श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय ५४५
ने लोकल्याण के लिये नामरूप के भेद बना रखे हैं। नीचे पृथ्वी और ऊपर आकाश ये दोनों एक से दिखाई देते हैं
किन्तु विभिन्न देशों में जाने में सुविधा हो इसलिये दस दिशाओं की कल्पना की गयी है। उसके अनुसार नाम,
रूप और वर्णाश्रम यह मेरे वेद ने सम और विषम जो उत्पन्न कर रखा है, वह स्वधर्म कर्म की सिद्धि के ही लिये
है। इसी द्वार से मैंने पुरुषों के हित के लिये उत्तम लक्षणों से युक्त धर्मार्थकाम मोक्ष साधनों के नियम अथवा
नियंत्रण वेदाज्ञा के रूप में किया है। रूप, नाम, आश्रम, वर्ण इनके सम्बन्ध में यदि नियम नहीं बनाये गये होते तो
व्यवहार चल ही न पाता। फिर मोक्षसाधन कैसे होता ? इस प्रकार वेद ने व्यवहार चला कर उसी में परमार्थ
विचारों का चमत्कार भी दिखा दिया है, लेकिन जो भाग्यवान होगा उसी को वह दिखायी देगा। कर्म पर यदि
अधिक जोर दिया जाय तो पुरुष कर्मठ होकर रह जायेगा, उससे परमार्थ सिद्ध नहीं होगा; उलटे उसे विधिनिषेध
का कष्ट भोगना पड़ेगा और यदि स्वधर्म कर्म को बिलकुल छोड़ दिया जाय तो पाखण्ड अपना प्रभाव दिखाएगा।
इससे मोक्ष हाथ न लगकर अपने हितों की ही हानि होगी। इसलिये स्वधर्म का आचरण करते समय, लगे हाथ
मोक्षलाभ भी प्राप्त हो ऐसी वेदार्थ की योग्यता जिसकी समझ में आयेगी, वही ज्ञाता बुद्धिमान है। लेकिन यह वेद
के अर्थ रहस्य सहसा किसी के हाथ नहीं लगता। इसीलिये परमार्थ मार्ग दिखलाने वाला गुरु चाहिये। उस
सद्गुरु की पूर्ण कृपा होगी तो वेद का रहस्य हाथ लगेगा। गुरुकृपा के बिना आप जो भी साधन करें वे सब
साधकों का अहित ही करते हैं। इसलिये मेरा वेद संसार का गुरु है। उसने वस्तुतः व्यवहार दिखाया है, जन-जन
का उद्धार करने के लिये स्वधर्म कर्म को नियमबद्ध किया है। इस प्रकार मेरा वेद जनहितकारी है। वह नाना
प्रकार के गुण-दोष दिखाकर लोगों को विषयों से बाहर निकालता है। इस प्रकार वेद सारे संसार का उपकारी है।
देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।
गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम् ॥ ७॥
उद्धव भक्तों में अत्युत्तम तथा साधु लक्षणों के अनुसार साधु की ही तरह होने के कारण श्रीकृष्ण उसे
अत्यन्त प्रेम से 'सत्तम' अर्थात् साधुश्रेष्ठ कहकर बुलाने लगे। उद्धव! इस संसार में चाहे जो मनुष्य, मनचाहा
कर्माचरण न करे इसलिये वेदों ने वर्णाश्रम का नियम बना दिया है। जहाँ कर्मतंत्र नहीं करना चाहिये ऐसे
अपवित्र देश, अपवित्र काल और वस्तु की पवित्रता-अपवित्रतता का विचार भी तुम्हें सुनाऊँगा।
अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत् ।
कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीटासंस्कृतेरिणम् ॥ ८ ॥
पृथ्वी पर किसी स्थान पर मेघवृष्टि नहीं होती लेकिन वहाँ के खेत हरे-भरे दिखायी देते हैं। उस जमीन
को 'तराई' कहते हैं। उसी पृथ्वी पर कहीं पथरीली जमीन रहती है वहाँ मूसलाधार पानी बरसने पर भी उस
जमीन में अंकुर नहीं फूटता। उसी प्रकार देश की शुद्धि-अशुद्धि के सम्बन्ध में भी तुम्हें सविस्तार बताता हूँ। जहाँ
कर्म से कार्यसिद्धि नहीं होती, वहाँ कर्म बिलकुल नहीं करना चाहिये। जहाँ कृष्णमृग नहीं होता उस भूमि को
अपवित्र समझना चाहिये। वहाँ कभी भी कर्म करने का प्रयास नहीं करना चाहिये। उसी प्रकार जहाँ ब्राह्मण न हो
वह देश अपवित्र है अथवा जहाँ निषिद्ध कर्म करने वाले ब्राह्मण हों वह भूमि भी अपवित्र है। उसी प्रकार जहाँ
ब्राह्मणों के प्रति भक्ति नहीं है, बल्कि उनकी निन्दा कर उनकी अवहेलना भी करते हैं वह देश भी कर्म करने के
लिये सचमुच अपवित्र है, यह ध्यान में रखो। किसी देश में कृष्णमृग रहते हैं, किन्तु भगवद्भक्ति नहीं होती, वह
देश भी कर्म के लिये निश्चित रूप से अपवित्र है यह जान लो। कीकट, कलिंग और मागध ये देश भक्तिहीन