करना यही वास्तव में 'श्रेष्ठ योग' है। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण
अश्व के दृष्टांत से करते हैं।
एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः।
हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवाव॑तो मुहुः॥२१॥
अश्व पर जीन चढ़ाये बिना घुड़सवार जिस प्रकार घोड़े को अपने हुक्म से वश में करता है, उसके पृष्ठ
भाग पर चाबुक मारता है, जहाँ पैर सँभाल कर चलता है तो वह उसे पुचकारता है। लेकिन जहाँ उसका पैर
गलत पड़ता है वहाँ उसके मर्म पर चाबुक मारता है। यदि अश्व हठ के कारण अपनी आदत नहीं छोड़ता तो वह
उसे थोड़ी छूट दे देता है लेकिन उसे पूरी तरह खुला नहीं छोड़ता और न उसे पीड़ा ही देता है। इस प्रकार वह