श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 550, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें५३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही स्तवन, कान में मेरी ही कथा और मेरा ही कीर्तन और हाथों से सदासर्वदा मेरा ही पूजन। पैरों से प्रदक्षिणा
करें अथवा यात्रा पर जायें। अष्टांगों ने सर्वकाल मुझे ही नमन करें। इस प्रकार अनन्य भाव से मेरा भजन कर,
मेरी ही भक्ति में लीन रहना। इस प्रकार जो मेरी भक्ति में निमग्न रहते हैं, उनका मैं चक्रपाणी दास बन जाता हूँ।
त्रिभुवन में उसके सिवा मैं किसी को नहीं चाहता। इस प्रकार मेरा भजन करने पर योग आदि का स्मरण भी
आवश्यक नहीं है। उद्धव ! मैं श्रीकृष्ण भक्ति के सिवा और किसी भी वस्तु से प्राप्त नहीं हो सकता। अस्तु !
संयोग से यदि योगयों के हाथ से पाप हो जाय तो उसे कर्मप्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं है। यही बात
श्रीकृष्ण बताते हैं।
यदि कुर्यात् प्रमादेन, योगी कर्म विगर्हितम्।
योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन ॥ २५॥
भक्त से हाथ से निंद्य कर्म होता नहीं है क्योंकि उसके आगे-पीछे उसकी सुरक्षा के लिये मैं रहता हूँ। तब
वह निंद्यकर्म योग के जिम्मे आता है। योग में कभी गलती से ऐसा घट जाता है। इस प्रकार गलती से जो पातक
होता है उसके लिये उसे अत्यन्त पश्चात्ताप होता है। जिस प्रकार अग्नि से सर्प डरता है उसी प्रकार वह पातक से
डरता रहता है। सिंह पर मधुमक्खी बैठने पर वह जिस प्रकार अंग झाड़ता है, उसी प्रकार योगी भी पातक को
देखकर अनुताप करता रहता है। ऐसे समय उसे सावधान होकर योगबल से ही सारे पातकों का क्षालन करना
चाहिये। यही योगी का प्रायश्चित्त है। यदि इस योगस्थिति को छोड़ वह देह में गोबर माटी लगाने दौड़े तो वह
निश्चय ही लुट जायेगा। इससे पापों का क्षालन नहीं होगा। यदि हृदय में अनुताप नहीं हुआ है और शास्त्रों के
वचन के अनुसार यदि दिखावे के लिये गोबर माटी लगाता है तो उससे पापों की निवृत्ति नहीं होगी। आधा क्षण
भी मेरा ध्यान करने से करोड़ों पातक भस्म हो जाते हैं फिर औरों की क्या कथा की जाय ? ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण
कहते हैं। जिसका अधिकार मुझे ध्यान करने के लिये उपयुक्त है उसे दूसरा कोई प्रायश्चित्त करने के लिये कहने
से कहने वाले को ही दोष लगेगा। इसलिये यहाँ मुख्य रूप से अधिकार ही प्रमाण है। इसी विषय का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं।
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।
कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः ।
गुणदोषविधानेन सङ्गानां त्याजनेच्छया ॥ २६ ॥
मनुष्य की स्वभाव से ही विषय में प्रवृत्ति रहती है। उसकी निवृत्ति करने के लिये ही मेरी वेदोक्ति प्रकट
हुई है। विषयों का एकाएक त्याग करने में लोग असमर्थ रहते हैं, उन्हें विषय छोड़ने के लिये ही वेद उसके
गुणदोष दिखा देता है। यह माँ है, यह बहन है इनसे व्यभिचार नहीं करना चाहिये यह बात यदि वेद ने नहीं
बतायी होती तो विषयों के सम्बन्ध में चाहे जैसा व्यवहार हुआ होता। जब तक समाज में स्त्री-पुरुष हैं, तब
तक कामसंचार तो होगा ही इसलिये मैंने यदि वेदोक्ति से नियम न बना दिये होते तो भीषण व्यभिचार मच
गया होता। इसलिये और सारी स्त्रियों को छोड़कर अन्य वर्गों को छोड़कर आठ वर्ष की अपनी ही जाति की
स्त्री को विवाह योग्य समझना चाहिये। अग्नि और ब्राह्मण की साक्षि में वेदोक्त रीति से पाणिग्रहण करें तथा
अन्य स्त्रियों की आन लेकर यथाविधि स्वपत्नी से ही रममाण हों। इस प्रकार सभी लोगों को स्त्रीभोगों के प्रति
अत्यन्त आसक्त देखकर वेदोक्ति ने स्वदारागमन को ही सबसे योग्य निश्चित कर पुरुष को एकनिष्ठ बना दिया