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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 545, कुल 869 में से

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पृष्ठ 545

बीसवाँ अध्याय ५२९
है। वहाँ सद्गुरु ही नाविक है। जहाज को उस पार पहुँचाने के लिये मैं श्रीहरि अनुकूल बहने वाली वायु हूँ।
'गुरु कर्णधार की कुशलता का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? भँवरे, प्रपात, पानी की तेज धारा, विकल्प के
कल्लोल आदि से बचाकर वह अपनी नौका को आगे बढ़ाता है। विवेक का पतवार लगाकर कर्माकर्म का जल
प्रवाह काटा जाता है और भजनरूप मस्तूल के बल पर नौका धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाती है। कामक्रोध की
बड़ी-बड़ी मछलियाँ चारे की खोज में छिपी बैठी रहती हैं, उस पर शान्ति का जाल डालकर वह अपना जहाज
बड़ी कुशलता से आगे बढ़ाता रहता है। सह में सारूप्य की गोदी आती है, तो वहाँ नाव में गजर होने लगता है।
अनाहत के ध्वज फहराते हैं, जय-जयकार की गर्जना होने लगती है। सलोकता के बाजार में जाने पर जहाज
कहीं उलट न जाय अथवा समीप के मार्ग पर ले जाने पर कहीं दोनों ओर से डगमगा न उठे इसलिये जहाज
को सरूपता की गोदी में ही स्थिर किया जाय ऐसा विचार मन में आता है लेकिन वहाँ बहुत भीड़ रहती है
इसलिये सारी बातों का विचार कर जहाज को सायुज्य गोदी में ले जाते हैं। वहाँ धार्मिक लोगों की निर्मल
धर्मपेठ (बाजार) ही लगी रहती है। न शोरगुल है न झगड़ा-टंटा है। सभी सामान निर्मल है। जो माल चाहे
एकसाथ ले सकते हैं। ऐसा यह नरदेह का दुर्लभ जहाज है तथा श्रीगुरुरूप से मैं ही उसका कर्णधार अर्थात्
नाविक हूँ। इस जहाज के सहारे जो भवसागर को पार नहीं करेगा, उस पुरुष को आत्मघाती समझना चाहिये।
यदि आगे जाकर नरक यातना भोगने के लिये ही यह देह विषयों में खर्च किया तो वह अपने ही हाथ से सीने
में शस्त्र घुसेड़ने जैसी बात होगी। उस पार जाना आवश्यक है इसलिये नौका तोड़कर उस पर चना भूज कर
खाये अथवा बुद्धिमान लोग जाड़े के भय से ओढ़ना जला कर उस आग से तापें, उसी प्रकार यहाँ होता है।
लोग व्यर्थ ही नरदेह को खो देते हैं। आगे दुःख के दुर्धर पर्वत आ जाते हैं। सचमुच, सभी योनियों में
विषयासक्ति सभी को लगी है। नरदेह में भी विषय सम्बन्ध से वैसी ही स्थिति रही तो उसके मुँह में मिट्टी ही
पड़ेगी। ऐसा श्रेष्ठ नरशरीर प्राप्त होने पर भी जो संसार के उस पार नहीं जायेगा, वह उद्धव! सचमुच
आत्मघाती पुरुष ही होगा। सहस्रों ब्रह्महत्या अथवा गोहत्या करने पर भी शास्त्रों में प्रायश्चित्त का विधान है,
लेकिन जो आत्महत्या कर लेता है उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं होता क्योंकि जो आत्महत्या करके मरता
है, वह तत्काल नरक में जाता है, फिर प्रायश्चित्त करने के लिये बचा कौन? और शास्त्रार्थ भी किसे बताया
जाय ? अमृत बेच कर यदि कोई माड पिये, उसी प्रकार नरदेह प्राप्त कर विषयभोग में लिप्त रहे तो जीव का
सच्चा स्वार्थ डूबकर वह अपनी हानि कर लेता है। उत्तम शरीर प्राप्त कर विषयासक्ति के कारण अनेक लोग
डूबते हैं, ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। लेकिन ये मूर्खों की बातें रहने दो। अब वेदार्थ के अनुसार चलकर, अपने हित
पर दृष्टि रखकर सावधान रहने वाले उत्तम लोगों की पद्धति सुनो। जो स्वभाव से ही अत्यन्त विरक्त रहते हैं
उन्हें कौन-सा कर्तव्य करना चाहिये ? किस वस्तु का त्याग करें ? यही बात भगवान बताते हैं।
यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः।
अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः॥ १८ ॥
जो कर्म के आरम्भ में ही विरक्त रहता है, फल की आशा जिसके चित्त को स्पर्श नहीं करती; मोक्ष
मिलने की इच्छा का जिसे स्मरण नहीं होता, वैराग्य की दृष्टि कठोर होने के कारण जो इन्द्रियों को विषय की
बात भी नहीं करने देता, इतना कठोर मनोनिग्रह होता है उसका। वह धारणा निग्रह दृढ़ रखता है। श्रवण और
मनन कर मेरे स्वरूप का अनुसन्धान करता है। अखण्ड मेरा ही ध्यान करता है। मन को तिलभर के लिये भी
ढलने नहीं देता। धारण के बल से आत्मस्वरूप में मन स्थिर रखता है, जरा भी नहीं ढलने देता। निजबोध से