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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 560, कुल 869 में से

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पृष्ठ 560

५४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शुद्धयशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।
द्रव्यस्य विचिकित्सार्थंगुणदोषौ शुभाशुभौ ॥ ३ ॥
पंचमहाभूत एक समान हैं। उसी प्रकार परब्रह्म भी सर्वत्र समसमान ही है। वहाँ गुणदोष मिथ्या है। लेकिन
वे उपर्युक्त उद्देश्य से ही प्रमाणभूत हुए हैं। श्रुति या स्मृति के बताने से पहले सभी प्राणियों में आविद्यक विषय
प्रवृत्ति स्वाभाविक ही रहती है। ऐसी विषयवासना प्राकृतिक होने के कारण, उसकी निवृत्ति के लिये ही अनेक
प्रकार के गुणदोष बताये गये हैं। विषय की बाधा दूर करने के लिये एक शुद्ध और एक अशुद्ध, उधर का शुभ
और इधर का अशुभ, यह वेदवाणी के रूप में मैंने ही बता दिया है। विषयों की निवृत्ति की स्तुति वेदरूप में मैंने
ही की है। मन में घृणा उत्पन्न करने के लिये विषय वृत्ति की निन्दा भी मैंने ही की है। कर्म प्रवृत्ति चलते समय
विषयों की निवृत्ति होती रहे ऐसा उपाय मैंने वेद के द्वारा कर रखा है वही तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।
दर्शितोऽयं मयाऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम् ॥ ४ ॥
उद्धव ! तुम सचमुच ही निष्पाप हो इसलिये तुम्हारी बुद्धि भी शुद्ध है। इसलिये धर्मादि व्यवहार सिद्धि या
विधि भी तुम्हें बताता हूँ। धर्माचरण करते समय भी प्रवृत्ति धर्म अप्रमाण है। निवृत्ति धर्म ही अत्यन्त शुद्ध है।
यही स्वधर्म के गुणदोष हैं। विषय की आसक्ति से जो भी व्यवहार किया जाता है, वह अशुद्ध ही है और
उपकार की दृष्टि जो व्यवहार करे वह देवताओं को तथा मनुष्यों को भी वंद्य होता है। अदृष्टदाता ईश्वर है,
यह बात बड़े-बड़े पुरुष भी भूल जाते हैं और नीचों के द्वार-द्वार घूमते हैं। वह अमंगल यात्रा है किन्तु स्वयं
आलस त्याग कर कीर्तन आदि का श्रवण करना अथवा तीर्थयात्रा करना साधुओं का दर्शन करना, अथवा पूजा
के लिये मन्दिर जाना अथवा अनाथ का दाहसंस्कार करना आदि से अगणित पुण्य का लाभ होता है। इतना ही
नहीं बल्कि इससे पग-पग पर कोटि-कोटि यज्ञों का फल उत्पन्न होता है। जिसके योग से संसार पार किया जा
सके उसी का नाम है पवित्र यात्रा। यही वेद में बताये अनुसार यात्रा पर जाना और यही गुणदोषों का विचार
है। राजा अपने जूते ब्राह्मण के सिर पर रखे तो उसका दोष ब्राह्मण को नहीं लगता बल्कि राजा स्वयं ही दोषी
होता है। उसी प्रकार आपातकाल आने पर यदि उपवास करने पड़े तो नीच का अनाज लेकर प्राण बचाने में
कोई दोष नहीं है। लेकिन यदि वही नीच का दान आपातकाल न होने की स्थिति में लिया जाय तो महादोष
लगता है। यह भी वेद में हीं बताया गया है। प्रसिद्ध मनु-पराशर आदि शुद्ध कर्मधर्म प्रवर्तकों ने अनेक प्रकार
से गुणदोष और शुद्ध-अशुद्ध की चर्चा की है। वही गुणदोषों के विभाग और शुद्धाशुद्ध विषय सम्बन्धी निरूपण
स्वतः नारायण तीन श्लोकों में कर रहे हैं।
भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातवः।
आब्रह्मस्थावरादीनां शारीराआत्मसंयुताः ॥ ५ ॥
वेदेन नामरूपाणि विषमाणिसमेष्वपि।
धातूषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये ॥ ६ ॥
ब्रह्मदेव से लेकर स्थावरजंगम तक सभी प्राणियों में पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश ये पंचमहाभूत
समसमान ही हैं। जिसे नाम और रूप नहीं है, गुण नहीं है और कर्म भी नहीं है, ऐसे सम ब्रह्म के लिये मेरे वेद