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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 869 में से

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पृष्ठ 428

४१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत

अंधतम कुण्ड है, वही स्त्री है। उसकी संगति से ज्ञानशक्ति भी अन्धी हो जाती है, वह अनेक प्रकार की आसक्ति
बढ़ाती है और जिसके संयोग से स्वार्थ की भी विस्मृति होती है। उसके लिये अनेक प्रकार का संसार करना
पड़ता है, जिसके लिये असह्य गर्भवास सहन करना पड़ता है, जिसके लिये जीव के लिये वज्रपाश जैसे विषय
विलास भोगने पड़ते हैं। जो निरन्तर दुःख और शोक सहकर नरक की यातना सहती है उस साक्षात माँ को शत्रु
समझ कर उसके लिये पत्नी सगी हो जाती है। जो मातृप्रेम में दुराव उत्पन्न करती है, जो बन्धु प्रेम को बिगाड़ती
है, जो निरन्तर अपने नखरे में पुरुष को बाँधे रखती है, वह अधर्मरूपी जंगल में छोड़ देती है। उसके नेत्रकटाश
अत्यन्त प्रखर होते हैं जो एक बार पुरुष के अंतःकरण में घुसने पर उस पर अपनी मोहिनी फैलाते हैं और
जिसका विष कभी नहीं उतरता। इतना कष्ट स्त्री की संगति के कारण होता है। इसलिये जो मेरी प्राप्ति की इच्छा
करता है उसे स्त्री की आसक्ति छोड़ देनी चाहिये। हृदय में उसके प्रति लोभ ही नहीं रहना चाहिये। मन में
उसका स्मरण होते ही वह ज्ञान-ध्यान स्थिति का विध्वंस करती है। हृदय में उसका लोभ नहीं रखना चाहिये।
स्त्रियों की संगति से इतनी अधिक बाधा होती है और स्त्री-लंपट पुरुषों की बाधा तो इससे अधिक होती है। स्त्री
की संगति से प्राप्त होने वाले मोहमद से शायद पुरुष छूट पाये किन्तु स्त्री लंपट पुरुष की संगति से जो बाधा
रहती है वह तो अपार है। चुडाल स्त्री की संगति से राजा शिखिध्वज तर गया अथवा मदालसा की संगति से
कुवलयाश्व राजा तर गया। लीला नामक स्त्री ने भक्ति की साधना से सरस्वती को प्रसन्न किया जिससे उसके
पति का उद्धार हुआ यह सब वसिष्ठ मुनि ने अपने ग्रन्थ में लिखा ही है। इस प्रकार स्त्रियों की संगति से पुरुषों
के उद्धार की बातें सुनते हैं। किन्तु स्त्री लंपट पुरुष की संगति से उद्धार होने का कोई मार्ग नहीं है। जो स्त्री का
अंकित होकर रहता है, जो स्त्री के लिये स्वयं को प्राणों सहित बेच देता है, जो स्त्री का गुलाम बनता है और
उसके कहने के अनुसार आचरण करता है, जो आकाश में संचार करने वाली कुलदेवता की तरह स्त्री की पूजा
करता है और जो उसकी ही सेवा करने के लिये नाना प्रकार के उपचार करने के लिये तत्पर रहता है, वह किसी
सम्बन्धी का छल करने का निश्चय करती है तो वह उस व्यक्ति पर श्वान की तरह भूँकता है और जब वह स्त्री
उसे दुत्कार देती है तो वह दुम दबा कर भागता है। अच्छे और सुस्वादु पकवान वह स्वयं नहीं खाता और स्त्री के
हाथ में उन्हें देकर अपनी सत्ता समाप्त कर देता है। मानों कोई कार्य उसकी इच्छा के विरुद्ध हो जाय तो ब्रह्माण्ड
ही उलट जायेगा। मानों उसकी बात व्यर्थ हो जाने पर सुख ही उलट जायेगा। मानों उसकी बात व्यर्थ हो जाने पर
सुख का क्षीर सागर सूख जायेगा। देवी की, कुलदेवी की पूजा न करना, माँ-बाप के साथ छल करना, गुरु को
भी फँसाना तथा अपना सर्वस्व स्त्री को अर्पण करना। सारांश वह मदारी के बन्दर की तरह पत्नी के चारों ओर
नाचता रहता है। ऐसे स्त्री लंपट पुरुष का साथ होने पर साधक को सुख कहाँ से प्राप्त होगा ? जिसके मुख से
स्त्री सम्बन्धी बातें सुनकर ही ज्ञाताओं के मन में कामवासना उत्पन्न होती है और जो तत्काल कामवासना उत्पन्न
कर स्त्रियों के मोहजाल में फँसाता है ऐसे स्त्रीलंपट की संगत से साधक को सुख की प्राप्ति कैसे हो पायेगी ?
वह उसे अधःपतन की ओर ले जाकर नरक में अवश्य डाल देगा। इसीलिये स्त्री लंपट पुरुष की कथा या वार्ता
भी कान से नहीं सुननी चाहिये। उसकी वायु से भी बचना चाहिये। उससे मिलना नहीं चाहिये, उससे बात नहीं
करनी चाहिये, उसे देखना भी नहीं चाहिये अथवा उसके पीछे-पीछे भी नहीं जाना चाहिये। जिस मार्ग पर वह
जा रहा हो उस मार्ग का भी त्याग करना चाहिये। स्त्री और स्त्रैण की संगत से जितना दुःख प्राप्त होता है उतना
दुःख त्रिभुवन में भी कहीं दिखायी नहीं देता। स्त्री की इच्छा के वश होकर रहना इसी का नाम है स्त्री लंपटता।
स्त्री के अधीन रहना अत्यन्त निंद्य होने के कारण परमार्थ में अत्यन्त बाधक होता है। हमारे हृदय में जो