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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 869 में से

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पृष्ठ 556

५४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अवगुण भी मुख्य रूप से मैं ही हूँ और जिसका गुण लिया जाय वह मद्रूप ही हूँ। इस प्रकार भक्त शिरोमणि
मत्स्वरूप से ही सारी सृष्टि को देखता है। गुणदोष उसे कहीं दिखायी ही नहीं देते। गुणदोष न देखे जाएँ यही
सभी साधनों में प्रमुख साधन है। इससे सम्बन्धित निरूपण आदरपूर्वक श्रीकृष्ण सुना रहे हैं।
एवमेतान् मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथः।
क्षेमं विदन्ति मत्स्थानं यद् ब्रह्म परमं विदुः ॥ ३७॥
उद्धव ! इस प्रकार मैंने वेदवाणी से स्वयं भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग के द्वारा लोगों को उपदेश दिया है। कर्म
से ही कर्म को नष्ट किया जाय, यही कर्मयोग का रहस्य है और स्वधर्म कर्म से मेरी प्राप्ति होती है यह भी मैं
तुम्हें बता चुका हूँ। उसी प्रकार नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका विचार कर जो अनित्य है उसे समाप्त
करना ज्ञानयोगी का लक्षण है यह सब भी मैंने तुम्हें बतलाया। उसी प्रकार मेरी भक्ति करने से सारे फल पैरों पर
आकर गिरते हैं और भक्तों ने अनायास मेरी प्राप्ति होती है यह भी मैंने तुम्हें बताया। अधिकार भेद के अनुसार
त्रिकाण्ड के तीन प्रकार के वेदमार्ग भी मुझे प्राप्त करने के उत्तम साधन हैं। इसलिये वह भाग भी मैंने तुम्हें स्पष्ट
करके बतलाया। मैंने बताये वेदमार्ग का जो अनुष्ठान करेगा, उसे उसकी रुचि के अनुसार सगुण अथवा निर्गुण
स्वरूप की प्राप्ति होती है। इसमें जो सगुण साक्षात्कार होता है वह पंचरात्रागम का मत है। वे लोग वैकुण्ठ को
ही प्रमुख मानते हैं। यह उनका निश्चित मत है। सात आवरणों के बाहर और मायावरण के भीतर श्रीहरि ने
वैकुण्ठ की रचना की है, ऐसा वेदान्त में कहा गया है। उसमें आगमशास्त्र के मतानुसार 'माया' भगवान की
लीला है ऐसा कहा जाता है। भगवान ने अपनी लीला से वैकुण्ठ की रचना की है इसलिये उसका नाश नहीं है
जहाँ लीला मात्र से इच्छित देह धारण कर मेघकांतियुक्त साक्षात पुरुषोत्तम रहते हैं, वहाँ गुण, काल कर्म अथवा
माया आदि का भ्रम नहीं रहता। इस प्रकार जन्म और मरणरहित वैकुण्ठ अक्षयी और नित्य ही रहता है। उद्धव !
जो वहाँ पहुँचते हैं वे नित्यमुक्त होते हैं, ऐसा आगम का मत है। उद्धव ! मंत्रों के योग से अपने आराध्य देवता को
प्रसन्न किया जा सकता है ऐसा वेद विद्वानों का कथन है। वह भी तुम्हें प्रसंगानुसार बता दिया। उसी प्रकार हे
उद्धव ! भावार्थ भक्ति ही प्रसन्नता की पहचान है, यह मैंने तुम्हें पहले अच्छी तरह बता ही दिया है। लेकिन
वेदान्त शास्त्रों का इस सम्बन्ध में यह मत है कि प्रचण्ड प्रलय का आघात वैकुण्ठ कैलासादि सारे लोकों को
अर्थात् जितने साकार है उन सबको नष्ट कर देता है। उस समय जितना कुछ गुणातीत रहता है, वही शेष रहता
है। उद्धव ! वही वास्तव में सदा, सर्वकाल नित्य रहने वाला 'पूर्णब्रह्म' है। जहाँ काल भी नहीं है और कर्म भी
नहीं है, जहाँ गुण भी नहीं है और धर्म भी नहीं है, माया भी जहाँ विश्राम करती है, उद्धव ! वही परब्रह्म है। मेरा
स्थान वैकुण्ठ है; वहाँ 'सगुण-सायुज्य' का लाभ होता है; किन्तु निरन्तर परिपूर्ण ब्रह्म यही 'पूर्ण सायुज्यता' है।
ऐसा पूर्ण परब्रह्मस्वरूप प्राप्त करने के लिये साधकों को सुरक्षित मार्ग कौन-सा है ? तो वेदों में बतायी गयी मेरी
भक्ति यही सबसे सुगम और उत्तम मार्ग है। दूसरे मार्ग से जाने पर कामलोभ आदि विघ्न आते हैं अथवा
ज्ञानाभिमान गड्ढे में गिर जाता है और वेदोक्त कर्मत्याग का दोष अवश्य ही अपने पल्ले पड़ता है। ऐसा
भक्तिमार्ग में नहीं है। उसमें नवविधाभक्तिरूप नौ साथी साथ में रहते हैं। मद्भावयुक्त भक्ति के कारण हर पग पर
विश्राम मिलता है। इसमें मुख्य साधन यही है कि प्राण जाने पर भी गुणदोष न देखें। उसी समय परिपूर्ण ब्रह्म की
प्राप्ति होती है। जहाँ भय, भ्रान्ति आदि कुछ भी नहीं है; जहाँ दिन और रात नहीं है, जहाँ जीव और शिव का भेद
नहीं है; उसी ब्रह्म को मेरे भक्त प्राप्त करते हैं। जहाँ रूप नहीं है, नाम नहीं है, जहाँ काल नहीं है, कर्म नहीं है;