श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 555, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय ५३९
कुछ भी ग्रहण नहीं करना, ऐसा शुद्ध बोध जिसके मन पर अंकित हो गया, ऐसा जो वास्तविक रूप से
निरपेक्ष रहता है वही मुझे मान्य सच्चा साधु है। जिसमें निरपेक्षता होती है उसी के चरणों का धैर्य वन्दन करता है
जो अधीर होता है उसमें निरपेक्षता रहती ही नहीं है। कोटि-कोटि जन्म लेने के बाद ही यह ज्ञान प्राप्त होता है
और इसके बाद ही निरपेक्षता प्राप्त होती है। निरपेक्षता के अतिरिक्त श्रेष्ठ अन्य कोई साधन है ही नहीं। ऐसी
निरपेक्षता प्राप्त होने पर ही मेरे भजन के प्रति प्रेम उमड़ता है। फिर उसे मेरी चौथी भक्ति, जिसे वेद में
एकान्तभक्ति कहते हैं, साध्य होती है। एकान्तभक्ति की बात सुनो। इसमें भगवान का और भक्त का एकांत होता
है। भक्त भगवान में प्रवेश करता है और भगवान भक्त में सबाह्य प्रवेश करता है। इस प्रकार अभेदभाव का जो
मेरा भजन है, वही 'एकान्तभक्ति' है, जिसमें भक्त को संसार में मुझसे अलग कुछ दिखायी ही नहीं देता। उसे मैं
श्रीकृष्ण चारों पुरुषार्थों के साथ मुक्ति प्रदान करता हूँ। लेकिन वे उन्हें दूर से भी नहीं देखते। फिर हाथ पकड़ने
की बात ही क्यों की जाय ? और ये भी अपने मुख से कुछ माँगे यह कल्पान्त में भी सम्भव नहीं है। मेरी एकान्त
भक्ति छोड़कर मेरे भक्त कभी भी मोक्ष नहीं लेते। मोक्ष न लेने का क्या कारण है ? श्रुतिशास्त्र की भी समझ में न
आने वाला यह दुरूह भाव देवाधिदेव श्रीकृष्ण सारांश स्वरूप में बता रहे हैं।
नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्निःश्रेयसमनल्पकम्।
तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत् ॥ ३५ ॥
जो नितान्त निरपेक्ष रहता है, वह महापुरुष मुझे पूज्य लगता है। उसकी दृष्टि में 'मोक्ष' भूसे की तरह
लगता है। ऐसा नैराश्य त्रैलोक्य में भी धन्य है। निरपेक्षता का महत्त्व सुनो। ऐसे पुरुष को चारों पुरुषार्थ व्यर्थ
मालूम होते हैं। वैकुण्ठ, कैलाश आदि को जो श्रेष्ठ स्थान समझते हैं, वह तो उनका रोज का रास्ता है। निरपेक्ष
पुरुष के पास तो भगवान भी चल कर आते हैं। फिर रिद्धि-सिद्धि की क्या बात है ? साक्षात कलिकाल भी द्वार
के पास खड़ा रहता है। स्वयं महादेव भी उस पर न्योछावर रहता है और मैं भी लक्ष्मी के साथ उसका अंकित
होकर रहता हूँ, यह ध्यान में रखो। मेरा जो निरपेक्ष भक्त है वह मेरी ही तरह समर्थ रहता है। लेकिन यह बात भी
पूर्णरूप से औपचारिक है क्योंकि वह चिद्रूपत्व से सचमुच मैं ही रहता हूँ। मैं परमात्मा परमानन्दस्वरूप हूँ,
इसलिये भक्त भी मेरे भजन से शुद्ध स्वानंदस्वरूप ही बनता हे। दोनों अभेदरूप से स्वानंद कंद तथा सच्चिदानन्द
स्वरूप ही हैं। मेरी भक्ति से सम्पन्न मेरे भक्त गुणदोष नहीं देखते। उसी से सम्बन्धित निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण कर
रहे हैं।
न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणाः।
साधूनां समचित्तानां बुद्धः परमुपेयुषाम् ॥ ३६ ॥
जो विषमभेद नहीं देखते, जिन्हें समत्त्व का निजबोध हुआ है, उसे ही शुद्ध 'साधु' कहते हैं। उसे ही मेरे
भजन से परमानन्द का लाभ होता है। समस्त प्राणिमात्र में एक मैं 'परमात्मा' ही भरा हुआ हूँ ऐसा जिसे अनुभव
हुआ है उसे 'द्वैत' की प्रतीति नहीं होती। जिसकी ऐसी भजनस्थिति रहती है उसे ही 'एकान्तभक्ति' कहते हैं।
निरन्तर सर्वत्र समभाव रखकर जो एकाग्र मन से मेरे भजन में अत्यन्त तत्पर रहते हैं, वे प्रकृति के परे जाकर
सचमुच मत्स्वरूप होते हैं। इस प्रकार जो मद्भाव से परिपूर्ण रहते हैं वे गुणदोष नहीं देखते। मैंने अपना यह
लक्षण तुम्हें पहले ही बता दिया है, उद्धव ! यदि शर्करा की खाल उतारी जा सके, कर्पूर का छिलका उतर सके,
रत्नों के तेज का यदि काजल बन सके, तभी मेरे भक्त सृष्टि में गुणदोष देखेंगे। जिससे अवगुण लिया जाय वह