श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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बताया। भक्त जब मेरे सुख का उपभोग करते हैं तो देहादि जन्म-दुःख भूल जाते हैं। वे भूख-प्यास भी भूल जाते हैं।
आत्मसुख से वे ओतप्रोत हो जाते हैं। ऐसे आत्मसुख का माधुर्य भला विषय लंपट लोगों को कैसे मिल पाएगा?
लाखों रुपया खर्च करने पर भी उन्हें उस सुख की एक कौड़ी प्राप्त नहीं होगी। धन, धान्य, पुत्र, सगे-सम्बन्धी
आदि सर्वस्व देने पर भी उस सुख का कण भी उन्हें प्राप्त नहीं होता। इतना ही नहीं बल्कि जब सत्यलोक में रहने
वाले लोगों को भी वह सुख नहीं प्राप्त होता तो औरों की क्या कथा? फिर ब्रह्मदेव को भी वह सुख कैसे
मिलेगा? मुझ आत्मा को सुख की प्राप्ति होने से सारे इन्द्रिय सुखस्वरूप हो जाते हैं। उस सुखस्थिति का एक
सहस्रांश भी स्वर्गादि लोक के लोग नहीं प्राप्त कर सकते। अपने निष्काम, निर्लोभ तथा गर्वहीन भजन करने वाले
निर्मत्सरी तथा निरभिमानी भक्तों को मैं अपना पूर्ण सुख देता हूँ इसे ध्यान में रखो। सचमुच देश और काल की सीमा
से परे मेरे अगाध आत्मसुख पर मेरे भक्तों का वास रहता है।
अकिंचनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतसः।