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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 869 में से

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पृष्ठ 558

इक्कीसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु! हे वैकुण्ठनाथ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम सदासर्वदा स्वानंद वैकुण्ठ में ही वास
करते हो! हे अनंत! हे अव्यय! तुम्हारे सच्चे ऐश्वर्य का अंत ही नहीं लगता। तुम्हारा निजबोध का गरुड़ तुम्हारे
सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। उसके पंख हिलाने भर से प्रचण्ड भववृक्ष भरभराकर गिर पड़ता है। तुम्हारे
हाथ का स्वानुभाव का चक्र प्रखर तेज से लपलपाता रहता है, उसे अभेद भावना की धार लगी हुई है। इसलिये
उसकी मार अत्यन्त प्रचण्ड होती है। तुम्हारा पाञ्चजन्य तो कितना अगाध है। वह निःशब्द में भी भयंकर शब्द
उत्पन्न करता है। वेदवाणी से शुद्ध गर्जना करता रहता है। वही तुम्हारा प्रसिद्ध शंख है। सदासर्वदा आत्मतेज से
चमकने वाली गदा तुम्हारे हाथ में सर्वकाल शोभा देती रहती है। तुम्हारी वह गदा इतनी प्रबल है कि अभिमान
को कुचल देती है। देखने में अत्यन्त मनोहर, जिसे देखते ही आनन्द में उबाल आ जाता है और जिससे
परमानन्दरूपी सुगन्ध निकलती रहती है ऐसा लीला कमल तुम हाथ में उछालते रहते हो। समसमान रहने वाले
जीव और शिव इन दोनों को जय और विजय ये नाम देकर उन्हें द्वार की सुरक्षा के लिए रखा गया है। उसी
प्रकार तुम्हारी अवियोगिनी सुकुमार निजशक्ति अत्यन्त सुन्दर लक्ष्मी रूप में आदर के साथ तुम्हारी चरण सेवा
करती रहती है। तुम्हारे लोक में रहने वाले जितने भी जन हैं वे सब तुम्हारी ही तरह हैं। वहाँ न मानापमान है,
न देहाभिमान है। वहाँ काल का भी प्रवेश नहीं है; कर्म की कुछ नहीं चलती है; वहाँ क्षुधा-तृषा का अंत होता
है; वहाँ तुम्हारे भक्त निजानंद से सदा तृप्त रहते हैं। तुम्हारे कृपाकटाक्ष के कारण अलक्ष्य वस्तु भी बिना ध्यान
किये ध्यान में आ जाती है। तुम्हारे चरण सेवा की अपेक्षा से तुम भक्तों का निरपेक्षता से आचरण कराते हो।
समता के सिंहासन पर एकता की गद्दी बिछी रहती है। उस पर तुम्हारा पूर्णता का स्वाभाविक सहजासन रहता
है। तन्मयता का छत्र, सन्तोष का छत्र, तथा ज्ञान-विज्ञान ये दो चँवर सदा तुम पर झलते रहते हैं। वहाँ चार वेद
तुम्हारे चारण हैं। वे जोर-जोर से तुम्हारी कीर्ति का बखान करते हैं और अठारह पुराण ये बंदी भार के रूप में
तुम्हारी उत्तम वंशावली का वर्णन करते हैं। वहाँ तुम्हारी सभा में छः जन (षट्शास्त्र) वाद-विवाद करते तथा
उपमाओं की रचना करते रहते हैं। युक्तिपूर्वक अपने विचारों का खण्डन-मण्डन कर अपने ज्ञान का प्रदर्शन
करते रहते हैं। कोई भावार्थी बिना कुछ बोले ही तुम्हारी स्तुति करते हैं। ऐसी स्तुति से संतुष्ट होकर तुम उन्हें
अपने पद पर बिठाते हो। तुम ऐसे सद्गुरु महाविष्णु हो, जो चिद्रूप से सम और सहिष्णु है। जो तेज से
देदीप्यमान है, वही जन में एकरूप जनार्दन है। जन में एक जनार्दन ही भरा हुआ है। उसमें एकरूप से
एकनाथ एकरूप हो गया। इसलिये उसने एकपन को भी ग्रस लिया। ऐसा महाबोध उसे प्राप्त हुआ। उस
महाबोध का अंजन हाथ के बिना ही आँखों में डाल देते हैं। इससे पूरे शरीर में ही आँखें फूट निकलती हैं और
दृष्टि सर्वव्यापक हो जाती है। लेकिन सर्वत्र जन को देखने पर वहाँ एक जनार्दन ही दिखायी देता है। ऐसी
परिपूर्ण कृपा कर उसने एकपन भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार भगवान ने प्रसन्न होकर मेरे हाथों से
श्रीमद्भागवत का अर्थ यथार्थ रीति से करवाया और वह भी देशी भाषा में। श्रीमद्भागवत पर संस्कृत में अनेक
टीकायें हैं, फिर भी उन्हें इसमें न जाने क्या बात अच्छी लगी कि उन्होंने प्राकृत और सुगम अर्थ करवाया। मेरा
कर्तृत्त्व और अकर्तृत्त्व उस जनार्दन ने छीन लिया। अब ग्रंथार्थ के निरूपण की बातें भी वही कर रहा है। उसने