श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ४११
हो उठती है। इतना ही नहीं बल्कि अपने हावभाव तथा नेत्र कटाक्ष से वह पुरुष को सकाम कर देती है। जो
सामने नहीं है उस स्त्री का ध्यान करने से वह जब साक्षात प्रकट हुई मालूम होती है और मैं तो स्वतः सिद्ध हृदय
में रहता हूँ, अतः मेरा चिन्तन करने से सहज ही मद्रूपता प्राप्त होगी। प्यार से होने वाला मेरा चिन्तन, चित्त,
चिन्ता तथा चिन्तन क्रिया ये सब नष्ट होकर वह पुरुष स्वयं ही ज्ञानरूप हो जाता है। इसी का नाम है मद्रूपता।
अरे! मुझे प्राप्त करने का मुख्य साधन यही है। मेरा ध्यान और मेरा भजन करने से मत्स्वरूपता प्राप्त होती है।
मेरे सिवा और जो भी ध्यान किया जाता है वह सब जीव के लिये दृढ़ बन्धन होता है। इसलिये विषय का ध्यान
छोड़ कर मेरा ही चिन्तन करते रहना चाहिये।
तस्मादसद्भिध्यां यथा स्वप्नमनोरथम्।
हित्वा मयि समाधत्स्व मनो मद्भावभावितम्॥ २८॥
जो सत्य दिखायी देता है किन्तु नाशवान रहता है, उसे 'असत' कहते हैं। जो 'भ्रमरूप' होकर केवल
भासमान रहता है उसी प्रकार जो इस लोक में तथा परलोक में अपने सौन्दर्य से मन को लुभाता है और अविचार
के बल से मन को मोहित करता है; इसलिये अनेक जीव अनेक प्रकार के प्रयास कर दुःखी हो रहे हैं। बड़े कष्ट
से साधना कर स्वर्गभोग का स्थान प्राप्त किया लेकिन वह भी स्वप्न के मनोरथों की तरह नश्वर ही रहता है।
इसलिये विषयों का ध्यान करने के बजाय मेरा भजन करना चाहिये और मन को मेरी ही भावना रखने के लिये
जागृत करना चाहिये। सावधान चित्त से मेरा भजन करते समय तथा चित्त को एकाग्र कर मेरा ध्यान करते समय
उसमें जो बाधाएँ आती हैं उनका त्याग किस तरह किया जाय इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान्।
क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रितः॥ २९॥
जो मेरी प्राप्ति के लिये अत्यन्त व्याकुल हुआ हो उसे स्त्री संग का विचार ही छोड़ देना चाहिये। उसे मुझ
भगवंत का चिन्तन करना चाहिये तथा एकान्त में रहना चाहिये। स्त्री की संगति की अपेक्षा स्त्री लंपट पुरुषों की
संगत अधिक घातक तथा हानिकारक है। उनसे भेंट नहीं करनी चाहिये उनसे बात नहीं करनी चाहिये, उन्हें दूर
से भी नहीं देखना चाहिये। जो साधक है उसे काया, वाचा, मनसा स्त्री तथा स्त्रैण इन दोनों की संगत छोड़ देनी
चाहिये और मन में उन्हें पुनः देखने की इच्छा न हो इसलिये अंतःकरण को दृढ़ करना चाहिये। फिर किसी
एकान्त, निर्जन स्थान में, प्रशस्त एवं पवित्र स्थान पर आसन लगा कर मेरा चिन्तन करना चाहिये। आलस त्याग
कर वृत्ति को सावधान रखना चाहिये और फिर मन को एकाग्र कर मेरा ध्यान करना चाहिये। किन्तु मेरे साधकों
के लिये स्त्री और स्त्रीलंपट पुरुष ये दो बड़ी बाधायें हैं, जो मेरे ध्यान का विध्वंस कर विघ्नरूप से मेरी प्राप्ति के
आड़े आती हैं।
न तथास्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः।
योषित्सङ्गाद् यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ ३०॥
अविद्या के अनन्त कोटि समुदाय स्त्रीसंग में भरे रहते हैं। स्त्री को मात्र देखने भर से अधर्म की ज्वाला
भड़क उठती है। जो महामोहों की राशि है, जो प्रज्वलित कामाग्नि का ईंधन है, जो जीव का बहुत बड़ा भुलावा
है और जो अधःपतन का मुक्त द्वार है, वही स्त्री है। मदन के वे प्रखर बाण, माया का वह यंत्र और नरक का जो