श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 547, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय ५३१
अश्व को अपने वश में करता है। अपने वश में रखने की मालिक की इच्छा अश्व जानता है और घोड़े का मन
एक होने पर घोड़ा भी बिना लगाम के मालिक की आज्ञा से काम करने लगता है। अड़ना, उछलना-कूदना वह
छोड़ देता है और मालिक की मर्जी से उसकी इच्छा के अनुसार नाचने लगता है। इसी प्रकार मन का भी नियंत्रण
करना चाहिये। मुख्यतः हमें अपने मन पर विजय प्राप्त करनी चाहिये, यही परमयोग का साधन है। यही मैंने
तुम्हें पिछले श्लोक में बताया है। 'नृदेहमाद्यं' इस श्लोक के अन्त में कर्मवैराग्य के द्वारा मुक्ति मिलने की बात
कही थी। अब इस श्लोक में, उत्तम गति अभ्यास से ही प्राप्त होती है यह बताया है। लेकिन मुख्यरूप से
सांख्ययोग से ही मेरी प्राप्ति होती है, यही बात मैं तुम्हें बताने वाला हूँ। उसका सारांश यही है कि संसार की
स्फूर्ति मिथ्या है और ब्रह्मसाक्षात्कार ही सत्य है। यह निरूपण गहन ज्ञानात्मक है। फिर भी वह गुह्यज्ञान मैं तुम्हें
बताऊँगा। वह त्रिगुण में विद्यमान होते हुए भी गुणकार्य से अलिप्त रहता है। मैं तुम्हें गुह्यज्ञान बताऊँगा यह
सुनकर उद्धव स्वयं कान बन गया और श्रवण करने के लिये अत्यन्त सावधान होकर बैठ गया। उद्धव की यह
आतुरता देखकर व्याकुल चित्तरूपी चकोर को तृप्त करने वाला चन्द्रमा तथा आत्मज्ञानरूपी गुणों के समुद्र
यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने क्या कहा ?
सांख्येन सर्वभावानां पतिलोमानुलोमतः।
भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत् प्रसीदति ॥ २२ ॥
सृष्टि के प्रारम्भ में जो अलिप्त रहता है और सृष्टि की स्थिति में महत्तत्त्वादिकों से लेकर देह तक व्याप्त
रहने वाला जो तत्त्व होता है, वह ब्रह्म है। सृष्टि की विशेष स्थिति में गुणकार्य को वही प्रकाशित करता है,
अन्त में गुणकार्य को ग्रस लेता है और अवशेष भी वही रहता है। अलंकार बनवाने से पहले भी वह सुवर्ण
रहता है, अलंकार बनवाने पर भी उसका सुवर्ण वाला गुण कम नहीं होता और अलंकार तुड़वाने पर भी सुवर्ण
को कोई भय नहीं है। बादल आने के पहले आकाश शुद्ध रहता है और बादलों के भीतर, बाहर भी आकाश ही
रहता है। उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय इनके अन्त में परब्रह्म अलिप्त स्थिति में एकत्र रहता है।
उद्धव ! उससे सम्बन्धित विचार भी तुम्हें सुनाऊँगा। कुम्हार जो भी बर्तन तैयार करता है उसमें मृत्तिका व्याप्त
रहती है, उसी प्रकार जो-जो तत्त्व उत्पन्न होता है, वह सब परब्रह्म से व्याप्त रहता है। समुद्र में जो लहर उत्पन्न
होती है, उसमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, उसी प्रकार महत्तत्त्व से देह तक भीतर-बाहर केवल चित्तस्वरूप
ही रहता है अथवा जो भी पदार्थ उत्पन्न होता है, वह निश्चय ही आकाश से ही व्याप्त रहता है, उसी प्रकार जो
भी तत्त्व उत्पन्न होता है, वह चैतन्यरूप से ही व्याप्त रहता है। इस प्रकार परब्रह्म से अलग कुछ भी नहीं
दिखायी देता। उसी प्रकार पृथ्वी से प्रकृति तक लय देखें तो जिस प्रकार जल का प्रवाह जल में ही रहता है,
उसी प्रकार सारे तत्त्वों की लय भी उस चित्स्वरूप में ही रहती है। प्रकृति आदि तत्त्व प्रबल होते हैं जो विकार
के कारण विलीन हो जाते हैं। परन्तु परब्रह्म वस्तु अलिप्त अवस्था में उसी प्रकार विद्यमान रहती है। उद्धव !
सारांश यही है कि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होने पर भी परब्रह्म अविनाशी होते हुए अलिप्त ही रहता है। वह
नित्य शुद्ध-बद्ध-मुक्त स्वभाव का ही रहता है इसे ध्यान में रखो। जहाँ ऐसा परब्रह्म है वहाँ संसार की कल्पना
ही मिथ्या है। जिस प्रकार भ्रमित मनुष्य रस्सी को सर्प समझ कर व्यर्थ ही काँप उठता है, उस सर्प को बाहर
फेंक कर रस्सी को शुद्ध नहीं कर लेता, उसी प्रकार चारों ओर परमानन्द ही भरा हुआ है ऐसा श्रीकृष्ण ने
कहा। ऐसी वस्तु जहाँ है वहाँ मन भी अपना मन भूल जाता है और इसी साधन से साधक भी पूरी तरह