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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 869 में से

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पृष्ठ 418

४०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्रिभुवन में कोई वस्तु नहीं है। मेरी भक्ति से जो मुझसे अनन्य हो जाता है, तभी उसका अज्ञान समाप्त हो
जाता है। ऐसे भक्तों की मुझसे जो प्रीति होती है वह कितनी है यह कैसे बताऊँ ? ब्रह्मदेव तो मेरा पुत्र ही है।
उसके सारे लाड़-प्यार मैं करता हूँ। लेकिन भक्तों की वैसी प्रबल प्रेमलहर वहाँ नहीं उठती। मैंने ब्रह्मदेव को
कर्मयोग दिया और भक्तों को निष्कर्मता दी। इसीलिये ब्रह्मदेव की प्रार्थना पर भी मैं वहाँ नहीं गया और
ग्वालों के घर का भात खाया। ब्रह्मदेव को नीचा दिखा कर मैं तो बछड़ा और ग्वाल बना। सारांश, मेरे भक्तों
जैसी प्रीति मुझे ब्रह्मदेव के प्रति भी नहीं है। ब्रह्मदेव की बात तो है ही, बलराम तो मेरा बड़ा भाई है लेकिन
भक्तों जैसी प्रीति सचमुच उससे भी नहीं है। कौरवों से जा मिले बलराम को नीचा दिखा कर मेरे भक्त
पाण्डवों का मैंने संरक्षण किया। जब भीष्म ने प्रतिज्ञा की तो समरभूमि में मैंने ही पीछे हट कर भक्तशिरोमणि
धनुर्धारी अर्जुन को तुम्हारे सामने बचाया। लक्ष्मी मेरी पटरानी है लेकिन उसे मैंने अपने चरणों के पास सेवा
करने बिठाया और भक्तों में अग्रगण्य गोपियों और ग्वालिनों को कन्धे पर बिठाया। जो लक्ष्मी का पूर्णरूप से
तिरस्कार करते हैं वही मेरे लिये प्रीति से पूज्य हैं। जो मुझसे लक्ष्मी की माँग करते हैं उन्हें न लक्ष्मी ही
मिलती है न लक्ष्मीपति ही। सचमुच लक्ष्मी की उपेक्षा करने वाले भक्त ही मुझे अच्छे लगते हैं। शंकर मेरा
प्रिय है। लेकिन उससे भी अधिक प्रीति मुझे ऐसे भक्तों से होती है। जिस महादेव के गुण से मुझे भी अपने
शरीर पर साँवला रंग धारण करना पड़ा और जिस महादेव के कहने से मुझे दूसरी बार मोहिनी का रूप धारण
करना पड़ा उस मोहिनी के दर्शन में ही मैंने शंकर को तत्काल मोहित किया और रुक्मांगद को आधे क्षण में
ही उस मोहिनी से बचाया। इस प्रकार मेरे भक्तों की अपेक्षा शंकर भी मुझे अधिक प्रिय नहीं है। त्रिभुवन में
भक्तों के सिवा मुझे कुछ भी प्रिय नहीं है। वेदशास्त्रों में मेरी अत्यन्त पवित्र चतुर्भुज मूर्ति का वर्णन है।
लेकिन वही मैं अपने हृदय पर मेरे भक्त के पैरों के चिह्न (भृगुपदचिह्न) धारण करता हूँ। मुझे अपने देह से
भी प्रीति नहीं है, इसीलिये मैं बड़े आनन्द से ग्वाला बना और जंगल पर्वतों में गायें चराता रहा। इतना ही
नहीं बल्कि भक्तों की घोड़ियों को भी नहलाया। मैं स्वेच्छा से परिपूर्ण हूँ फिर भी प्रेमिल भक्तों के लिये सदा
सकाम रहता हूँ। प्रेमिल भक्तों की परम भक्ति देखते ही मैं आत्माराम वहाँ कूद पड़ता हूँ। प्रेमिल भक्त को
देखते ही मैं उसे अपने साथ ले आता हूँ और अगर ऐसा न हो सके तो मैं उसे परमोत्त्व सुख अर्पण करता हूँ
और अगर वह भक्त मेरे पास न आये तो मैं उसका चाकर बनकर रहता हूँ। बड़प्पन की मानमर्यादा छोड़ मैं
अपने भक्तों की जूठन तक उठाता हूँ। भक्त कार्य के लिये उसके संकट में मैं अपने प्राण तक न्योछावर कर
देता हूँ। हे उद्धव! तुम्हारे जैसे भक्त के लिये मैं अपने देह की भी उपेक्षा करता हूँ। वे भक्त मुझे दिन-रात
अच्छे लगते हैं। वे जीवभाव से मेरे लाडले हैं। प्रेम से मेरा भजन करने के कारण वे भक्त मुझे पूज्य बन गये
हैं। उन भक्तों के लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः ॥ १६ ॥
एकनिष्ठा से मेरा भजन करने से मन मेरे ही स्वरूप पर जम जाता है और समस्त वासनायें नष्ट होकर
वृत्ति शून्य हो जाती हैं। बिना किसी प्रकार का परिश्रम किये, किसी से याचना किये बिना, अपने आप मिला
हुआ धन हाथ से लेने में निरपेक्षता नष्ट होती है। फिर धन देखकर जो झुका उसे लालच ने झुका ही दिया।
इसलिये ऐसे धन की भी उपेक्षा कर जो वहाँ से चला गया वही मुझे पूर्णरूप से वन्दनीय है। रास्ते में पैसा