श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 425, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ४०९
भजनों के माध्यम से जोर-शोर से मेरा नाम गाते हैं, बड़े भक्ति भाव से रंग जाते हैं जिससे मन में भक्ति का स्रोत
फूट पड़ता है। अंतःकरण में सुख उत्पन्न होने पर बाहर रोमांच उभर आते हैं। उस आत्मानुभव के सुख की
माधुरी प्रेमाश्रु के रूप में नेत्रों से बहने लगती है। मेरी भक्ति की चाह से 'अहं' और सोहं की अभिमान की कड़ी
टूटती है और विषय की आसक्ति समाप्त हो जाती है। उस क्षण का यही लक्षण है कि शरीर रोमांचित हो उठता
है, नेत्रों से आनंदाश्रु बहने लगते हैं और हृदय परिपूर्ण आनन्द से भर जाता है। दोनों नेत्र विस्तृत होकर उनमें का
तेज चमकने लगता है और वे सदा प्रसन्न दिखायी देते हैं। देह का भान नहीं रहता और मन भगवान में रम जाता
है। इस प्रकार यदि मेरे प्रति भक्ति उत्पन्न नहीं होगी तो फिर विषय से विरक्ति कैसे होगी ? और विरक्ति उत्पन्न
हुए बिना उद्धव ! सचमुच मेरी प्राप्ति नहीं होती। मेरी शुद्ध भक्ति जिसे पूर्ण रूप से प्राप्त हुई उसके लक्षणों का
वर्णन और उसकी पवित्रता के बारे में सुनो। जो मेरी भक्ति करता है वह तत्काल पवित्र हो जाता है। इतना ही
नहीं बल्कि वह तो त्रैलोक्य को भी पवित्र करता है ऐसा श्रीकृष्ण ने गरज कर कहा।
वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥ २४॥
शरीर पर रोमांच उभर आते हैं, पसीने की बूँदें चमकने लगती हैं, चैतन्य से चित्त द्रवित हो उठता है और
उससे वाणी भी सद्गदित हो उठती है। अंतःकरण में आनन्द भर जाते ही दृष्टि अधोन्मीलित हो जाती है, जीव
की शिव से भेंट होती है, ध्येय, ध्याता और ध्यान का त्रिकुट नष्ट हो जाता है। आँखों से अश्रु की वर्षा होने
लगती है, गला भर आता है, शरीर पर नियंत्रण नहीं रह पाता और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है। वह जोर-
जोर से आक्रोश करता है और रोने लगता है। बार, बार फफक-फफक कर रोने लगता है। रोते-रोते बीच में ही
जोर-जोर से हँसने लगता है। जिस प्रकार भूत-बाधा होने से आदमी पागल हो जाता है, उसी प्रकार उसकी
अवस्था हो जाती है। वह रोना और हँसना नहीं छोड़ता और उसमें ही ऐसी आश्चर्यजनक चाह उत्पन्न होती है
कि आत्मस्वरूप से प्रेम हो जाने के कारण वह उसी अर्थ को लेकर बार-बार गाने लगता है। 'मेरा' और 'तेरा'
भूलकर, लोकलाज छोड़ कर, अत्यंत हर्ष से, प्रेम की चाह के कारण शंकामुक्त होकर नाचने लगता है। उसके
भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। कोई बालक भटक कर जब माँ से बिछड़ जाता है, वह माँ को खोजने लगता है
लेकिन वह कहीं नहीं मिलती और जब वह मिलती है तो बालक फुक्का फाड़ कर रोने लगता है और माँ उसे
अपने कलेजे से लगा लेती है। उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा इन दोनों का भ्रांतिनगर में बिछोह हो जाता है,
एक बार उनका मिलन होते ही जीव बिलख-बिलख कर रोने लगता है। अनेक दिनों के पश्चात भेंट होने के
कारण दोनों ऐक्यभाव से गले मिलते हैं, उस आनन्द से गला भर आता है और रुलाई आ जाती है। भगवान
अनेक प्रकार से नाटकीय है। वह मायावी होने के कारण किसी को मिल नहीं पाता। वह घर में ही मिल जाता है
और आश्चर्य से, तटस्थ होकर देखता रहता है। भगवान सदा पास में ही रहता है। उसके लिये पागल होकर लोग
उसे देश-परदेश में ढूँढ़ते रहते हैं। यह देखकर उसे हँसी आ जाती है। भगवान सबके लिये अजेय है लेकिन उस
भगवान को मैंने जीत लिया और अपने हृदय में रख लिया इस आनन्द से वह नाचने लगता है। दूजेपन की बात
समाप्त कर मैंने भगवान को जीत लिया और संसार में यशस्वी हुआ इस आनन्द से वह नाचने-गाने लगता है।
देखने पर दूसरा कोई दिखायी नहीं देता इसलिये वह लाज करना भी छोड़ देता है और संसार में निर्लज्ज बन
जाता है। उसकी निर्लज्जता का यह कारण है। इस प्रकार मेरे भक्त भक्तियुक्त होकर आत्मानंद से नाचते-गाते