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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

३९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार हमारी प्रकृति अनेक प्रकार के मतों से पुष्ट हुई है यह ध्यान में रखो। वह मतवाद पूर्णतयः ठीक
है यह बात जब मन में धँस जाती है तो वही चित्त में घर कर जाती है। स्वप्न मिथ्या रहता है फिर भी सोये हुए
मनुष्य को वही सच मालूम होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न मतों की बातों को वे सच ही मान लेते हैं। यह
वेदवेत्ताओं की बात हुई। किन्तु जिनका वेदों पर अधिकार नहीं है उन्हें उपदेश परम्परा से चले आ रहे भिन्न-भिन्न
मत ही सच मालूम होते हैं। किसी की विचारशैली वेदों के विरुद्ध रहती है। वे अपने मत के अनुसार पाखण्ड
मत की ही स्थापना करते हैं और वही शिष्यों के मन में भर देते हैं।
मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ।
श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि॥ ९॥
उद्धव! विभिन्न प्रकार की वासनाएँ गुणों के अनुसार बनी रहती हैं। इससे पुरुषों की प्रकृति भी भिन्न-भिन्न
हो जाती है। लेकिन इन सबको उत्पन्न करने के पीछे मेरी माया ही है यह निश्चित रूप से जान लो। मेरी ही
माया से श्रेष्ठ लोग भी मोहित हुए हैं, लोगों का विवेक नष्ट हुआ है और उन्हें मोक्षमार्ग का विस्मरण होकर वे
विषय लंपटता की ओर उन्मुख हुए हैं। हे पुरुषश्रेष्ठ उद्धव! सुनो। इस प्रकार लोगों की निष्ठा भ्रष्ट हो जाने के
कारण मोक्ष का द्वार चूक जाता है और वे गलत साधकों के प्रयासों की बात करते रहते हैं। वे अनेक प्रकार के
साधनों की चतुराई जो अपने-अपने मतवाद का प्रतिपादन करती हैं उनका उल्लेख भी श्रीकृष्ण डेढ़ श्लोकों में
करते हैं।
धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम्।
अन्ये वदन्ति स्वार्थं वा ऐश्वर्यं त्यागभोजनम्।
केचिद्यज्ञतपोदानं व्रतानि नियमान् यमान्॥ १०॥
अब इस सम्बन्ध में मीमांसकों का मत है कि काम्यकर्म को निषिद्ध मान कर उसे हटा कर शेष कर्म मुख्य
साधन हैं जिनसे मोक्ष प्राप्त होता है। काव्य, नाटक तथा अलंकार शास्त्र के रचयिता कवित्त्व को ही प्रमुख साधन
मानते हैं। विभिन्न प्रकार की कविताएँ, पद्य और उनकी रचना पद्धति से प्राप्त कीर्ति से ही मोक्ष प्राप्त होता है
ऐसा उनका मानना है। महान कवियों का मत है कि हमारी काव्यकीर्ति के कारण ही हमें सहज ही मोक्ष प्राप्त
होगा। श्रेष्ठ कवियों में इस प्रकार का पागलपन होता है। वात्स्यायन आदि कामशास्त्रियों का अभिप्राय इसके
विपरीत दिखायी देता है। काम के सुखोपभोग से मोक्ष प्राप्त होगा ऐसा उनका मानना है, इसलिये वे सदा
कामसेवन करने के लिये कहते हैं। सांख्य योग के मतावलम्बियों का कहना है कि सत्य, शम, दम आदि जो
सम्पत्ति है, वही मोक्ष का साधन है। उनका यही निश्चय है। नीतिशास्त्रियों के अनुसार सार्वभौम राज्य प्राप्त हो
जाय तो वही मोक्ष है। उसमें साम, दान आदि साधन हैं। किसी का मत है कि चुटिया और यज्ञोपवीत का त्याग
करने मात्र से ही मोक्ष का मार्ग प्राप्त हो जाता है। वे उसी मार्ग को अत्यन्त उत्तम समझते हैं। जो देहात्मवादी हैं
उनका योगमार्ग यही है कि इच्छा के अनुसार मिलने वाले भोगों को भोगना चाहिये। कैसा स्वर्ग और कैसा नर्क !
मरने के बाद कौन जन्म लेता है? किसी के लिये अश्वमेध, राजसूय यज्ञ यही मोक्षमार्ग होता है। मूर्ति की
यथाविधि उपासना करना, उसकी विधिपूर्वक पूजा करना इसी को कुछ लोग मोक्षमार्ग का साधन समझते हैं।
कुछ लोगों का मत है अनेक प्रकार के कष्ट सह कर शरीर का शोषण कर तप करना, यही मोक्ष का सबसे सरल
मार्ग है। कुछ लोग कहते हैं कि दान करना यही मोक्ष प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन है। याज्ञिकों के अनुसार व्रतों

चौदहवाँ अध्याय ३९९
का पालन करके रहना यही मोक्ष का साधन है। कुछ लोगों की विचार शैली के अनुसार व्रत, नियम आदि का
अवश्य पालन करना चाहिये। इस प्रकार अपने-अपने मतों के अनुसार प्रयास कर लोग अनेक प्रकार के साधनों
का महत्त्व प्रतिपादित करते रहते हैं। लेकिन इन सभी प्रकार के साधनों का विचार करने पर ज्ञात होता है कि ये
सब नाशवान हैं। यही बात कृपामूर्ति श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिताः।
दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठाः क्षुद्रानन्दाः शुचार्पिताः ॥ ११॥
फल की आशा और देह का अभिमान त्याग कर जो अपने साधन मुझे अर्पण नहीं करते, उनके साधनों का
फल दुःखस्वरूप होता है यह स्मरण रखो। वे बार-बार जन्म-मरण देते हैं। उन साधनों को जो साध्य करते हैं वे
सब नाशवान और क्षणिक होते हैं। उस लोक का जो सुख होता है वह शक्कर में मिले हुए विष की तरह होता
है। उसमें मिठास रहती है किन्तु उसमें मृत्यु अटल रहती है। उसके अनुसार उस लोक का आनन्द भी क्षुद्र और
शोक का कारण होता है। जो अपने ही कर्म से मलिन हो गये उन्हें सुख किस बात का होगा ? उसमें निरन्तर
बढ़ता जाने वालो दुःख ही रहता है और अद्यतम नरक की प्राप्ति ही उसका अन्तिम परिणाम होता है। जो मन
भोगों के प्रति आसक्त होता है उसे सदा विषयों की ही चिन्ता लगी रहती है। उन विषयों की आसक्ति के कारण
ही तमोगुण की वृद्धि होकर वह अधःपतन की ओर जाता है। लेकिन इन्हीं साधनों से जो प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति
करेगा, उस भक्ति का स्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
मय्यर्पितात्मनः सभ्य निरपेक्षस्य सर्वतः।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत् कुतःस्याद् विषयात्मनाम् ॥ १२ ॥
भक्ति से प्राप्त होने वाले आत्मसुख का महत्त्व बताने के लिये ही भगवान ने उद्धव को सम्बोधित करते हुए
कहा, "उद्धव ! भक्तिसुख का पात्र होने वाले भाग्यवान सचमुच तुम ही हो। इसे भक्तिसुख का भाग्य प्राप्त हुआ है
इसलिये इसे 'सभ्य' कहना उचित है ऐसा भगवान के मन में आया और 'हे सभ्या!' जैसा सम्मानसूचक सम्बोधन
देकर भगवान भक्ति सुख का वर्णन करने लगे। मेरे स्वरूप को प्राप्त करने के लिये इहलोक की भोगासक्ति से वैसे
ही दूर करना होगा जिस प्रकार रजस्वला स्त्री पति को स्पर्श नहीं करती और उससे दूर रहती है। मेरा ही अनुसंधान
साध्य कर लेने से उसकी वासना परलोक का स्पर्श ही नहीं करती। वह ब्रह्मलोक का भी धिःकार करती है फिर
औरों की क्या बात है ? ऐसी निरपेक्षता से मेरा भजन करते-करते जब अंतःकरण में प्रेम उत्पन्न होने लगता है तो मैं
उनमें अपने आप ही आत्मस्वरूप में प्रकट हो जाता हूँ। वास्तव में यहाँ 'मैं प्रकट होता हूँ' यह कहना भी व्यर्थ है
क्योंकि मैं सदा हृदय में ही वास करता रहता हूँ। जब चित्तवृत्ति निर्विकल्प हो जाती है तभी मैं दिखायी देता हूँ।
बादल दूर हटते ही उसके पीछे छिपा हुआ सूर्य भी दिखायी देने लगता है उसी प्रकार विषयावस्था दूर होते ही मैं भी
प्रकट हो जाता हूँ। उसी प्रकार भक्तों के भावार्थ तथा भक्ति सामर्थ्य से जब मैं प्रकट होता हूँ तो भक्त के मन में
विषय की बात ही नहीं आती। विषयावस्था छोड़कर जब चित्त मत्स्वरूप की ओर लग जाता है तो भक्तों को अपने
आप ही मत्स्वरूप प्राप्त होता है। लौह का स्पर्श पारस से भले ही एक ओर से ही हो लेकिन पूरा लौह सुवर्ण बन
जाता है। उसी प्रकार जब मेरे भक्त मेरे ही ध्यान में लीन हो जाते हैं तो उनका सर्वांग ही ज्ञानमय हो जाता है। उस
समय भक्तों को जो सहज सुख प्राप्त होता है उसे नापने का क्या मापदण्ड हो सकता है ? जिस आत्मसुख की प्राप्ति
के लिये शंकर ने श्मशान में रहना स्वीकार कर लिया वह सुख ब्रह्मदेव को कैसे प्राप्त होगा ? इसीलिये उसे मैंने

४०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
बताया। भक्त जब मेरे सुख का उपभोग करते हैं तो देहादि जन्म-दुःख भूल जाते हैं। वे भूख-प्यास भी भूल जाते हैं।
आत्मसुख से वे ओतप्रोत हो जाते हैं। ऐसे आत्मसुख का माधुर्य भला विषय लंपट लोगों को कैसे मिल पाएगा?
लाखों रुपया खर्च करने पर भी उन्हें उस सुख की एक कौड़ी प्राप्त नहीं होगी। धन, धान्य, पुत्र, सगे-सम्बन्धी
आदि सर्वस्व देने पर भी उस सुख का कण भी उन्हें प्राप्त नहीं होता। इतना ही नहीं बल्कि जब सत्यलोक में रहने
वाले लोगों को भी वह सुख नहीं प्राप्त होता तो औरों की क्या कथा? फिर ब्रह्मदेव को भी वह सुख कैसे
मिलेगा? मुझ आत्मा को सुख की प्राप्ति होने से सारे इन्द्रिय सुखस्वरूप हो जाते हैं। उस सुखस्थिति का एक
सहस्रांश भी स्वर्गादि लोक के लोग नहीं प्राप्त कर सकते। अपने निष्काम, निर्लोभ तथा गर्वहीन भजन करने वाले
निर्मत्सरी तथा निरभिमानी भक्तों को मैं अपना पूर्ण सुख देता हूँ इसे ध्यान में रखो। सचमुच देश और काल की सीमा
से परे मेरे अगाध आत्मसुख पर मेरे भक्तों का वास रहता है।
अकिंचनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतसः।

चौदहवाँ अध्याय ४०१
के साथ समुद्र से घिरी हुई सारी पृथ्वी का साम्राज्य स्वयं ही सामने आ जाय तो मेरे भक्त उस पर थूकते हैं। नरक
में पड़े हुए चने सुअर को भले ही अच्छे लगें लेकिन बुद्धिमानों को उसे देखकर घिन लगती है। उसी प्रकार मेरे
भक्तों ने सार्वभौम राज्य का भी त्याग किया रहता है। रसातल आदि सभी पातालों में अमृतादिक सभी भोग प्राप्त
होने पर भी मेरे भक्त उन पर लात मारते हैं। मुँह में रखे हुए अमृतफल को फेंक कर कोई बुद्धिमान पुरुष घास
का गोला नहीं खायेगा। उसी प्रकार मेरा सौख्यलाभ छोड़कर मेरे भक्त रसातलादिक सुख भोगों की ओर नहीं
जाते। जहाँ देवतागण, महान पुरुष तथा नाग भी वन्दन करते हैं वह श्रेष्ठ अमरावती प्राप्त होने के बाद मेरे भक्त
उसका उसी प्रकार त्याग करते हैं जिस प्रकार लोग कस्तूरी मिलने पर मिट्टी फेंक देते हैं अथवा मेरी भक्ति से
सुखसम्पन्न होने वाले मेरे भक्तगण इन्द्रादिक देवताओं को वंद्य ब्रह्मलोक को भी तुच्छ मानते हैं। मट्ठा और दूध
आँखों को सफेद ही दिखायी देता है लेकिन ज्ञाता दूध ही होठों से लगाते हैं और मट्ठा रख देते हैं। उसी प्रकार
जो मूर्ख हैं वही सत्यलोक और भक्ति के सुख को एक समान कहेंगे। लेकिन मेरे जो भक्त भक्ति से शुद्ध रहते हैं
वे सत्यलोक का धिःकार ही करते हैं अथवा इन्द्र पद, ब्रह्मलोक, पाताललोक के ऐष आराम, अमृतपान ये सब
एक साथ प्राप्त कराने के लिये सारी सिद्धियाँ तैयार हो जाएँ या जिन महासिद्धियों को प्राप्त करने में योगी सारी
विधियाँ करके थक जाते हैं वे भी यदि सामने खड़ी हो जाएँ तो भी सद्बुद्धिवाले भक्त उनका स्पर्श नहीं करते।
उद्धव! मेरे भक्त उन अणिमादिक सिद्धियों पर लात मार कर मेरे भक्तिमार्ग पर लग गये हैं। इन सिद्धियों की कथा
का क्या वर्णन करें? किन्तु सलोकता, निकटता अथवा मेरा स्वरूप देने वाली सायुज्यता भी यदि उन्हें दी जाय तो
भी मेरे भक्त सलोकातादि मुक्ति कभी ग्रहण नहीं करते। जिसके आगे काल की सत्ता भी नहीं चलती, जिसमें
जन्म-मरण के फेरे नहीं होते, वह सायुज्यता मुक्ति भी मेरे भक्त स्वीकार नहीं करते। पहले अलगाव स्वीकारे और
फिर सायुज्यमुक्ति से एक हो जायें यही बात असंगत है। इसलिये मेरे भक्त सायुज्य मुक्ति कभी स्वीकार नहीं
करते। भक्ति के सुख से ही उनकी वृत्ति प्रसन्न रहती है इसलिये उन्हें मेरी भक्ति ही अच्छी लगती है। चारों
मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़े, फिर भी मेरे भक्त उन्हें स्वीकार नहीं करते। लोकों में नहीं समाते। मेरे सिवा चारों
मुक्तियों से जो सुख प्राप्त होता है उसे मेरे भक्त कभी ग्रहण नहीं करते क्योंकि वे मेरी अभेद भक्ति से सराबोर
रहते हैं। मेरे सिवा जो भी कोई सुख रहता है उसे वे तुच्छ समझ कर छोड़ देते हैं। मेरे भक्तों को मेरे भजन में ही
अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है। अब शायद तुम यह सोचोगे कि भक्त निरे पागल हैं, उन्हें तुम्हारे भजनों में ही
आनन्द प्राप्त होता है। परन्तु तुम्हें उनके प्रति चाह या गहरी प्रीति नहीं होगी। किलनी को भैंस अच्छी लगती है
लेकिन भैंस किलनी को नहीं चाहती, उसी प्रकार भक्तों को तुमसे प्रेम हो लेकिन तुम्हें उनसे प्रेम न हो। भव्य,
भजन और भजनेवाला यह त्रिकुट ही मूलतः अविद्या से उत्पन्न है अर्थात् मिथ्या है अतः ऐसे अविद्यायुक्त
भजनमार्ग में तुम्हें रुचि न हो। जिस प्रकार स्वप्न मिले निमंत्रण पर कोई जागृत होने पर भोजन करने नहीं जाता
उसी प्रकार अविद्यायुक्त मिथ्या भजन से तुम प्रेम करो यह संभव नहीं है। इस शंका का सारांश जानकर भगवान
कहते हैं कि यदि भजन में भक्त की भक्ति शुद्ध हो तो वहाँ मुझे भी अत्यन्त प्रेम रहता है। मुझसे जो जैसा
व्यवहार करता है, उससे मैं भी वैसा ही व्यवहार करता हूँ। भक्त को मेरे प्रति अनन्य भक्ति रहती है इसलिये मैं
भी उस पर अनन्य भक्ति रखता हूँ।
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ॥ १५॥
मेरे भक्तों का मुझ पर कितना प्रेम है यह मैं श्रीकृष्ण ही जानता हूँ। उस प्रीति की उपमा देने के लिये

४०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्रिभुवन में कोई वस्तु नहीं है। मेरी भक्ति से जो मुझसे अनन्य हो जाता है, तभी उसका अज्ञान समाप्त हो
जाता है। ऐसे भक्तों की मुझसे जो प्रीति होती है वह कितनी है यह कैसे बताऊँ ? ब्रह्मदेव तो मेरा पुत्र ही है।
उसके सारे लाड़-प्यार मैं करता हूँ। लेकिन भक्तों की वैसी प्रबल प्रेमलहर वहाँ नहीं उठती। मैंने ब्रह्मदेव को
कर्मयोग दिया और भक्तों को निष्कर्मता दी। इसीलिये ब्रह्मदेव की प्रार्थना पर भी मैं वहाँ नहीं गया और
ग्वालों के घर का भात खाया। ब्रह्मदेव को नीचा दिखा कर मैं तो बछड़ा और ग्वाल बना। सारांश, मेरे भक्तों
जैसी प्रीति मुझे ब्रह्मदेव के प्रति भी नहीं है। ब्रह्मदेव की बात तो है ही, बलराम तो मेरा बड़ा भाई है लेकिन
भक्तों जैसी प्रीति सचमुच उससे भी नहीं है। कौरवों से जा मिले बलराम को नीचा दिखा कर मेरे भक्त
पाण्डवों का मैंने संरक्षण किया। जब भीष्म ने प्रतिज्ञा की तो समरभूमि में मैंने ही पीछे हट कर भक्तशिरोमणि
धनुर्धारी अर्जुन को तुम्हारे सामने बचाया। लक्ष्मी मेरी पटरानी है लेकिन उसे मैंने अपने चरणों के पास सेवा
करने बिठाया और भक्तों में अग्रगण्य गोपियों और ग्वालिनों को कन्धे पर बिठाया। जो लक्ष्मी का पूर्णरूप से
तिरस्कार करते हैं वही मेरे लिये प्रीति से पूज्य हैं। जो मुझसे लक्ष्मी की माँग करते हैं उन्हें न लक्ष्मी ही
मिलती है न लक्ष्मीपति ही। सचमुच लक्ष्मी की उपेक्षा करने वाले भक्त ही मुझे अच्छे लगते हैं। शंकर मेरा
प्रिय है। लेकिन उससे भी अधिक प्रीति मुझे ऐसे भक्तों से होती है। जिस महादेव के गुण से मुझे भी अपने
शरीर पर साँवला रंग धारण करना पड़ा और जिस महादेव के कहने से मुझे दूसरी बार मोहिनी का रूप धारण
करना पड़ा उस मोहिनी के दर्शन में ही मैंने शंकर को तत्काल मोहित किया और रुक्मांगद को आधे क्षण में
ही उस मोहिनी से बचाया। इस प्रकार मेरे भक्तों की अपेक्षा शंकर भी मुझे अधिक प्रिय नहीं है। त्रिभुवन में
भक्तों के सिवा मुझे कुछ भी प्रिय नहीं है। वेदशास्त्रों में मेरी अत्यन्त पवित्र चतुर्भुज मूर्ति का वर्णन है।
लेकिन वही मैं अपने हृदय पर मेरे भक्त के पैरों के चिह्न (भृगुपदचिह्न) धारण करता हूँ। मुझे अपने देह से
भी प्रीति नहीं है, इसीलिये मैं बड़े आनन्द से ग्वाला बना और जंगल पर्वतों में गायें चराता रहा। इतना ही
नहीं बल्कि भक्तों की घोड़ियों को भी नहलाया। मैं स्वेच्छा से परिपूर्ण हूँ फिर भी प्रेमिल भक्तों के लिये सदा
सकाम रहता हूँ। प्रेमिल भक्तों की परम भक्ति देखते ही मैं आत्माराम वहाँ कूद पड़ता हूँ। प्रेमिल भक्त को
देखते ही मैं उसे अपने साथ ले आता हूँ और अगर ऐसा न हो सके तो मैं उसे परमोत्त्व सुख अर्पण करता हूँ
और अगर वह भक्त मेरे पास न आये तो मैं उसका चाकर बनकर रहता हूँ। बड़प्पन की मानमर्यादा छोड़ मैं
अपने भक्तों की जूठन तक उठाता हूँ। भक्त कार्य के लिये उसके संकट में मैं अपने प्राण तक न्योछावर कर
देता हूँ। हे उद्धव! तुम्हारे जैसे भक्त के लिये मैं अपने देह की भी उपेक्षा करता हूँ। वे भक्त मुझे दिन-रात
अच्छे लगते हैं। वे जीवभाव से मेरे लाडले हैं। प्रेम से मेरा भजन करने के कारण वे भक्त मुझे पूज्य बन गये
हैं। उन भक्तों के लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः ॥ १६ ॥
एकनिष्ठा से मेरा भजन करने से मन मेरे ही स्वरूप पर जम जाता है और समस्त वासनायें नष्ट होकर
वृत्ति शून्य हो जाती हैं। बिना किसी प्रकार का परिश्रम किये, किसी से याचना किये बिना, अपने आप मिला
हुआ धन हाथ से लेने में निरपेक्षता नष्ट होती है। फिर धन देखकर जो झुका उसे लालच ने झुका ही दिया।
इसलिये ऐसे धन की भी उपेक्षा कर जो वहाँ से चला गया वही मुझे पूर्णरूप से वन्दनीय है। रास्ते में पैसा

चौदहवाँ अध्याय ४०३

पड़ा हुआ और उसे अपना कहने वाला कोई न हो उसे भी यदि कोई अपने हाथ से उठाता है तो उससे
निरिच्छता नष्ट होती है। इच्छाशून्य स्थिति का नाम ही निरपेक्षता है। अब उस समय जो मननशीलता प्राप्त
होती है, उसे यथार्थ रूप से बताता हूँ। वेदशास्त्रार्थ ने मेरे जिस स्वरूप को प्रामाणिक माना है वह मेरा
अत्यन्त शुद्ध स्वरूप है, यह जान लो। उस स्वरूप के प्रति धारणा रखना इसी को मनन कहते हैं। उस स्वरूप
का विचार करते-करते मन ही स्वस्वरूपाकार हो जाता है। अर्थात् बिना धारणा के ही मनन होता है और
बिना किये ही स्मरण होता है। इसी का नाम है सच्ची मननशील स्थिति। इसे पूर्णरूप से सच मान लो। अब
इसके आगे शान्ति का स्वरूप बताता हूँ। सुनो। काम, क्रोध और लोभ का समूल उन्मूलन हुए बिना ही देह में
जो स्थिरता उत्पन्न होती है, वह यहाँ शान्ति नहीं हो सकती। मन में मत्स्य पर लक्ष स्थिर कर बगुला ध्यानस्थ
होकर बैठता है लेकिन उसके अंतःकरण में लोभ होने के कारण उसे शान्ति कौन कहेगा ? देह को देह का
भी भान न रहना, काम, क्रोध और लोभ का विलय हो जाना, ऐसी शान्ति किसी भाग्यवान को ही प्राप्त होती
है। इसी का नाम है, मुख्य शान्ति। हे उद्धव! मैं भी ऐसी ही शान्ति को मानता हूँ। अब इसके बाद तुम्हें
समता का रूप बताता हूँ, सुनो। समस्त प्राणि विविध प्रकार के हैं और उनके नाम भी अलग-अलग हैं। यह
सारा संसार ही विचित्र आकारों के कारण विषम बना हुआ है। लेकिन उन सब में परब्रह्म समान रूप से भरा
हुआ है। उठा-पटक में श्रम न कर, बिना तोड़-फोड़ किये, मेरे भक्तों को भक्ति के योग से ही सर्वत्र समानता
दिखायी देती है। मेरी भक्ति से समानता प्राप्त होते ही प्राणियों में भेद बुद्धि ही नष्ट हो जाती है। वह सहज
ही भेदभाव रहित हो जाता है। उसे सहज ही निर्वैरता प्राप्त होती है। जब तक द्वैत का भान रहता है, तभी
तक विरोध के लिये कोई कारण होता है। जब सर्वत्र एक ही व्याप्त है तो फिर बैरी कौन होगा? क्या कभी
आकाश आकाश से झगड़ा कर सकता है? या चन्द्र चन्द्र से ही लड़े? या वायु वायु को ही रोकेगा? या जीभ
ही जीभ के दो टुकड़े करेगी? भेद नष्ट होने का ही अर्थ है बैररहित होना। निरपेक्षता और मेरा मनन, शान्ति
और समदृष्टि तथा बैर रहित होना ये पाँच लक्षण मुख्य हैं। इन पाँच लक्षणों में से एक निरपेक्षता भी हाथ
लग जाय तो सायुज्यता मुक्ति पैर छूती है और ब्रह्मस्वरूप मन में स्थिर हो जाता है। निरपेक्ष मनुष्य का मन
स्थिर रहता है। जो निरपेक्ष है वह बैररहित है इसे समझ लो। जो निरपेक्ष है वही परिपूर्ण शान्त रहता है।
इसलिये मैं भी निरपेक्ष की ही सेवा करता हूँ। गिरि-कन्दराओं में गये बिना, विकट साधन सहन किये बिना
यदि ये पाँच साधन हाथ में आ जाएँ तो उनसे ही विश्व का उद्धार होगा। ऐसे भक्तों का दर्शन होने से लोग
तर जायेंगे इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। उनका केवल नामस्मरण करने से ही जड़ जीवों का उद्धार होगा। ये
पाँच लक्षण प्राप्त होने पर मेरे भक्तों को मुझसे भी अधिक पवित्रता प्राप्त होती है। मैं भी उनकी चरणधूलि
का वन्दन करता हूँ। समुद्र का पानी जब मेघ बनता है तभी उसमें माधुर्य आता है और वह सारे संसार को
शीतल करता है और अकाल का संकट दूर करता है। वही जल यदि समुद्र में रह जाय तो उसका कोई
उपयोग नहीं होता। उसी प्रकार मेरे भक्तों को मुझसे भी अधिक पवित्रता प्राप्त होती है। यदि केले का पेड़
खाने लगे तो उसमें कोई स्वाद नहीं होता लेकिन उसके केले अत्यन्त सुस्वादु होते हैं। उसी प्रकार मुझसे भी
अधिक मेरे भक्तों में पवित्रता बढ़ जाती है। मुझमें जो पवित्रता आयी है वह मेरे भक्तों के कारण ही है।
इसीलिये मैं अपने भक्तों के पीछे-पीछे उनके चरणों की धूल का वन्दन करने के लिये दौड़ता रहता हूँ। मेरे
चरणों का तीर्थ साक्षात शंकर भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं। सारांश मेरे भक्तों का जो सुख है वह सुख
की दृष्टि से अलौकिक है। वह सुख और कोई नहीं जानता और उसका वर्णन करने में वाणी भी असमर्थ है।

४०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निष्किंचना मय्यनुरक्तचेतसः शान्ता महान्तोऽखिलजीववत्सलाः।
कामैरनालब्धधियो जुषन्ति यत् तन्निरपेक्ष्यं न विदुः सुखं मम ॥ १७॥
जिनके पास मेरे सिवा फूटी कौड़ी भी नहीं है, वे मेरे सिवा इस संसार में किसी और को देखते ही नहीं
हैं। इस प्रकार मेरा भजन करने से जाति, कुल और देह का अभिमान सहज ही नष्ट हो जाता है। इसी का नाम है
'अकिंचन' और मेरे स्वरूप में मन तल्लीन रहता है इसलिये वहाँ आत्मशांति भी पूर्ण रूप से वास करती है।
ऐसी आत्मशांति में जब भक्ति परिणत हो जाती है समस्त प्राणीमात्र में उसे मेरे सिवा दूसरा स्वरूप दिखायी ही
नहीं देता। जिधर-जिधर भी जीव देखता है वहाँ वह स्वयं को मद्रूप हुआ देखता है। उस पूर्व परिचित आनन्द से
वह स्वाभाविक रूप से प्रेम करने लगता है। इस मद्रूपस्थिति से जीव मात्र पर अनन्य प्रीति होती है। इस प्रकार
मेरी ही भावना से मेरी भक्ति करने का नाम है 'महंत स्थिति'। इस प्रकार सर्वत्र मेरी भावना रखने वाला जब मेरा
भक्त हो जाता है तो उसमें होने वाले सभी कामादिक दोषों का लोप हो जाता है। सूर्य जब पूर्व दिशा में आता है
तो सभी नक्षत्र समुदाय लुप्त हो जाता है उसी प्रकार भक्ति के उदयकाल में कामादिकों की होली जलती है। काम
की निवृत्ति होने पर सहज ही निर्विषय स्थिति प्राप्त होती है और तब मेरे सुख का सुखलाभ होकर वे उस सुख
में निमग्न रहते हैं। देश, काल अथवा वेदों को भी जिस सुख की थाह नहीं लगती, उस सुख के सुखदायी वैभव
का मेरे भक्त सदा उपभोग करते हैं। जिस सुख का लाभ होने से चित्त की वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस सुख से
सारे अवयव आनन्दमय हो जाते हैं। मेरे भक्तों को सुख की इतनी अधिक प्राप्ति होती है। मोक्ष सुख में भी इस
सुख का माधुर्य नहीं है। सचमुच हरिभक्त धन्य हैं। ऐसे सुख के लिये साधक लोग जी जान से प्रयत्नशील रहते
हैं। तपादि साधनों के चक्कर में शरीर को यातना देते हैं। विषयों पर अंकुश लगाते हैं। कोई योगयाग करते हैं,
कोई शास्त्रों का अभ्यास करते हैं, कोई सब कुछ त्याग कर देते हैं, कोई घर और पत्नी का संग छोड़ देते हैं, कोई
फलों का आहार करते हैं तो कोई निराहार रहते हैं, कोई नग्न स्थिति में रहते हैं, कोई ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते
हैं, कोई गिरिकन्दराओं में रहते हैं, कोई पर्वत की चोटी पर जाकर बैठते हैं, कोई पर्वत की गुफा में बैठते हैं।
कुछ लोग जटाएँ बढ़ाते हैं तो कोई जटाओं में गाँठ बाँधकर उनका जूड़ा बनाते हैं। कोई अपने नाखून बढ़ाते हैं,
कोई हठयोग का साधन करते हैं तो कोई उन्मत्त पिशाच की तरह स्वैराचार करते हैं। कुछ लाल रंग के कपड़े
पहन कर खुले सिर रहते हैं तो कोई शरीर पर चिथड़े पहनते हैं। कोई तीर्थयात्रा कर शरीर को कृश बनाते हैं तो
कोई मौन धारण कर गूँगे बने रहते हैं। कुछ लोग शरीर में भभूत लगाते हैं तो कोई लगातार बक्बक् करते रहते
हैं। किसी को पानी का ही पागलपन रहता है। कुछ दर्भ तथा मृत्तिका में ही लीन रहते हैं। ऐसी अनेक पद्धतियाँ
हैं जिनमें साधक कितने जर्जर होते हैं इसकी कोई गिनती ही नहीं है। लेकिन सचमुच मेरे भजन का लाभ इनमें
से किसीं को भी नहीं होता। उस सुख के दर्शन उन्हें स्वप्न में भी नहीं होते इतने वे उस सुख से वंचित हो जाते
हैं। चन्द्रमा के किरणों से निकलने वाला अमृत जिस प्रकार कौओं को दुर्लभ रहता है, उसी प्रकार मेरा सच्चा
आत्मसुख अभक्तों को सचमुच प्राप्त नहीं होता। गोथन में लगी किलनी को रक्त ही अच्छा लगता है। बेचारा
नजदीक के ही दुग्ध का सेवन नहीं कर सकता। उसी प्रकार मेरी भक्ति छोड़कर अनेक प्रकार के साधनों से जो
व्यर्थ ही कष्ट भोगते हैं, उन्हें हे उद्धव! मेरे आत्मसुख की प्राप्ति नहीं होती। जिन्होंने मेरे भजन की प्रीति से
भक्ति की पौध को सींचा उन्हें ही सचमुच मेरे आत्मसुख की प्राप्ति हुई। मेरे उस आत्मसुख में बासीपन की बात
ही नहीं है। कल्पांत में भी कोई उससे नहीं ऊबेगा और वहाँ इन्द्रियों की कोई बाधा भी नहीं है। देखो! विषयों
का सुख इन्द्रियों के अधीन होता है। किन्तु पवित्र भक्तिसुख किसी के अधीन नहीं होता और जो भाग्यवान है

चौदहवाँ अध्याय ४०५
उन्हीं को वह प्राप्त होता है। देखो ! जिस सुख का उपभोग लेते समय देही भी विदेही हो जाता है, वह सुख मेरे
भक्तों में प्रकट होते ही वह कभी कम नहीं होता। इस प्रकार के ये उत्तम भक्त जब सुखी हो जाते हैं तो इसमें
आश्चर्य कैसा ? लेकिन जो केवल विषयी थे, उन्हें भी मेरे भजन से सुख की प्राप्ति हुई। सौभाग्य से सत्संग प्राप्त
हुआ हो और मन में आस्तिक बुद्धि उत्पन्न होकर मेरे प्रति अनन्यभाव उत्पन्न हुआ तो मेरी थोड़ी-सी भक्ति से भी
विषयों की निवृत्ति होती है।
बाध्यमानोऽपि मद्द्क्तो विषयैरजितेन्द्रियः।
प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते ॥ १८ ॥
मेरे प्रति एकनिष्ठ प्रेम रखने वाले तथा प्रेमयुक्त भजन करने वालों को विषयों की बाधा सतायेगी, यह
विचित्र बात क्या सम्भव है ? प्रेम से मेरी भक्ति करने पर विषय वासनायें जल जाती हैं। वहाँ विषयों के प्रति
रुचि जगेगी इसे कौन स्वीकार करेगा ? दर्पण को चूर्ण से साफ करने पर वह निर्मल हो जाता है। उसी प्रकार
भक्ति के योग से विषय धुल जाते हैं। अतः ऐसे स्थान पर विषय की आसक्ति बढ़ेगी यह बात ही बचकानी और
क्षुद्र है। जो पूर्णतयः विषयासक्त रहता है तथा प्रपंचयुक्त होकर संसार में मग्न रहता है वह भी अगर प्रसंगवश
भक्त हो गया तो विरक्त होता है। उसके बारे में भी सुनो। मन को भक्ति अच्छी लगे और विषयों की इच्छा भी
नष्ट नहीं हुई है ऐसे संकट में फँस जाने पर मेरी भक्ति का ही आश्रय करना चाहिये। विषयासक्ति को गौण
समझना चाहिये। उसे विषयासक्ति से भी विरक्ति हो सकती है। उसका उपाय बताता हूँ, सुनो। नमक से पानी
मिल जाने पर वह उसे तत्काल घोल कर अदृष्य कर देता हैं उसी प्रकार भक्ति जब बहुत अधिक बढ़ जाती है तो
वह विषयों का जाल तोड़ देती है। इस प्रकार भजन के अभ्यास से विषयों से बिछोह हो जाता है तथा आत्मसुख
का लाभ होकर आत्मानंद से मुलाकात होती है। मुझे विषय से निवृत्ति चाहिये लेकिन उसके लिये मैंने भक्ति नहीं
की, तो किस प्रकार मुझे विषयों से विरक्ति मिलेगी ? इसका उत्तर श्रीकृष्ण दे रहे हैं। दीपक से आग भड़के तो
वह घर को तथा शहर को भी जला देगी। वैसा ही प्रकार है यह।
यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात् ।
तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः ॥ १९ ॥
दीप जलाने के लिये आग जलाई तो एक चिनगारी जंगल के फूस में लग गयी जिससे आग जलाने वाले
के न चाहने पर भी एक के बाद एक झोपड़े, घर, गाँव, शहर, मन्दिर तथा पर्वत शिखर सभी जलकर भस्म हो
जाते हैं। उसी प्रकार मेरी जरा सी भी भक्ति अगर श्रद्धापूर्वक मन में प्रवेश करे तो संचित तथा नित्य होने वाले
पापों की राशियाँ पूरी तरह भस्म हो जाती हैं। पूर्व पापों का मल चित्त को अत्यन्त कस कर चिपका रहता है
जिससे चित्त अत्यन्त चंचल होकर सदा विषयों के लिये व्याकुल रहता है। उसे यदि मेरी भक्ति का थोड़ा-सा
अंश भी मिल गया तो उतने से ही पूर्व पातकों का संग्रह नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार दीपक के स्पर्श से कपूर
तत्काल पूरी तरह नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार वह भस्म हो जाता है। चित्त इस प्रकार निर्मल हो जाने पर वहाँ
सदा ब्रह्म प्रकट हो जाता है। फिर वह चित्त विषयासक्त नहीं होता। इच्छा न करने पर भी वह अपने आप विरक्त
हो जाता है। भक्ति के अंशमात्र की इतनी बड़ी महिमा है। हे भक्तोत्तम उद्धव ! मेरी सम्पूर्ण भक्ति की महिमा कौन
जान पायेगा ? वेदशास्त्रों के लिये भी वह अतर्क्य है। मेरी भक्ति अलक्ष्य होने के कारण वह दिखायी नहीं देती।
अतर्क्य होने के कारण शास्त्रमीमांसा द्वारा भी उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं हो सकता। अगाध होने के कारण

४०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अथक साधनों के बाद भी उसका आकलन नहीं होता। मेरी भक्ति की थाह स्वयं मुझे भी नहीं लग पाती।
इसीलिये मैं भक्तों का आज्ञाधारक बन कर रहता हूँ। उनके शब्दों का जरा भी उल्लंघन नहीं करता। भक्तों की
महिमा अगाध है इसलिये मैं भी उनकी सेवा करता हूँ। भक्त ने मारी हुई लात मैंने अपने हृदय पर धारण की।
भक्तों के चरणों की धूलि मैं माथे पर लगाता हूँ। भक्त कहलाना बहुत अच्छा लगता है लेकिन भजन का स्वरूप
अत्यन्त विकट है। भक्ति का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है। श्रुति शास्त्रों के भी वह ठीक से समझ में नहीं आता। कंजूस
व्यक्ति कितनी ही दूर क्यों न जाये लेकिन घर में रखी हुई निधि को वह अपने मन में सुरक्षित रखता है। उसी
प्रकार वह सदा सर्वदा मेरी प्रीति अपने अंतःकरण में सुरक्षित रखता है या बहुत दिन के बाद जब किसी स्त्री को
गर्भ रह जाता है तो वह सुन्दरी जिस प्रकार आनन्दपूर्वक उसका पालन पोषण करती है उसी प्रकार जब हृदय में
मेरे प्रति प्रेम जगता है अथवा बाँझ स्त्री जब गर्भवती होती है उसी प्रकार उसके मन में मेरे प्रेम का उत्सव मनाने
की इच्छा होती है और अंतःकरण से प्रेमविह्वल होकर पहले से भी अधिक उत्कर्ष से उल्हास बढ़ता जाता है।
अथवा भाग्यवान जामाता घर आने पर जिस प्रकार सास उसका स्वागत करने में किसी बात की कमी नहीं रहने
देती, अथवा बीज जितनी अधिक पैदावार देता है उतना ही किसान का उल्हास बढ़ता है, अथवा गुणवान, सुन्दर
और श्रीमान पति के घर से जाने पर उसकी पत्नी उसके लिये छटपटाती है, उसी प्रकार मेरे लिये उसके मन में
बेचैनी बढ़ने लगती है। उद्धव ! इसी का नाम है मेरे प्रति सच्ची भक्ति। जिस भक्ति के भुलावे में मैं लक्ष्मीकांत
भक्तों के हाथ में हूँ। मेरे लिये चाह बढ़ने से प्रीति उत्पन्न होती है। उद्धव को सीने से लगाकर भगवान उससे
बताने लगे कि जिसके पास मैं सदा रहता हूँ वह मेरी भक्ति ऐसी रहती है। संसार सागर को पार करने के लिये
भक्ति यही एक प्रमुख साधन है। मोक्ष भी उसके चरणों पर लोटता है फिर अन्य साधनों की क्या बिसात है?
देखो! पूरे त्रिलोक में मैं अविजीत हूँ। लेकिन भक्तों के सामर्थ्य ने मुझे जीत कर भक्ति के बल पर मुझे अपना
सेवक बना लिया है। इसीलिये सभी विजयों में श्रेष्ठ एक मेरी भक्ति ही है। उसकी भी कथा सुनो। तुम्हें
विस्तारपूर्वक बताता हूँ।
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ २० ॥
नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका ज्ञान देने वाला सांख्यशास्त्र अथवा नित्य-नैमित्तिक कर्म अपना
सर्व अष्टांगिक योग भी मेरी प्राप्ति कराने में समर्थ नहीं है अथवा जिसे 'स्वाध्याय' कहते हैं वह वेदाध्ययन
अथवा वायु, जल तथा पके हुए पत्ते खाकर किया जाने वाला तप अथवा संन्यास ग्रहण आदि त्याग ये सब मेरी
भक्ति के बिना दुर्बल हैं। जिस प्रकार बिना नाक का सौन्दर्य अथवा मस्तक बिना सारे अवयव अथवा पति बिना
सुहागन ये सब जिस प्रकार व्यर्थ हैं उसी प्रकार मेरी भक्ति के बिना सभी साधन दुर्बल हैं। उन सब में मुझ तक
पहुँचने का सामर्थ्य नहीं है। लेकिन मेरी भक्ति वैसी नहीं है। वह मेरे प्रेम की अधिकाधिक वृद्धि कर तत्काल
मेरी प्राप्ति कराती है। अन्य किसी के अधीन नहीं होती। जिस समय मेरी भक्ति उत्पन्न होती है तभी मेरी प्राप्ति
होती है। यह बात श्रीकृष्ण उद्धव को बार-बार, प्रसन्नतापूर्वक बताने लगे। हे उद्धव! जिस प्रकार रत्न के साथ
उसका तेज होता है, अरुण के साथ जैसे सूर्य होता है उसी प्रकार भक्ति के पास मैं लक्ष्मीपति खड़ा रहता हूँ। वह
भक्ति जिसके मन में लग गयी उसी समय मैं उसके हाथ लग जाता हूँ। अन्य कितने ही साधन कोई क्यों न प्राप्त
कर ले लेकिन भक्ति के बिना मैं नहीं प्राप्त हो सकता।

चौदहवाँ अध्याय ४०७
भक्त्याहमेकयाग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ २१ ॥
अन्य साधन तथा युक्तियाँ दूर कर मेरी श्रद्धायुक्त भक्ति करने से मेरा लाभ होता है। मन में किसी भी प्रकार
का विकल्प लाये बिना, किसी भी प्रकार की शंका न कर समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवत्स्वरूप की भावना
रखना यही भक्ति का मुख्य लक्षण है। इसी का नाम है भजनभाव। सभी प्रकार की सम्पत्ति के प्रति उदासीन
होकर जब मेरे भजन में आनन्द आने लगे, जितनी मोक्ष की इच्छा नहीं की उससे अधिक मेरे भजन पर विश्वास
किया तो फिर तरने या न तरने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। मेरे भजन ने विधि निषेध के सभी वादों को निरस्त
कर दिया। इतने विश्वास से जिनकी भावना भक्ति के अलावा अन्य उपाय स्वीकार नहीं करती उसके ही जीवन
से हमारा जीवन चलता है। वह हमारा आत्मा ही है। ज्ञानियों का आत्मा मैं, भक्तों का प्रिय परमात्मा मैं, शास्त्रों में
जिस पुरुषोत्तम का वर्णन करते हैं वह मैं दौड़ कर उनकी अगवानी करने जाता हूँ। मुझे अनन्य भक्ति पसन्द है
इसलिये मैं उनके ही अधीन रहता हूँ। उनके ही कारण पूरे त्रैलोक्य में मेरी ख्याति है। उनके ही कारण मुझे
महत्त्व प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे अलंकार धारण करने को मिलते हैं तथा पहनने के लिये परिधान
मिलते हैं। उनके ही बल पर मैं सर्वत्र विचरण करता रहता हूँ। मेरी गाँठ में कुछ भी नहीं है। भक्तों ने अपना
सर्वस्व खर्च कर, विविध प्रकार के उपचारों से मुझे महत्त्व प्रदान किया है। मैं नेत्रहीन था उन्होंने मुझे आँखें दीं,
मुझे कान नहीं थे जो उन्होंने मुझे दिये, मैं मुखविहीन था तो उन्होंने मुझे मुख दिया, उनकी ही वाणी से मैं बोलने
लगा। उनके ही कारण मेरा आना-जाना होता है। उनके ही कारण मैं हाथों में तथा पैरों में अलंकार धारण करता
हूँ। उनके ही कारण मुझे निश्चित स्थान प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे सामर्थ्य प्राप्त हुआ है। मेरा नाम
और रूप उन्होंने ही बनाया, मुझे उनके गुणों से ही पवित्रता प्राप्त हुई है। वैकुण्ठ में मेरा स्थान मेरे भक्तों ने ही
अटल बना दिया है। इस प्रकार मेरे भक्तों को मैं भक्ति के ही कारण वशीभूत हुआ हूँ इसलिये रात-दिन मैं उनके
साथ खड़ा रहता हूँ। जन्मरहित होते हुए मैं उनके लिये जन्म लेता हूँ, कर्मशून्य होते हुए मैं उनके ही लिये कर्म
करता हूँ। उनके ही कहने से मैं महान पापियों का नाममात्र से उद्धार करता हूँ। वाल्मीकि इस संसार में महान
पापी था लेकिन नारदजी के कहने से मैंने उसे नामजप की पवित्रता के कारण पूजनीय बना दिया। मुझ पर भक्ति
का इतना अधिकार है। भक्ति के अलावा मैं किसी के भी हाथ नहीं आता। भक्तों के उपकार से मैं बिलकुल झुक
गया हूँ क्योंकि उसके उपकार को चुकाया नहीं जा सकता। इसलिये मैं पूरी तरह उनके अधीन रहता हूँ। उनके
उपकार का बदला चुकाने के लिये मेरी गाँठ में कुछ नहीं रहता। अब जो कुछ थोड़ा-बहुत मैंने उन्हें दिया है वह
भी तुम्हें धीरे से बता देता हूँ। भक्त मेरे ही कारण सनाथ हुए हैं। मेरे ही कारण वे कृतकृत्य हुए हैं। मेरे ही
आनन्द से वे सर्वदा तृप्त हुए हैं और आत्मज्ञान से अभिभूत हो गये हैं। मेरे ही बल पर वे सारी दुनिया पर भारी
हैं। वे प्रहार किये बिना ही सृष्टि को छेद देते हैं। मेरे सामर्थ्य के कारण ही कलिकाल उनके सामने नहीं आ
सकता। मेरे ही कारण वे त्रैलोक्य में किसी की चिन्ता नहीं करते। मेरे ही कारण वे देह में विदेह की भाँति रहते
हैं। मेरे ही बल पर उन्होंने प्रलयकाल को निगल लिया है। मेरे ही बल से उन्होंने जन्म-मरण को नष्ट कर दिया
है। मेरा भजन कर वे सनातन ब्रह्मस्वरूप हो गये। लेकिन यह सब भी उन्हें मैंने नहीं दिया। वे अपने भजन
सामर्थ्य से ही वह सब मुझसे ले गये। उनके आगे मेरी कुछ भी नहीं चलती। मेरा सर्वस्व मेरे भक्त मुझसे लूट
कर ले गये हैं। उन भक्तों ने भजनसामर्थ्य से मुझ अजेय को भी जीत लिया है और मुझे अपने वश में कर लिया
है। मेरा जो आत्मपद भले ही मेरे भक्तों के हाथ में आ गया हो लेकिन उसे मेरे ही अधिकार में रख कर वे

४०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्तिमार्ग से चिपक कर रह रहे हैं। मेरी उस भक्ति की पवित्रता सुन कर तुम्हें आश्चर्य होगा लेकिन उसे बताने
में मुझे कोई सन्देह नहीं है। उस भक्ति की सच्ची महिमा सुनो। दांभिक लौकिक छोड़ कर जो शुद्ध भाव से मेरा
भजन करने लगा वह जाति से भले ही चांडाल क्यों न हो फिर भी वह मुझे अत्यन्त पूज्य है। अमंगल रीछ
अथवा वानर अथवा छाछ पीने वाले तथा जंगलों में भटकने वाले ग्वालों के लड़कों को भी मैंने पूज्य माना। जो
जाति से भले ही निम्न था किन्तु भक्तिभाव के कारण महत्त्वपूर्ण हो गया। वह मत्स्वरूप तक पहुँच गया और
त्रैलोक्य में पूज्य हो गया। 'विप्रात द्विषड्गुणयुता' इस श्लोक का सारांश यही है। जो ब्राह्मण मेरे भजनमार्ग से
विन्मुख हुआ उस ब्राह्मण की पवित्रता जल गयी समझो। उसकी अपेक्षा मेरे भजन में भजननिष्ठ होने वाला
चाण्डाल ही श्रेष्ठ है। उसका महान कविश्रेष्ठ तथा ज्ञाता भी वन्दन करते हैं। विदुर वास्तव में दासीपुत्र था।
लेकिन अपनी भक्ति के कारण वह भगवान का प्रिय बना। इसलिये परमार्थ साधने के लिये भाव ही मुख्य है।
जाति का अभिमान उपयोगी नहीं रहता। सचमुच मुझे पाने के लिये मेरी भक्ति ही श्रेष्ठ है। इसीलिये मैंने सबसे
पहले वनचरों का (वानर, रीछ आदि) उद्धार किया। पक्षियों अत्यन्त निन्द्य गिद्ध जटायु का मैंने उद्धार किया।
मैंने धर्मव्याध नामक अंत्यज का उद्धार किया। क्योंकि मेरे प्रति उसकी विशुद्ध भक्ति थी। कोई किसी भी जाति
में क्यों न उत्पन्न हुआ हो, लेकिन जिसे मेरी भावार्थपूर्ण भक्ति प्राप्त होती है वही पवित्रता की मूर्ति है यह समझ
लो। मेरे भजन से ही मेरी प्राप्ति होती है। मेरी भक्ति को छोड़ अनेक साधनों का प्रयोग करने अथवा वाद-विवाद
करने से मेरी प्राप्ति नहीं होती। यही तथ्य श्रीकृष्ण बताते हैं।
धर्मः सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।
मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि॥२२॥
मेरी भक्ति के बिना कोई भी कर्म अथवा आचरण करना केवल भ्रम है यह समझ लो। इससे मेरी प्राप्ति
का मार्ग चूक जाता है और उस धर्म का परिणाम अधर्म में होता है अथवा मेरी भक्ति के बिना सत्य भाषण करना
भी किसी जन्मांध की तरह ही है क्योंकि उसमें पग-पग पर प्रमाद होता है और वह स्वयं यह नहीं देखता कि
वह पतन की ओर जा रहा है। भक्ति के बिना दया का महत्त्व उसी प्रकार है जिस प्रकार पुरुष के बिना उसकी
सुन्दर स्त्री का जो विधवा होने के कारण धार्मिक कृत्यों से वंचित रहती है। मेरी भक्ति के बिना विद्या अविद्या ही
है यह जान लो। जिस प्रकार कौआ चन्द्रमा को नहीं पहचानता उसी प्रकार वे मेरे आत्मबोध को नहीं पहचानते।
गधा चन्दन का बोझ ढोता है लेकिन चन्दन के गंध का रहस्य वह नहीं जानता। उसी प्रकार मेरी भक्ति के बिना
विद्या और शास्त्र पढ़ना भार ढोने की तरह है। मेरी भक्ति के बिना शरीर शोषण का जो तप मनुष्य करता है वह
मानों पूर्वसंचित के अनुसार पाप ही भोगता है क्योंकि तप की वह क्रिया सत्त्वस्वरूप नहीं होती। मेरी भक्ति के
बिना किया हुआ साधन उस कीड़े की तरह है जो अपने चारों ओर खोल बनाकर उसके भीतर रहता है क्योंकि
भक्ति के बिना जो भी क्रिया की जाती है वह स्वयं के लिये ही बन्धनकारी होती है। सारांश, मेरी भक्ति के बिना
किया हुआ सभी कार्य अप्रामाणिक है। अब उसी भक्ति का शुद्ध स्वरूप भगवान बता रहे हैं।
कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना।
विनाऽऽनन्दाश्रुकलया शुध्येद् भक्त्या विनाऽऽशयः॥२३॥
स्वेच्छा से हरि की कथा श्रवण करने से अथवा नाना प्रकार के चरित्रों के बारे में सुनने से अथवा हृदय में
निरन्तर मेरे ही स्वरूप का विचार करने से चित्त में परिवर्तन होता है। इससे मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। वे मेरे

चौदहवाँ अध्याय ४०९
भजनों के माध्यम से जोर-शोर से मेरा नाम गाते हैं, बड़े भक्ति भाव से रंग जाते हैं जिससे मन में भक्ति का स्रोत
फूट पड़ता है। अंतःकरण में सुख उत्पन्न होने पर बाहर रोमांच उभर आते हैं। उस आत्मानुभव के सुख की
माधुरी प्रेमाश्रु के रूप में नेत्रों से बहने लगती है। मेरी भक्ति की चाह से 'अहं' और सोहं की अभिमान की कड़ी
टूटती है और विषय की आसक्ति समाप्त हो जाती है। उस क्षण का यही लक्षण है कि शरीर रोमांचित हो उठता
है, नेत्रों से आनंदाश्रु बहने लगते हैं और हृदय परिपूर्ण आनन्द से भर जाता है। दोनों नेत्र विस्तृत होकर उनमें का
तेज चमकने लगता है और वे सदा प्रसन्न दिखायी देते हैं। देह का भान नहीं रहता और मन भगवान में रम जाता
है। इस प्रकार यदि मेरे प्रति भक्ति उत्पन्न नहीं होगी तो फिर विषय से विरक्ति कैसे होगी ? और विरक्ति उत्पन्न
हुए बिना उद्धव ! सचमुच मेरी प्राप्ति नहीं होती। मेरी शुद्ध भक्ति जिसे पूर्ण रूप से प्राप्त हुई उसके लक्षणों का
वर्णन और उसकी पवित्रता के बारे में सुनो। जो मेरी भक्ति करता है वह तत्काल पवित्र हो जाता है। इतना ही
नहीं बल्कि वह तो त्रैलोक्य को भी पवित्र करता है ऐसा श्रीकृष्ण ने गरज कर कहा।
वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ २४॥
शरीर पर रोमांच उभर आते हैं, पसीने की बूँदें चमकने लगती हैं, चैतन्य से चित्त द्रवित हो उठता है और
उससे वाणी भी सद्गदित हो उठती है। अंतःकरण में आनन्द भर जाते ही दृष्टि अधोन्मीलित हो जाती है, जीव
की शिव से भेंट होती है, ध्येय, ध्याता और ध्यान का त्रिकुट नष्ट हो जाता है। आँखों से अश्रु की वर्षा होने
लगती है, गला भर आता है, शरीर पर नियंत्रण नहीं रह पाता और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। वह जोर-
जोर से आक्रोश करता है और रोने लगता है। बार, बार फफक-फफक कर रोने लगता है। रोते-रोते बीच में ही
जोर-जोर से हँसने लगता है। जिस प्रकार भूत-बाधा होने से आदमी पागल हो जाता है, उसी प्रकार उसकी
अवस्था हो जाती है। वह रोना और हँसना नहीं छोड़ता और उसमें ही ऐसी आश्चर्यजनक चाह उत्पन्न होती है
कि आत्मस्वरूप से प्रेम हो जाने के कारण वह उसी अर्थ को लेकर बार-बार गाने लगता है। 'मेरा' और 'तेरा'
भूलकर, लोकलाज छोड़ कर, अत्यंत हर्ष से, प्रेम की चाह के कारण शंकामुक्त होकर नाचने लगता है। उसके
भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। कोई बालक भटक कर जब माँ से बिछड़ जाता है, वह माँ को खोजने लगता है
लेकिन वह कहीं नहीं मिलती और जब वह मिलती है तो बालक फुक्का फाड़ कर रोने लगता है और माँ उसे
अपने कलेजे से लगा लेती है। उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा इन दोनों का भ्रांतिनगर में बिछोह हो जाता है,
एक बार उनका मिलन होते ही जीव बिलख-बिलख कर रोने लगता है। अनेक दिनों के पश्चात भेंट होने के
कारण दोनों ऐक्यभाव से गले मिलते हैं, उस आनन्द से गला भर आता है और रुलाई आ जाती है। भगवान
अनेक प्रकार से नाटकीय है। वह मायावी होने के कारण किसी को मिल नहीं पाता। वह घर में ही मिल जाता है
और आश्चर्य से, तटस्थ होकर देखता रहता है। भगवान सदा पास में ही रहता है। उसके लिये पागल होकर लोग
उसे देश-परदेश में ढूँढ़ते रहते हैं। यह देखकर उसे हँसी आ जाती है। भगवान सबके लिये अजेय है लेकिन उस
भगवान को मैंने जीत लिया और अपने हृदय में रख लिया इस आनन्द से वह नाचने लगता है। दूजेपन की बात
समाप्त कर मैंने भगवान को जीत लिया और संसार में यशस्वी हुआ इस आनन्द से वह नाचने-गाने लगता है।
देखने पर दूसरा कोई दिखायी नहीं देता इसलिये वह लाज करना भी छोड़ देता है और संसार में निर्लज्ज बन
जाता है। उसकी निर्लज्जता का यह कारण है। इस प्रकार मेरे भक्त भक्तियुक्त होकर आत्मानंद से नाचते-गाते

४१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रहते हैं। उनके उस आनन्द से त्रैलोक्य पवित्र हो जाता है। जिनके चरणों का दर्शन होते ही जड़ जीवों का उद्धार
होता है, उनके चरणों की धूल लगने पर भी पशु और पाषाण का उद्धार होता है। कीर्तन के महाघोष ने संसार के
सारे दुःख नष्ट कर दिये, सारा ब्रह्माण्ड आनन्द से भर जाने के कारण वह अत्यन्त सुख से ओत-प्रोत रहता है।
किसी ने दर्शन से तारा, किसी ने स्पर्श से तारा तो किसी ने उपदेश से तारा। कोई कीर्तन से तरे तो कोई
नामस्मरण से तर गये। उद्धव! इस प्रकार उन्होंने जगत का उद्धार किया। जीव अविद्यायुक्त होने के कारण मलिन
रहता है। उसे शुद्ध होने के लिये मेरी भक्ति ही मुख्य साधन है, यह ध्यान में रखो। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं
बताते हैं।
यथाग्निना हेम मलं जहाति ध्मातं पुनः स्वं भजते च रूपम्।
आत्मा च कर्मानुशयं विधूय मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम्॥ २५॥
मिलावटी सोना मलिन हो जाता है। उसे पानी से कितनी ही बार धोने पर भी उसमें शुद्धता नहीं आती।
लेकिन उसी सुवर्ण का पत्ता बनाकर उसे अग्नि में तपाने से उसका मैल जल जाता है और वह शुद्ध होकर पहले
जैसा चमकने लगता है। उसी प्रकार अविद्या और सकाम कर्म से जो मलिन हुआ रहता है उसके चित्त की शुद्धि
करने के लिये मेरी भक्ति यही एक उपाय है। उसी के योग से जीव के मल का क्षालन होता है। अंतःकरण पर
जैसे-जैसे भक्ति का पुट चढ़ता है वैसे-वैसे अविद्या के बन्धन ढीले होते जाते हैं, माया का मूल ही नष्ट हो जाता
है और जीव आत्मपद को प्राप्त कर लेता है। अविद्या का बन्धन टूट जाने पर उस ज्ञानस्वरूप तथा शुद्ध जीव को
पूर्ण बोध होता है और उस आत्मबोध के कारण उसे अत्यन्त आनन्द होता है। जीव को जो अविद्या प्राप्त है
उसकी निवृत्ति ज्ञान से होगी। तो फिर वहाँ भक्ति की क्या आवश्यकता है ऐसी शंका तुम करोगे। तो मेरी भक्ति
के बिना ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
यथा यथाऽऽत्मा परिमृज्यतेऽसौ मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः।
तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम्॥ २६॥
मेरा वेदशास्त्रों ने बनाया स्वरूप, मेरे नाना प्रकार के चरित्र और मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, मनन
अथवा कीर्तन आदि से चित्त का क्षालन कर जो भी मेरी भक्ति करता है उसकी अविद्या की निवृत्ति होती है और
श्रुति को तथा वेदान्त को भी मेरे अतर्क्य स्वरूप की प्राप्ति होती है। जो अत्यन्त सूक्ष्म और निर्गुण रहता है वह
अलक्ष्य होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं होता इतना गहन होता है, वही स्वरूप जीव को प्राप्त होता है और मेरे
भजन से उसका समाधान होता है। जिसकी आँखों में अंजन लगा रहता है वह पृथ्वी के अन्दर का खजाना भी
देख सकता है, उसी प्रकार मेरे भजन से ज्ञान प्राप्त कर जीव ज्ञानस्वरूप हो जाता है। उद्धव! यह एक बात ध्यान
में रखो कि यहाँ अधिक परिश्रम की आवश्यकता नहीं है। जिसके चित्त में जैसा भाव रहता है वैसा ही फल उसे
प्राप्त होता है।
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥ २७॥
जो विषयों का ही ध्यान करता है वह विषयों में ही मग्न रहता है। जो सदा मेरा ही चिन्तन करता है, वह
ज्ञानस्वरूप मैं ही बन जाता हूँ। पत्नी मैके जाती है उस समय उसका ध्यान करते ही मन में उसकी मूर्ति साकार

चौदहवाँ अध्याय ४११
हो उठती है। इतना ही नहीं बल्कि अपने हावभाव तथा नेत्र कटाक्ष से वह पुरुष को सकाम कर देती है। जो
सामने नहीं है उस स्त्री का ध्यान करने से वह जब साक्षात प्रकट हुई मालूम होती है और मैं तो स्वतः सिद्ध हृदय
में रहता हूँ, अतः मेरा चिन्तन करने से सहज ही मद्रूपता प्राप्त होगी। प्यार से होने वाला मेरा चिन्तन, चित्त,
चिन्ता तथा चिन्तन क्रिया ये सब नष्ट होकर वह पुरुष स्वयं ही ज्ञानरूप हो जाता है। इसी का नाम है मद्रूपता।
अरे! मुझे प्राप्त करने का मुख्य साधन यही है। मेरा ध्यान और मेरा भजन करने से मत्स्वरूपता प्राप्त होती है।
मेरे सिवा और जो भी ध्यान किया जाता है वह सब जीव के लिये दृढ़ बन्धन होता है। इसलिये विषय का ध्यान
छोड़ कर मेरा ही चिन्तन करते रहना चाहिये।
तस्मादसद्भिध्यां यथा स्वप्नमनोरथम्।
हित्वा मयि समाधत्स्व मनो मद्भावभावितम्॥ २८॥
जो सत्य दिखायी देता है किन्तु नाशवान रहता है, उसे 'असत' कहते हैं। जो 'भ्रमरूप' होकर केवल
भासमान रहता है उसी प्रकार जो इस लोक में तथा परलोक में अपने सौन्दर्य से मन को लुभाता है और अविचार
के बल से मन को मोहित करता है; इसलिये अनेक जीव अनेक प्रकार के प्रयास कर दुःखी हो रहे हैं। बड़े कष्ट
से साधना कर स्वर्गभोग का स्थान प्राप्त किया लेकिन वह भी स्वप्न के मनोरथों की तरह नश्वर ही रहता है।
इसलिये विषयों का ध्यान करने के बजाय मेरा भजन करना चाहिये और मन को मेरी ही भावना रखने के लिये
जागृत करना चाहिये। सावधान चित्त से मेरा भजन करते समय तथा चित्त को एकाग्र कर मेरा ध्यान करते समय
उसमें जो बाधाएँ आती हैं उनका त्याग किस तरह किया जाय इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान्।
क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः॥ २९॥
जो मेरी प्राप्ति के लिये अत्यन्त व्याकुल हुआ हो उसे स्त्री संग का विचार ही छोड़ देना चाहिये। उसे मुझ
भगवंत का चिन्तन करना चाहिये तथा एकान्त में रहना चाहिये। स्त्री की संगति की अपेक्षा स्त्री लंपट पुरुषों की
संगत अधिक घातक तथा हानिकारक है। उनसे भेंट नहीं करनी चाहिये उनसे बात नहीं करनी चाहिये, उन्हें दूर
से भी नहीं देखना चाहिये। जो साधक है उसे काया, वाचा, मनसा स्त्री तथा स्त्रैण इन दोनों की संगत छोड़ देनी
चाहिये और मन में उन्हें पुनः देखने की इच्छा न हो इसलिये अंतःकरण को दृढ़ करना चाहिये। फिर किसी
एकान्त, निर्जन स्थान में, प्रशस्त एवं पवित्र स्थान पर आसन लगा कर मेरा चिन्तन करना चाहिये। आलस त्याग
कर वृत्ति को सावधान रखना चाहिये और फिर मन को एकाग्र कर मेरा ध्यान करना चाहिये। किन्तु मेरे साधकों
के लिये स्त्री और स्त्रीलंपट पुरुष ये दो बड़ी बाधायें हैं, जो मेरे ध्यान का विध्वंस कर विघ्नरूप से मेरी प्राप्ति के
आड़े आती हैं।
न तथास्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः।
योषित्सङ्गाद् यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ ३०॥
अविद्या के अनन्त कोटि समुदाय स्त्रीसंग में भरे रहते हैं। स्त्री को मात्र देखने भर से अधर्म की ज्वाला
भड़क उठती है। जो महामोहों की राशि है, जो प्रज्वलित कामाग्नि का ईंधन है, जो जीव का बहुत बड़ा भुलावा
है और जो अधःपतन का मुक्त द्वार है, वही स्त्री है। मदन के वे प्रखर बाण, माया का वह यंत्र और नरक का जो

४१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत

अंधतम कुण्ड है, वही स्त्री है। उसकी संगति से ज्ञानशक्ति भी अन्धी हो जाती है, वह अनेक प्रकार की आसक्ति
बढ़ाती है और जिसके संयोग से स्वार्थ की भी विस्मृति होती है। उसके लिये अनेक प्रकार का संसार करना
पड़ता है, जिसके लिये असह्य गर्भवास सहन करना पड़ता है, जिसके लिये जीव के लिये वज्रपाश जैसे विषय
विलास भोगने पड़ते हैं। जो निरन्तर दुःख और शोक सहकर नरक की यातना सहती है उस साक्षात माँ को शत्रु
समझ कर उसके लिये पत्नी सगी हो जाती है। जो मातृप्रेम में दुराव उत्पन्न करती है, जो बन्धु प्रेम को बिगाड़ती
है, जो निरन्तर अपने नखरे में पुरुष को बाँधे रखती है, वह अधर्मरूपी जंगल में छोड़ देती है। उसके नेत्रकटाश
अत्यन्त प्रखर होते हैं जो एक बार पुरुष के अंतःकरण में घुसने पर उस पर अपनी मोहिनी फैलाते हैं और
जिसका विष कभी नहीं उतरता। इतना कष्ट स्त्री की संगति के कारण होता है। इसलिये जो मेरी प्राप्ति की इच्छा
करता है उसे स्त्री की आसक्ति छोड़ देनी चाहिये। हृदय में उसके प्रति लोभ ही नहीं रहना चाहिये। मन में
उसका स्मरण होते ही वह ज्ञान-ध्यान स्थिति का विध्वंस करती है। हृदय में उसका लोभ नहीं रखना चाहिये।
स्त्रियों की संगति से इतनी अधिक बाधा होती है और स्त्री-लंपट पुरुषों की बाधा तो इससे अधिक होती है। स्त्री
की संगति से प्राप्त होने वाले मोहमद से शायद पुरुष छूट पाये किन्तु स्त्री लंपट पुरुष की संगति से जो बाधा
रहती है वह तो अपार है। चुडाल स्त्री की संगति से राजा शिखिध्वज तर गया अथवा मदालसा की संगति से
कुवलयाश्व राजा तर गया। लीला नामक स्त्री ने भक्ति की साधना से सरस्वती को प्रसन्न किया जिससे उसके
पति का उद्धार हुआ यह सब वसिष्ठ मुनि ने अपने ग्रन्थ में लिखा ही है। इस प्रकार स्त्रियों की संगति से पुरुषों
के उद्धार की बातें सुनते हैं। किन्तु स्त्री लंपट पुरुष की संगति से उद्धार होने का कोई मार्ग नहीं है। जो स्त्री का
अंकित होकर रहता है, जो स्त्री के लिये स्वयं को प्राणों सहित बेच देता है, जो स्त्री का गुलाम बनता है और
उसके कहने के अनुसार आचरण करता है, जो आकाश में संचार करने वाली कुलदेवता की तरह स्त्री की पूजा
करता है और जो उसकी ही सेवा करने के लिये नाना प्रकार के उपचार करने के लिये तत्पर रहता है, वह किसी
सम्बन्धी का छल करने का निश्चय करती है तो वह उस व्यक्ति पर श्वान की तरह भूँकता है और जब वह स्त्री
उसे दुत्कार देती है तो वह दुम दबा कर भागता है। अच्छे और सुस्वादु पकवान वह स्वयं नहीं खाता और स्त्री के
हाथ में उन्हें देकर अपनी सत्ता समाप्त कर देता है। मानों कोई कार्य उसकी इच्छा के विरुद्ध हो जाय तो ब्रह्माण्ड
ही उलट जायेगा। मानों उसकी बात व्यर्थ हो जाने पर सुख ही उलट जायेगा। मानों उसकी बात व्यर्थ हो जाने पर
सुख का क्षीर सागर सूख जायेगा। देवी की, कुलदेवी की पूजा न करना, माँ-बाप के साथ छल करना, गुरु को
भी फँसाना तथा अपना सर्वस्व स्त्री को अर्पण करना। सारांश वह मदारी के बन्दर की तरह पत्नी के चारों ओर
नाचता रहता है। ऐसे स्त्री लंपट पुरुष का साथ होने पर साधक को सुख कहाँ से प्राप्त होगा ? जिसके मुख से
स्त्री सम्बन्धी बातें सुनकर ही ज्ञाताओं के मन में कामवासना उत्पन्न होती है और जो तत्काल कामवासना उत्पन्न
कर स्त्रियों के मोहजाल में फँसाता है ऐसे स्त्रीलंपट की संगत से साधक को सुख की प्राप्ति कैसे हो पायेगी ?
वह उसे अधःपतन की ओर ले जाकर नरक में अवश्य डाल देगा। इसीलिये स्त्री लंपट पुरुष की कथा या वार्ता
भी कान से नहीं सुननी चाहिये। उसकी वायु से भी बचना चाहिये। उससे मिलना नहीं चाहिये, उससे बात नहीं
करनी चाहिये, उसे देखना भी नहीं चाहिये अथवा उसके पीछे-पीछे भी नहीं जाना चाहिये। जिस मार्ग पर वह
जा रहा हो उस मार्ग का भी त्याग करना चाहिये। स्त्री और स्त्रैण की संगत से जितना दुःख प्राप्त होता है उतना
दुःख त्रिभुवन में भी कहीं दिखायी नहीं देता। स्त्री की इच्छा के वश होकर रहना इसी का नाम है स्त्री लंपटता।
स्त्री के अधीन रहना अत्यन्त निंद्य होने के कारण परमार्थ में अत्यन्त बाधक होता है। हमारे हृदय में जो

चौदहवाँ अध्याय ४१३
कामासक्ति है वही स्त्री संग की प्राप्ति के लिये कारणीभूत है। अगर वहीं विरक्ति उत्पन्न हो जाय तो फिर स्त्री
की प्राप्ति कौन पूछता है? भगवान ने भाव विह्वल होकर उद्धव से यह बात कहीँ। वह सुनकर उद्धव ने भी
अंतःकरण में विचार किया। जिससे प्रबल विरक्ति उत्पन्न होती है, विषयासक्ति की बाधा भी नहीं होती उस ध्यान
के सम्बन्ध में उसने भगवान से पूछा। वैसा ध्यान लगने से स्त्री-पुरुष का भान ही नहीं रहता और जीव में
ज्ञानजन्य संतोष उत्पन्न होकर जो संतोष प्राप्त होता है उसके सम्बन्ध में उसने भगवान से प्रश्न किया।
उद्धव उवाच
यथा त्वामरविन्दाक्ष यादृशं वा यदात्मकम्।
ध्यायेन्मुमुक्षुरेतन्मे ध्यानं त्वं वक्तुमर्हसि॥ ३१॥
उद्धव ने कहा, "हे कमलनयन! हे जगज्जीवन! मुमुक्षु जन तुम्हारा जो ध्यान करते हैं उसका लक्षण मुझे
बताओ। वह ध्यान सगुण होता है या निर्गुण? उसका स्वरूप कैसा रहता है? वर्ण कैसा रहता है? सब कुछ
यथासांग बताने की कृपा करो। जिसमें निमग्न होने पर वहाँ से मन हटता ही नहीं है, उसका माधुर्य इतना होता है
कि वह तुम्हें भी अच्छा लगता है, ऐसे ध्यान के बारे में मुझे बताइये।" उद्धव का यह प्रश्न सुनकर भगवान
उत्तम ध्यान के लक्षण के रूप में आसन और प्राणायाम का ही निरूपण करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
सम आसन आसीनः समकायो यथासुखम्।
हस्तावुत्सङ्ग आधाय स्वनासाग्रकृतेक्षणः॥ ३२॥
अब आसन का लक्षण सुनो। पाषाण का आसन करने से व्याधि उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। केवल
जमीन पर बैठना तो और भी कठिन और दुःखदायी है। लकड़ी का आसन बनाने से मन भी सूखी लकड़ी की तरह
शुष्क एवं निर्दयी बनता है। तृण का आसन बनायें तो जिस प्रकार उसमें चित्र विचित्र अंकुर निकले रहते हैं उसी
प्रकार मन में भी अनेक प्रकार के विकल्प उत्पन्न होते हैं। वृक्ष के पत्तों का आसन बनायें तो चित्त सदैव हिचकोले
ही खाता रहता है। जारण, मारण अथवा स्तम्भन करना हो तो काले आसन का प्रयोग करना चाहिये। ज्ञानार्जन के
लिये मृगचर्म उपयुक्त है। व्याघ्रचर्म का आसन मोक्षसिद्धि के लिये फलदायी है। श्वेत कम्बल का आसन बनाने से
मोक्ष आदि अनेक प्रकार की सिद्धियाँ साधकों को प्राप्त होती हैं। जमीन निर्मल तथा समतल हो और वहाँ किसी
के उपद्रव की सम्भावना न हो ऐसे स्थान पर आगे कहे गये ढंग से उत्तम लक्षणों से युक्त आसन तैयार करना
चाहिये। कुशा, वस्त्र, कम्बल, चर्म आदि से तैयार किये गये आसन का प्रयोग करना चाहिये। वह अत्यधिक ऊँचा
या नीचा नहीं होना चाहिये। चारों ओर से एक जैसा होना चाहिये। आसन ऊँचा होने पर वह डगमगाने लगता है
और नीचा होने पर उसमें भूमिदोष की सम्भावना होती है। इसलिये आसन समतल तथा एक जैसा होना चाहिये।
वह कोमल तथा मुलायम होना चाहिये। फिर शुद्ध मुद्रा के साथ वज्रासन अथवा कमलासन लगाना चाहिये अथवा
जिसमें आनन्द प्राप्त हो ऐसा सहजासन लगाना चाहिये और फिर मेरुदण्ड को सीधा रखना चाहिये, शरीर को
बिलकुल सीधा रखना चाहिये और मूलाधारादि जो तीन बंध हैं उन्हें ठीक तरह से साधना चाहिये। ऐसा आसन
लगाने पर उस आसन पर दोनों हाथों के फैले हुए पंजे दोनों जाँघों पर उलट कर रखने से बहुत सुन्दर लगते हैं।
फिर नाक का ऊपरी हिस्सा दूर रख केवल नाक के अग्रभाग पर दृष्टि केन्द्रित करनी चाहिये। उसी स्थान पर

४१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अग्निचक्र होता है जिसमें योग का श्रेष्ठ साधन होता है। इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास करते रहने से योगाभ्यास
तथा योगसामर्थ्य से, उस समय ध्यान के बाद होने वाले चित्तस्थैर्य के संयोग से नेत्र अधोन्मीलित हो जाते हैं। भेद
से तत्काल अभेद में दृष्टि स्थिर हो जाने पर वह अन्य पदार्थों को न देखकर नासाग्रि में दृढ़ हो जाती है। किन्तु
आसन की जय, तीनों बंधों की प्राप्ति तथा दृष्टि की स्थिरता साधक को किस रीति से प्राप्त होगी ? उद्धव ! तुम्हारे
मन में यदि ऐसी शंका आती है तो उस अभ्यास का प्रकार भी मैं तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ।
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः।
विपर्ययेणापि शनैरभ्यसेन्निर्जितेन्द्रियः ॥ ३३ ॥
अभ्यास का पहला लक्षण है प्राण का भाग शुद्ध करना। पूरक, कुंभक तथा रेचक यही प्राण और अपान
वायु को शुद्ध करते हैं। जिह्वा तथा लिंग के स्वैराचार पर जो काबू पा सकता है वही यह प्राणायाम कर सकता
है। अन्य कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे लेकिन उससे वह नहीं सधेगा। प्राण का शुद्धिकरण किस प्रकार
किया जाता है, सुनो। पूरक, कुंभक तथा रेचक करने के बाद तत्काल रेचक, पूरक और कुंभक इन दोनों का
अभ्यास करना चाहिये। पहले ईडा (बायां नथुना) से वायु भीतर खींच लेनी चाहिये, फिर उसे वैसे ही रख कर
बाद में वैसे ही बाहर छोड़ना चाहिये। यह एक लक्षण है अथवा दायें नथुना से वायु भीतर खींचनी चाहिये और
उसी से बाहर छोड़नी चाहिये। यह प्राणायाम का दूसरा लक्षण है ऐसा ज्ञाता बताते हैं किन्तु जो लक्षण सभी को
स्वीकार है उसके अनुसार बायें नथुने से वायु भीतर खींचनी चाहिये, कुम्भक से उसे भीतर रोक कर रखना
चाहिये और फिर दाहिने नथुने से उसे बाहर छोड़ना चाहिये अथवा दाहिने नथुने से वायु भीतर लेनी चाहिये, उसे
कुम्भक से रोक कर रखना चाहिये और फिर उसे बायें नथुने से बाहर छोड़ना चाहिये। लेकिन यह योगाभ्यास के
विरुद्ध है। इसलिये उसमें फेरबदल नहीं करना चाहिये और क्रम नहीं बदलना चाहिये। किसी भी प्रकार की
जल्दबाजी न कर शान्त चित्त से धीरे-धीरे अभ्यास करना चाहिये। इसमें यदि जल्दबाजी की तो प्राण संकट में
पड़ जायेंगे। चींटी पर्वत पर चढ़ना शुरु करती है और चढ़ती जाती है, नीचे नहीं गिरती है लेकिन यदि उत्तम
घोड़ा भी चढ़ने लगे तो काफी परिश्रम के बाद भी वह चढ़ नहीं पायेगा। उसी प्रकार इस योगाभ्यास में ज्ञान और
बुद्धिमानी काम नहीं आती। बुद्धिमानी का अहंकार करने वाले का अधःपतन ही होता है। वह उस मार्ग पर आगे
नहीं चल पाता। उद्धव ! उस चींटी की ही तरह जो धीरे-धीरे योगमार्ग पर चलने का प्रयत्न करता है वही
सचमुच ओंकार के मस्तक पर चढ़ता है इसे ध्यान में रखो। पक्का अभ्यास हो जाने पर, जिस प्रकार समरांगण में
शूर योद्धा बिना किसी रुकावट के चलता है, उसी प्रकार साधक की इच्छा के अनुसार प्राणवायु चलता है।
अभ्यास गाढ़ा होने के कारण यदि प्राण उबल रहा हो तो वह प्राण और अपान का भेद ही तोड़ देता है और चक्र
के परदे फाड़ देता है। यहाँ मेरा भजन दो प्रकार का होता है। पहला योगमुक्त और निर्गुण का रहता है और दूसरा
ओंकार के अभ्यास से सगुण करते रहते हैं। उसका भी लक्षण सुनो। अब प्राणायाम के भेद सुनो। इसमें सगर्भ
प्राणायाम तथा अगर्भ प्राणायाम ये दो प्रकार हैं। सगर्भ प्राणायाम शास्त्रोक्त मार्ग से शुद्ध है और सगुणध्यानादिकों
से सम्बन्धित, दूसरा अगर्भ प्राणायाम है।
हृद्यविच्छिन्नमोङ्कारं घण्टानादं बिसोर्णवत्।
प्राणेनोदीर्य तत्राथ पुनः संवेशयेत् स्वरम् ॥ ३४ ॥
ओंकार का दीर्घ उच्चार यदि वाणी नहीं कर पाती है तो वही ओंकार हृदय में निरन्तर चलता रहता है। वह

चौदहवाँ अध्याय ४१५
घंटानाद की तरह अखण्ड चलता रहता है। कमलनाल के सूक्ष्म तंतु की तरह मूल से ब्रह्मरन्ध्र के अन्त तक
प्राणायाम से प्रणव का आभास होता है। वहाँ अत्यन्त दीर्घ स्वर में नाद होता है इसलिये अत्यन्त सूक्ष्म रीति से
प्रणव का भास होता है। उसे प्राणायाम से स्थिर, अखण्ड रूप तथा नादयुक्त करना चाहिये।
एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणमेव समभ्यसेत्।
दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग् जितानिलः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार स्वर, वर्ण और मात्रा इनसे भी निराला अत्यन्त श्रेष्ठ तथा अदृश्य ऐसा जो (ॐकार) है उसे
कितने ही पुरुष अभ्यास के सामर्थ्य से स्वयं इन्द्रियों को वृत्तिगोचर कर लेते हैं। उस उच्चार का चमत्कार
आश्चर्यजनक है। वह ऊर्ध्वमुख होकर अखण्ड अस्तित्व में रहता है। उसी झंकारयुक्त तथा नादमय प्रणव को
अभ्यास के योग से स्थिर करते हैं। इस प्रकार आलस्य का त्याग कर प्रणव का त्रिकाल अभ्यास करते समय
धीरे-धीरे दस आवृत्तियाँ करने से, जिस प्रकार कोई महासाध्वी पतिव्रता अपने पति के वचन का जरा भी
उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार एक माह पूरा होने के भीतर ही यह प्राणजप साध्य होता है। इस अभ्यास में
सतत दक्ष रहने पर वह पुरुष योगाभ्यास का रहस्य सहज ही प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार प्राणनिरोध साध्य होने
से भजन की स्थिति भी दो प्रकार की होती है। पहली शास्त्रोक्त विधि से सगुणोपासना तथा दूसरी योगाभ्यास से
निर्गुणोपासना। लेकिन दोनों का समाधान निर्गुण में ही मिलता है, यह ध्यान में रखो। इन दोनों का उपलक्षण
श्रीकृष्ण संक्षेप में बताते हैं। अरे! ॐकार का स्मरण ही जहाँ नष्ट होता है और यदि स्मरण किया ही तो स्वर के
साथ प्राण ही प्रणव में भर जाता है और फिर अखण्ड आकार से उल्हास पाने वाला प्रणव ही स्फुरण करता रहता
है। जहाँ से अक्षरों का उद्गम होता है और बोलने के बाद शब्द जिसमें समाविष्ट होते हैं और फिर जो स्फूर्ति
शेष रहती है, उसी को सचमुच प्रणव कहते हैं। उस प्रणव के ही आधार पर छहों चक्र जीतने पर प्रणव आगे
बढ़कर निश्चयपूर्वक चलने लगता है। तब कुण्डलिनी शक्ति के जोर और वैराग्य की प्रबलता के कारण वह
सुषुम्ना नाड़ी (इडा और पिंगला के बीच सुषुम्ना नाड़ी है) के द्वार का मार्ग तत्परता से पार कर पश्चिम मार्ग के
पहले स्थान को प्राप्त कर लेता है। उस समय दशनादों के घोष से विजय का निशान लहराने लगता है। तब आगे
चलने का जो योगमार्ग है वह अपने आप ही आगे आता है। वहाँ औटपीठ और गोल्हार अत्यन्त आनन्द और
उत्साह से दोनों चक्रों का मार्ग जीतकर तत्परता से आगे बढ़ने लगते हैं। पीछे का विस्मरण हो जाता है, विकल्प
का भी नाश हो जाता है और जीने की कला प्राप्त हो जाती है। वहाँ सहस्रदल कमलों से छूटी धारायें नीचे की
ओर आती रहती हैं और सीधे स्वानंदजीवन (जीवनकला के निकट) के पास आती हैं। वहाँ का जल
आनन्दपूर्वक सेवन करने से संतप्त हुई जमीन हरी हो जाती है, इन्द्रियों की बेचैनी शान्त हो जाती है और गुणों
की त्रिवेणी डूब जाती है। तब भ्रमर गुफा के अन्दर जीव और शिव की एकान्त में भेंट होती है। उससे जीवत्व
के प्रान्त और वृत्ति इन दोनों का नाश होता है। यहाँ आत्मस्वरूप से ऐक्य हो जाने के कारण शिव और शक्ति का
उत्कृष्ट तालमेल हो जाता है और परमानन्द से शरीर सौष्ठव बढ़ जाता है और सुख का उपभोग ही शेष रह जाता
है। उस समय उद्देश्य, बोलना, दृष्टांत अथवा वेदवाद आदि की बातें समाप्त हो जाती हैं। 'मैं' और 'तू' का अन्त
होता है और अकेला एकान्त शेष रह जाता है। लेकिन यह कहनेवाला भी कोई नहीं रहता इसे ध्यान में रखो। इस
प्रकार जो मेरे योगसामर्थ्य से बलवान हुए उन्हें ही मेरा आत्मसुख प्राप्त हुआ। लेकिन योगमार्ग का यह रास्ता
अत्यन्त कठिन है और उसमें कष्ट भी अनेक हैं। इसलिये इसमें योग की प्राप्ति एकआध को ही होती है। मेरा

४१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्तिमार्ग वैसा नहीं है और उसमें विघ्नों की तो बात ही नहीं है। भक्तों को यही स्थान प्राप्त होता है। उसका भी
प्रकार सुनो। अब इस पर आप कहेंगे कि ''योग कहाँ से मोल लिया ? मूल पद का अर्थ छूट गया है और यह
व्यर्थ की बकवास है।'' क्योंकि इसी श्लोक में भगवान ने कहा है 'मासादर्वाक' (एक माह के अन्दर ही)
प्राणायाम साध्य होता है। इसमें ध्वनितार्थ से योगाभ्यास को बताया गया है। इसीलिये मैंने उसे स्पष्ट किया। जहाँ
प्राणापान पर विजय प्राप्त होती है, वहीं यह महायोग साध्य होता है। यह योग शास्त्रों में वर्णित है। इसीलिये मैंने
उसे शास्त्रीय रीति से स्पष्ट किया। अहो ! प्राणापान का निग्रह हो जाने पर, साधक की योग्यता के अनुसार सगुण
अथवा निर्गुण उपासना के योग से उसके अनुकूल पद की सहज प्राप्ति होती है। एक बार प्राणापान पर विजय
प्राप्त हो जाय और सगुणोपासना पूर्ण हो जाय तो उस योग से किस प्रकार निर्गुण की भी प्राप्ति होती है यह
श्रीकृष्ण उद्धव से बता रहे हैं। तुम्हारा ध्यान किस प्रकार का है ? यह प्रश्न उद्धव ने किया इसलिये सगुण ध्यान
का निरूपण कर तत्काल निर्गुण स्वरूप की सिद्धता करके दिखा दी। मछली पकड़ने के लिये जिस प्रकार
आमिष का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार चित्त को पकड़ कर रखने के लिये सगुण मूर्ति की योजना की जाती
है। उसी मूर्ति का सगुण स्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
हृत्पुण्डरीकमन्तः स्थमूर्ध्वनालमधोमुखम्।
ध्यात्वोर्ध्वमुखमुन्निद्रमष्टपत्रं सकर्णिकम्॥ ३६॥
केले के फूल की तरह हृदय में अष्टदलात्मक कमल होता है। उसका मुँह नीचे की ओर तथा डंठल ऊपर
की ओर होता है और वह बिलकुल कोमल होता है। इसीलिये प्राणायाम के सामर्थ्य से हृदयकमल को ऊर्ध्वमुख
कर पूर्ण एकाग्रता से ध्यान करते हुए अष्टदल कमल को विकसित करना चाहिये। वहाँ अधोभाग में मुख और
नीचे डंठल इस प्रकार हृदय कमल की स्थिति का ध्यान करने के बाद उसकी आठों पंखुड़ियाँ प्रफुल्लित हुई हैं
ऐसी धारणा बना कर मन में स्थिर करना चाहिये।
कर्णिकायां न्यसेत् सूर्यसोमाग्नीनुत्तरोत्तरम्।
वह्निमध्ये स्मरेद् रूपं ममैतद् ध्यानमङ्गलम्॥ ३७॥
फिर उसकी कर्णिका में सोलह कलाओं से युक्त चन्द्रमण्डल है ऐसी कल्पना कर उसका ध्यान करना
चाहिये और उसके भीतर बारह कलाओं से युक्त देदीप्यमान सूर्यमण्डल है ऐसी कल्पना करनी चाहिये। उसके
भी अन्दर इसे कलाओं से युक्त धधकता अग्निमण्डल है ऐसी कल्पना कर अग्निमण्डल में मेरी अत्यन्त मंगलमय
दिव्य मूर्ति है ऐसा ध्यान करना चाहिये।
समं प्रशान्तं सुमुखं दीर्घचारुचतुर्भुजम्।
सुचारुसुन्दरग्रीवं सुकपोलं शुचिस्मितम्॥ ३८॥
समानकर्णविन्यस्तस्फुरन्मकरकुण्डलम्।
हेमाम्बरं घनश्यामं श्रीवत्सश्रीनिकेतनम्॥ ३९॥
उद्धव ! अब मेरी मूर्ति का ध्यान कैसा रहना चाहिये इसे ध्यानपूर्वक सुनो। यह कहकर श्रीकृष्ण अपनी
मूर्ति का ध्यान स्वयं ही बताने लगे। न बहुत ऊँची न बहुत नाटी, सभी अवयव समान प्रमाण में, बैठक भी
समतल, सुडौल और पुष्ट शरीर इन लक्षणों से युक्त मूर्ति का चिन्तन करना चाहिये। मूर्ति हमारी तरफ मुँह करके

चौदहवाँ अध्याय ४१७
खड़ी है ऐसा ध्यान करना चाहिये। उस मूर्ति का मुखकमल प्रसन्न और अत्यन्त रमणीय होना चाहिये। वह इस
प्रकार हो कि मूर्ति का मुँह देखते ही हृदय में आनन्द भर जाय। कमल की विशाल पंखुड़ियों की तरह कान तक
पहुँचने वाले विशाल नेत्र हों। काजल से रेखांकित काली और धनुष्याकृति भौंहें हों। साँवले ललाट पर पीला
चन्दन हो और उस पर कस्तूरी के दो टीके हों तथा उस पर कुकुमांकित अक्षत लगी हों। नाक और ललाट भव्य
होना चाहिये। ललाट के दोनों ओर की ऊँचाइयाँ तेजःपुंज हो। मुँह नाजुक तथा कोमल हो और होंठ मूँगे के
समान लाल हों और द्वितीया के चन्द्रमा की कला की तरह अत्यन्त सुन्दर ठुड्डी हो। भक्त चकोर को जैसे
चन्द्रमा होता है वैसा ही मनोहर और सुकुमार मुख हो। मुख में हीरे के समान तेजस्वी अथवा अनार के दाने जैसे
तेजयुक्त दंतपंक्ति हो। दोनों ओर समान और सुन्दर कान हों और उसमें मत्स्याकृति कुण्डल लटकते हों। गालों में
मनोहर हास्य खिलता हो और कण्ठ की आकृति शंख जैसी हो। गले में तीस लड़वाली कंठी हो और उसमें
कौस्तुभमणि शोभायमान हो। उसके तेज के प्रकाश का वर्णन कौन कर सकता है? उस तेज के सामने सूर्य भी
फीका लगेगा। स्वाभाविक रूप से ही भुजंग जैसे दीखने वाले अजानबाहु चार हाथ, विशाल वक्षःस्थल हो और
उस पर श्रीवत्स का चिह्न हो। हृदय पर दोनों ओर श्रीवत्स और श्रीनिकेतन; उदर गहरा हो और उस पर तीन
पंक्तियाँ हों, दामोदर चिह्न उसमें प्रकट हो रहा हो। बिजली की चमक जैसा चमकीला, सुवर्ण की आभावाला
पीला पीताम्बर परिधान की हुई घनश्याम की सुशोभित मूर्ति! जिस प्रकार आकाश में चाँदनी छिटकने पर नीले
रंग पर शुभ्र वर्ण की आभा चमकती है उसी प्रकार श्यामवर्ण अंग पर शुभ्र चन्दन का उबटन होने से श्रीहरि की
शोभा अप्रतिम दिखाई देती है।
शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम् ।
नूपुरैर्विलसत्पादं कौस्तुभप्रभया युतम्॥४०॥
द्युमत्किरीटकटककटिसूत्राङ्गदायुतम् ।
सर्वाङ्गसुन्दरं हृद्यं प्रसादसुमुखेक्षणम्॥४१॥
कौस्तुभमणि से युक्त कंठ, पैरों तक लटकने वाली वनमाला कमर में परिधान की हुई रत्नों से जड़ित
मेखला और उसमें लगे हुए झुनझुन करने वाले घुँघरू। कर में कंकण और बाहुओं में अंगद, शंख, चक्र, पद्म,
गदा आदि आयुध हों और उँगलियों में नाना प्रकार की रत्नजड़ित मुद्रिकाएँ हों। गहरी और निर्मल नाभि जिसमें
से बालक ब्रह्मा का जन्म हुआ और जो त्रैलोक्यरूपी कमल का भी मूल स्थान है, वह श्रीहरि का नाभिकमल है।
उसके सुडौल, सुन्दर तथा स्वयंभू चरण मणिरत्नों के खम्भों की तरह शोभा दे रहे हैं। हरि के शरीर में वे चरण
अत्यन्त शोभा प्रदान करते हैं और उस श्रीहरि के चरणों पर ध्वज, वज्र, अंकुरा, यवांकित ऊर्ध्व रेखा, पद्म, चक्र
आदि शुभ चिह्न होने के कारण वे अत्यन्त सुन्दर दिखायी देते हैं। इंद्रनील मणि कांति का त्रिकोण बना हो, इस
प्रकार मनोहर, पारदर्शी, श्यामवर्ण और कोमल सुकुमार तलुवों की आरक्त आभा है। तलुवों के नीचे आरक्त
आभा और पैरों के ऊपर साँवली छटा है जिससे संध्या में नीले आकाश पर लाल छटा का आभास होता है।
नभोमण्डल में चन्द्र की रेखा सुशोभित हो रही हो, इस प्रकार उँगलियों के सिरे पर नख शोभा दे रहे हैं।
पिण्डलियाँ भी उसी प्रकार कोमल तथा मनोरम और जंघायें भी अत्यन्त सुन्दर हैं। सिंहों को अपनी कमर पर गर्व
था किन्तु श्रीहरि की कमर देखते ही वे जंगल में भाग गये। अभी भी वे जंगल में ही निवास कर रहे हैं।
लज्जावश वे किसी को मुँह नहीं दिखाते और श्रीहरि की कमर देखने को मिल सके इसलिये वे मेखला पर चित्र