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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 562, कुल 869 में से

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पृष्ठ 562

५४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रसिद्ध हैं। वे देश अशुद्ध होने के कारण वहाँ भी शुद्ध स्वधर्म नहीं होता। जहाँ उपलेप समार्जन न होता तो हो
ऐसे घर की जमीन को भी अशुद्ध ही समझना चाहिये; अथवा जहाँ वेद बाह्य दुर्जन हों, वह भी स्थान अपवित्र
है। जो जमीन पथरीली होती है, वह भी सदा पथरीली हो होती है। अब काल के तंत्र की पवित्रता-अपवित्रता के
बारे में बताता हूँ।
कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा।
यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मकः स्मृतः ॥ ९॥
जिस काल में देश, काल, द्रव्य और पात्र ये सामग्री सुलभता से मिले वही काल अत्यन्त पवित्र है तथा
शास्त्र सम्मत है। ग्रहण, कपिलाष्टि आदि पर्वों के रूप में जो काल आता है वह परम पवित्र है। उसी प्रकार
जब संतजन घर आयें उस काल को अत्यन्त पवित्र समझना चाहिये अथवा अकस्मात संपत्ति प्राप्त हो जाय या
मन में धर्म करने का विचार आ जाय तो उस काल को वेद 'पुण्यकाल' के रूप में स्वीकार करते हैं। सच्चा पल
काल पुरुष को जन्म में एक ही बार प्राप्त होता है। वह है माता-पिता का अंतराल। धर्म का वह अत्यन्त पवित्र
काल समझना चाहिये। ऐसे समय श्रद्धापूर्वक धर्म करने से अक्षय पवित्रता प्राप्त होती है। अब तुम्हें काल की
स्वाभाविक पवित्रता के बारे में बताता हूँ। वह काल सभी दृष्टियों से उपकारी तथा साधक के निज स्वार्थ को
साधनेवाला है। सचमुच 'ब्राह्म मुहूर्त' अर्थात् सूर्योदयसे पूर्व पाँच घटिकाएँ, यह काल स्वाभाविक रूप से पवित्र
है; वह काल साधक के हित का होता है और दिन पर दिन उसके हित की वृद्धि ही करता है। अब कर्म के लिये
अयोग्य काल भी बताता हूँ। ऐसे समय स्वाभाविक तौर पर ही कर्म नहीं करना चाहिये क्योंकि वह काल निषिद्ध
होने के कारण कर्म करने में महादोष लगता है। जिस स्थान पर कल न हो, स्थल अथवा विहीत धन उपलब्ध न
हो, वह काल सचमुच कर्म करने के लिये योग्य नहीं है, यह ध्यान में रखो। जिस काल में सूतक लगा हो अथवा
राष्ट्र पर संकट आया हो अथवा जिस समय देह परतंत्र हो गया हो, वह काल भी कर्म करने योग्य नहीं है ऐसा
बताया गया है। जिस काल में सूखा पड़ा हो, ज्वर का जोर चल रहा हो वह काल दूषित हो जाता है, जिस काल
में चोरों का बोलबाला हो, वह काल भी कर्म करने के लिये योग्य नहीं है। जिस समय गुस्सा आया हो, अथवा
तमोगुण उफान पर हो, निद्रा और आलस्य ने कब्जा जमा रखा हो, वह काल भी कर्म करने के लिये योग्य नहीं
है। अकस्मात सुख सम्पदा प्राप्त हुई हो अथवा कभी न सुनी हुई बात सुनने में आयी हो अथवा सज्जनों की
मर्यादा भंग हुई हो, तो वह काल कर्म करने योग्य कभी नहीं है। राह चलते समय यदि कोई संकट आ जाये और
प्राणों पर आ जाय तो वह काल भी कर्म करने योग्य नहीं है। जिस समय धन की लालसा प्रबल हो उठती है,
जिस समय प्राणों की अत्यधिक चिन्ता लगी रहती है, मन जब विकल्प से भर जाता है उस समय भी कर्म करना
उचित नहीं है। इस प्रकार कर्म करने के लिये कौन-सा काल अनुचित है यह तुम्हें अच्छी तरह बता दिया। अब
धन की शुद्धता अशुद्धता का भी विस्तार से वर्णन करता हूँ।
द्रव्यस्य शुद्ध्यशुद्धी च द्रव्येध वचनेन च।
संस्कारेणाथ कालेन महत्त्वाल्पतयाथवा ॥ १०॥
पुरुष गोमूत्र प्राशन करे तो उसमें तत्काल पवित्रता आती है, लेकिन वही ताँबे के बर्तन में लेने से
अपवित्रता आती है। पुरुष जलप्रोक्षण करे तो फूलों को पवित्रता आती है। अग्नि की सेवा करने से ब्राह्मण को
पवित्रता आती है लेकिन वही ब्राह्मण यदि अग्नि से जलता है तो अग्नि अपवित्र हो जाती है। दर्भ पर पिण्ड