श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह स्वयं अपने सामर्थ्य से मुझे प्राप्त करा देती है। यदि मेरा भजन न करें तो मेरा ज्ञान कभी भी उत्पन्न नहीं
होगा। कर्म यदि मुझे अर्पण न किया जाय, तब वही अकर्म हो जाता है। इसलिये जो मुख्य रूप से आत्मज्ञान है
वह मेरे भजन की ही अपेक्षा करता है। कर्म तो बेचारा रंक है, वह बेचारा मेरे भजन के बिना सामने आ ही नहीं
सकता। सारांश, ज्ञान और कर्म परमार्थ में भक्ति के कारण ही श्रेष्ठत्व तक पहुँचते हैं। उस भक्ति का सच्चा
महात्म्य अब तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः।
न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥ ३१ ॥
कर्माचरण करना नहीं जानता, वैराग्यज्ञान प्राप्त नहीं किया, फिर भी मेरे स्वरूप पर ध्यान केन्द्रित कर
भक्तिभाव से मेरा भजन किया तो ज्ञानकर्मादिक ही नहीं अपितु वैराग्य भी, भक्ति के चरणों में शरण आकर
दण्डवत करता है। शरण आना कौन बड़ी बात है? वे तो उसकी कोख से जन्म लेते हैं और फिर प्यार से उसे
आलिंगन देकर उससे आत्मानन्द की सुन्दर माधुरी माँगते हैं। सारांश, भक्ति ज्ञान, वैराग्य और कर्म इन तीनों को
अपनी गोद में खिलाती है और परमानन्द पूर्णरूप से पिला कर उसका स्वयं पालन करती है। मेरी वह भक्ति
साध्य होते ही ज्ञान आदि सेवक बन जाते हैं। इसी से सम्बन्धित निरूपण श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
यत् कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत्।
योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि ॥ ३२ ॥
सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा।
स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथंचिद् यदि वाञ्छति ॥ ३३ ॥
स्वधर्म कर्म करने से जो प्राप्त होता है, प्रखर तप करने से जो साध्य होता है; अथवा सांख्यज्ञान से जो
वस्तु हाथ लगती है; उसी प्रकार विषयत्याग से जो प्राप्त होता है, अष्टांग योग से जो साध्य होता है, वायु, जल,
पान आदि के सेवन से जो फल प्राप्त होता है, उसी प्रकार वेदाध्ययन से जो मिलता है; सत्य भाषण से जो साध्य
होता है, अनेक साधनों से जो प्राप्त होता है, वह सारा मेरे एक भजन से मिलता है। इतने साधनों के कष्ट सहे
बिना, गिरिकन्दराओं को खोजे बिना, यदि एक मेरी भक्ति साध्य हो जाय तो ये सारे फल स्वयं आपके द्वार पर
खड़े हो जाते हैं। अब उद्धव! तुम कहोगे कि तुम्हारी ऐसी भक्ति कौन सी है? तो ब्रह्मभावना से किया गया गुरु
का भजन, उसी भक्ति का यह पूर्ण प्रताप है। साधकों को गुरुभजन से श्रेष्ठ दूसरा कोई लाभ ही नहीं है। मैं
साक्षात भगवान गुरु की भक्ति करता हूँ। मैं भी सद्गुरु की कृपा से इतनी ऊँचाई तक पहुँचा हूँ। तो सद्गुरु की
इस महानता को कौन-सी उपमा दी जाय? जो कोई गुरु को ही परब्रह्म मानकर अभेद भावना से भक्ति करता है
उन्हें अकस्मात यदि किसी चीज की इच्छा होती है तो मैं उन्हें स्वर्ग, मोक्ष, वैकुण्ठ आदि सब कुछ देता हूँ। यह
कहना भी कम ही है। उनके भजन के प्रेम से मैं मोहित हो जाता हूँ और उनके आगे-पीछे सदा सर्वकाल खड़े
रहकर उनकी रक्षा करता हूँ। लेकिन मेरे भक्त अत्यन्त निःस्पृह होते हैं। वे कभी कुछ माँगे यह सम्भव ही नहीं
है। उनका निरूपण भी मैं तुम्हें अत्यन्त कुशलता से सुनाऊँगा, ध्यान देकर सुनना।
न किंचित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम।
वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ ३४ ॥