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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 430, कुल 869 में से

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पृष्ठ 430

४१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अग्निचक्र होता है जिसमें योग का श्रेष्ठ साधन होता है। इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास करते रहने से योगाभ्यास
तथा योगसामर्थ्य से, उस समय ध्यान के बाद होने वाले चित्तस्थैर्य के संयोग से नेत्र अधोन्मीलित हो जाते हैं। भेद
से तत्काल अभेद में दृष्टि स्थिर हो जाने पर वह अन्य पदार्थों को न देखकर नासाग्रि में दृढ़ हो जाती है। किन्तु
आसन की जय, तीनों बंधों की प्राप्ति तथा दृष्टि की स्थिरता साधक को किस रीति से प्राप्त होगी ? उद्धव ! तुम्हारे
मन में यदि ऐसी शंका आती है तो उस अभ्यास का प्रकार भी मैं तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ।
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः।
विपर्ययेणापि शनैरभ्यसेन्निर्जितेन्द्रियः ॥ ३३ ॥
अभ्यास का पहला लक्षण है प्राण का भाग शुद्ध करना। पूरक, कुंभक तथा रेचक यही प्राण और अपान
वायु को शुद्ध करते हैं। जिह्वा तथा लिंग के स्वैराचार पर जो काबू पा सकता है वही यह प्राणायाम कर सकता
है। अन्य कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे लेकिन उससे वह नहीं सधेगा। प्राण का शुद्धिकरण किस प्रकार
किया जाता है, सुनो। पूरक, कुंभक तथा रेचक करने के बाद तत्काल रेचक, पूरक और कुंभक इन दोनों का
अभ्यास करना चाहिये। पहले ईडा (बायां नथुना) से वायु भीतर खींच लेनी चाहिये, फिर उसे वैसे ही रख कर
बाद में वैसे ही बाहर छोड़ना चाहिये। यह एक लक्षण है अथवा दायें नथुना से वायु भीतर खींचनी चाहिये और
उसी से बाहर छोड़नी चाहिये। यह प्राणायाम का दूसरा लक्षण है ऐसा ज्ञाता बताते हैं किन्तु जो लक्षण सभी को
स्वीकार है उसके अनुसार बायें नथुने से वायु भीतर खींचनी चाहिये, कुम्भक से उसे भीतर रोक कर रखना
चाहिये और फिर दाहिने नथुने से उसे बाहर छोड़ना चाहिये अथवा दाहिने नथुने से वायु भीतर लेनी चाहिये, उसे
कुम्भक से रोक कर रखना चाहिये और फिर उसे बायें नथुने से बाहर छोड़ना चाहिये। लेकिन यह योगाभ्यास के
विरुद्ध है। इसलिये उसमें फेरबदल नहीं करना चाहिये और क्रम नहीं बदलना चाहिये। किसी भी प्रकार की
जल्दबाजी न कर शान्त चित्त से धीरे-धीरे अभ्यास करना चाहिये। इसमें यदि जल्दबाजी की तो प्राण संकट में
पड़ जायेंगे। चींटी पर्वत पर चढ़ना शुरु करती है और चढ़ती जाती है, नीचे नहीं गिरती है लेकिन यदि उत्तम
घोड़ा भी चढ़ने लगे तो काफी परिश्रम के बाद भी वह चढ़ नहीं पायेगा। उसी प्रकार इस योगाभ्यास में ज्ञान और
बुद्धिमानी काम नहीं आती। बुद्धिमानी का अहंकार करने वाले का अधःपतन ही होता है। वह उस मार्ग पर आगे
नहीं चल पाता। उद्धव ! उस चींटी की ही तरह जो धीरे-धीरे योगमार्ग पर चलने का प्रयत्न करता है वही
सचमुच ओंकार के मस्तक पर चढ़ता है इसे ध्यान में रखो। पक्का अभ्यास हो जाने पर, जिस प्रकार समरांगण में
शूर योद्धा बिना किसी रुकावट के चलता है, उसी प्रकार साधक की इच्छा के अनुसार प्राणवायु चलता है।
अभ्यास गाढ़ा होने के कारण यदि प्राण उबल रहा हो तो वह प्राण और अपान का भेद ही तोड़ देता है और चक्र
के परदे फाड़ देता है। यहाँ मेरा भजन दो प्रकार का होता है। पहला योगमुक्त और निर्गुण का रहता है और दूसरा
ओंकार के अभ्यास से सगुण करते रहते हैं। उसका भी लक्षण सुनो। अब प्राणायाम के भेद सुनो। इसमें सगर्भ
प्राणायाम तथा अगर्भ प्राणायाम ये दो प्रकार हैं। सगर्भ प्राणायाम शास्त्रोक्त मार्ग से शुद्ध है और सगुणध्यानादिकों
से सम्बन्धित, दूसरा अगर्भ प्राणायाम है।
हृद्यविच्छिन्नमोङ्कारं घण्टानादं बिसोर्णवत्।
प्राणेनोदीर्य तत्राथ पुनः संवेशयेत् स्वरम् ॥ ३४ ॥
ओंकार का दीर्घ उच्चार यदि वाणी नहीं कर पाती है तो वही ओंकार हृदय में निरन्तर चलता रहता है। वह