श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निष्किंचना मय्यनुरक्तचेतसः शान्ता महान्तोऽखिलजीववत्सलाः।
कामैरनालब्धधियो जुषन्ति यत् तन्निरपेक्ष्यं न विदुः सुखं मम ॥ १७॥
जिनके पास मेरे सिवा फूटी कौड़ी भी नहीं है, वे मेरे सिवा इस संसार में किसी और को देखते ही नहीं
हैं। इस प्रकार मेरा भजन करने से जाति, कुल और देह का अभिमान सहज ही नष्ट हो जाता है। इसी का नाम है
'अकिंचन' और मेरे स्वरूप में मन तल्लीन रहता है इसलिये वहाँ आत्मशांति भी पूर्ण रूप से वास करती है।
ऐसी आत्मशांति में जब भक्ति परिणत हो जाती है समस्त प्राणीमात्र में उसे मेरे सिवा दूसरा स्वरूप दिखायी ही
नहीं देता। जिधर-जिधर भी जीव देखता है वहाँ वह स्वयं को मद्रूप हुआ देखता है। उस पूर्व परिचित आनन्द से
वह स्वाभाविक रूप से प्रेम करने लगता है। इस मद्रूपस्थिति से जीव मात्र पर अनन्य प्रीति होती है। इस प्रकार
मेरी ही भावना से मेरी भक्ति करने का नाम है 'महंत स्थिति'। इस प्रकार सर्वत्र मेरी भावना रखने वाला जब मेरा
भक्त हो जाता है तो उसमें होने वाले सभी कामादिक दोषों का लोप हो जाता है। सूर्य जब पूर्व दिशा में आता है
तो सभी नक्षत्र समुदाय लुप्त हो जाता है उसी प्रकार भक्ति के उदयकाल में कामादिकों की होली जलती है। काम
की निवृत्ति होने पर सहज ही निर्विषय स्थिति प्राप्त होती है और तब मेरे सुख का सुखलाभ होकर वे उस सुख
में निमग्न रहते हैं। देश, काल अथवा वेदों को भी जिस सुख की थाह नहीं लगती, उस सुख के सुखदायी वैभव
का मेरे भक्त सदा उपभोग करते हैं। जिस सुख का लाभ होने से चित्त की वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस सुख से
सारे अवयव आनन्दमय हो जाते हैं। मेरे भक्तों को सुख की इतनी अधिक प्राप्ति होती है। मोक्ष सुख में भी इस
सुख का माधुर्य नहीं है। सचमुच हरिभक्त धन्य हैं। ऐसे सुख के लिये साधक लोग जी जान से प्रयत्नशील रहते
हैं। तपादि साधनों के चक्कर में शरीर को यातना देते हैं। विषयों पर अंकुश लगाते हैं। कोई योगयाग करते हैं,
कोई शास्त्रों का अभ्यास करते हैं, कोई सब कुछ त्याग कर देते हैं, कोई घर और पत्नी का संग छोड़ देते हैं, कोई
फलों का आहार करते हैं तो कोई निराहार रहते हैं, कोई नग्न स्थिति में रहते हैं, कोई ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते
हैं, कोई गिरिकन्दराओं में रहते हैं, कोई पर्वत की चोटी पर जाकर बैठते हैं, कोई पर्वत की गुफा में बैठते हैं।
कुछ लोग जटाएँ बढ़ाते हैं तो कोई जटाओं में गाँठ बाँधकर उनका जूड़ा बनाते हैं। कोई अपने नाखून बढ़ाते हैं,
कोई हठयोग का साधन करते हैं तो कोई उन्मत्त पिशाच की तरह स्वैराचार करते हैं। कुछ लाल रंग के कपड़े
पहन कर खुले सिर रहते हैं तो कोई शरीर पर चिथड़े पहनते हैं। कोई तीर्थयात्रा कर शरीर को कृश बनाते हैं तो
कोई मौन धारण कर गूँगे बने रहते हैं। कुछ लोग शरीर में भभूत लगाते हैं तो कोई लगातार बक्बक् करते रहते
हैं। किसी को पानी का ही पागलपन रहता है। कुछ दर्भ तथा मृत्तिका में ही लीन रहते हैं। ऐसी अनेक पद्धतियाँ
हैं जिनमें साधक कितने जर्जर होते हैं इसकी कोई गिनती ही नहीं है। लेकिन सचमुच मेरे भजन का लाभ इनमें
से किसीं को भी नहीं होता। उस सुख के दर्शन उन्हें स्वप्न में भी नहीं होते इतने वे उस सुख से वंचित हो जाते
हैं। चन्द्रमा के किरणों से निकलने वाला अमृत जिस प्रकार कौओं को दुर्लभ रहता है, उसी प्रकार मेरा सच्चा
आत्मसुख अभक्तों को सचमुच प्राप्त नहीं होता। गोथन में लगी किलनी को रक्त ही अच्छा लगता है। बेचारा
नजदीक के ही दुग्ध का सेवन नहीं कर सकता। उसी प्रकार मेरी भक्ति छोड़कर अनेक प्रकार के साधनों से जो
व्यर्थ ही कष्ट भोगते हैं, उन्हें हे उद्धव! मेरे आत्मसुख की प्राप्ति नहीं होती। जिन्होंने मेरे भजन की प्रीति से
भक्ति की पौध को सींचा उन्हें ही सचमुच मेरे आत्मसुख की प्राप्ति हुई। मेरे उस आत्मसुख में बासीपन की बात
ही नहीं है। कल्पांत में भी कोई उससे नहीं ऊबेगा और वहाँ इन्द्रियों की कोई बाधा भी नहीं है। देखो! विषयों
का सुख इन्द्रियों के अधीन होता है। किन्तु पवित्र भक्तिसुख किसी के अधीन नहीं होता और जो भाग्यवान है