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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 869 में से

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पृष्ठ 549

या ब्रह्मविद्या पर फल लग जाए अथवा चैतन्य को अंकुर फूटे इस प्रकार अवयव शोभित होने लगते हैं। देह के
सूक्ष्मत्व के कारण वह संसार की आँखों में समा जाता है और जीव में संचार कर वह अपने स्वभाव के अनुसार
विचरण कर सकता है। वह वायु की सीढ़ी बनाकर सुख से गगन पर विचरण करता है। इसी को सिद्ध पुरुष
'परम खेचरी' मुद्रा कहते हैं। उसके शरीर की दीप्ति से सूर्य भी जुगनू की तरह दिखायी देने लगता है। अमरपति
इन्द्र चन्द्र भी उसके चरणामृत की इच्छा करते हैं। वह औट पीठ गोल्हार लाँघ कर, भ्रमरगुंफा के अन्त तक
जाकर, सोहंहंस का पीठ भेद कर परमात्मा के रूप में प्रकट होकर बैठ जाता है। इस अभ्यास के कारण यह योग
बहुत कठिन है। बहुत कम लोग ही इसे साध पाते हैं। यह मार्ग अत्यन्त कठिन है ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण भी कहते
हैं। अगर यह मार्ग उन्हें स्वीकार्य होता तो वे दूसरा साधन बताते ही नहीं। मूल श्लोक देखने से सज्जन लोग
समझ जायेंगे। सुनने में यह अच्छा लगता है लेकिन करते समय कलेजा फट जाता है। कोई साधु कितना ही हठ
क्यों न करे लेकिन उससे यह साधन नहीं सधता। बड़े-बड़े देवतागण और साधु भी इसमें फँस गये हैं। इस
कठिन साधन को छोड़िये। तुम्हें मैं एक दूसरा साधन बताता हूँ। वह है 'आन्वीक्षिकी' विद्या ! इसमें 'त्वंपद-
शोधन' का विवेक है। पंचभूतात्मक तत्त्वों का गोलक तत्पद से भिन्न है। वह सर्वव्यापक से बच कर कहीं एक
देशी बन कर रहा है। अनादि माया के प्रवाह के कारण तन्मात्रारूप विषय की संगत से, मन के संकल्प के बिना
उसने अपने को भिन्न माना है। भेद मन ने माना है, इसलिये उसे ही अभेद का उपदेश करें। इसी अर्थ का विवेक
स्वयं श्रीकृष्ण विशद करके बताते हैं। शरीर पंचभूतात्मक है यह सत्य है लेकिन उसमें की 'पृथ्वी' पानी में घुल
जाती है। पृथ्वी में 'गंध' जल में भर कर पृथ्वी ही निःशेष हो जाती है। जल के 'जलरस' का जब 'अग्नि'
शोषण कर लेता है, तब जल का ह्रास होता है। इससे तेजतत्त्व निःशेष हो जाता है। लेकिन 'वायु' का प्रताप उस
'तेज' और उसके कारण 'रूप' को ग्रस लेता है। वायु का झोंका लगते ही तेज का स्वरूप भी मलिन हो जाता
है। इस वायु का 'स्पर्श गुण' जब गगन ले जाता है तो वायु का भी भान नहीं रहता। 'वायु' आकाश में लीन हो
जाता है और केवल आकाश ही शेष रहता है। अकेले आकाश का कोई रूप ही नहीं रहता। वह गुणकार्यों के
साथ अहंकार में प्रवेश करता है, अहंकार माया में प्रवेश करता है और माया परमेश्वर में लीन होने पर मिथ्या हो
जाती है। रात अपनी प्रौढ़ता से अन्धकार फैलाती है तब सहस्रों नक्षत्र और जुगनूं अपने-अपने तेज से आकाश में
चमकने लगते हैं। लेकिन वह रात जब सूर्य के सामने आती है तो अपने कार्य के साथ अदृश्य हो जाती है। आगे
पीछे देखने पर कोई भी नहीं दिखाई देता। उसी प्रकार परमेश्वर के सामने माया अपने कार्यकारण के साथ लुप्त
हो जाती है। मिथ्या ही होने के कारण उसका कोई स्वरूप शेष नहीं रह जाता है। उसका अस्तित्व ही नहीं रह
जाता। माया प्रतिबिम्बित चैतन्य को 'जीव' यह नाम प्राप्त होता है। जब माया ही नष्ट हो जाती है तो जीवत्व भी
नष्ट हो जाता है। जीवशिव का भान नहीं रहता। मन का अपनापन उड़ जाता है, चारों ओर चैतन्य ही भर जाता
है और साधनों को अत्यन्त समाधान होता है। इस प्रकार त्वंपद का शोधन करने से तत्पद में समाधान होता है।
इसका नाम 'आन्वीक्षिकी विद्या' है। यह विवेकी लोगों को ही साध्य होती है। अब न योगसाधन की
आवश्यकता है और न त्वंपद के शोधन की। मैं तुम्हें इससे भी सुलभ अन्य साधन बताता हूँ। इसमें कष्ट तो
बहुत कम है लेकिन योग का सारा फल जुड़ता है। त्वंपद शोधन उसके आगे लाचार होकर बैठ जाता है। वह
क्या है ? वह है मेरी भक्ति । मेरी रामकृष्णदि जो मूर्तियाँ हैं उनकी अत्यन्त प्रेमपूर्वक पूजा करने से मैं श्रीपति
अत्यन्त सन्तुष्ट होता हूँ। मेरा गुणानुवाद सुनें, मेरा कीर्तन करें, मेरा नामस्मरण करें, मेरा ही ध्यान, मेरा ही भजन
इस प्रकार सदासर्वदा मेरा ही चिन्तन करते रहें। अंतःकरण में सदा मेरा ही ध्यान, मुख से मेरा ही नाम और मेरा