श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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रहते हैं। उनके उस आनन्द से त्रैलोक्य पवित्र हो जाता है। जिनके चरणों का दर्शन होते ही जड़ जीवों का उद्धार
होता है, उनके चरणों की धूल लगने पर भी पशु और पाषाण का उद्धार होता है। कीर्तन के महाघोष ने संसार के
सारे दुःख नष्ट कर दिये, सारा ब्रह्माण्ड आनन्द से भर जाने के कारण वह अत्यन्त सुख से ओत-प्रोत रहता है।
किसी ने दर्शन से तारा, किसी ने स्पर्श से तारा तो किसी ने उपदेश से तारा। कोई कीर्तन से तरे तो कोई
नामस्मरण से तर गये। उद्धव! इस प्रकार उन्होंने जगत का उद्धार किया। जीव अविद्यायुक्त होने के कारण मलिन
रहता है। उसे शुद्ध होने के लिये मेरी भक्ति ही मुख्य साधन है, यह ध्यान में रखो। यही बात श्रीकृष्ण स्वयं
बताते हैं।
यथाग्निना हेम मलं जहाति ध्मातं पुनः स्वं भजते च रूपम्।
आत्मा च कर्मानुशयं विधूय मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम्॥ २५॥
मिलावटी सोना मलिन हो जाता है। उसे पानी से कितनी ही बार धोने पर भी उसमें शुद्धता नहीं आती।
लेकिन उसी सुवर्ण का पत्ता बनाकर उसे अग्नि में तपाने से उसका मैल जल जाता है और वह शुद्ध होकर पहले
जैसा चमकने लगता है। उसी प्रकार अविद्या और सकाम कर्म से जो मलिन हुआ रहता है उसके चित्त की शुद्धि
करने के लिये मेरी भक्ति यही एक उपाय है। उसी के योग से जीव के मल का क्षालन होता है। अंतःकरण पर
जैसे-जैसे भक्ति का पुट चढ़ता है वैसे-वैसे अविद्या के बन्धन ढीले होते जाते हैं, माया का मूल ही नष्ट हो जाता
है और जीव आत्मपद को प्राप्त कर लेता है। अविद्या का बन्धन टूट जाने पर उस ज्ञानस्वरूप तथा शुद्ध जीव को
पूर्ण बोध होता है और उस आत्मबोध के कारण उसे अत्यन्त आनन्द होता है। जीव को जो अविद्या प्राप्त है
उसकी निवृत्ति ज्ञान से होगी। तो फिर वहाँ भक्ति की क्या आवश्यकता है ऐसी शंका तुम करोगे। तो मेरी भक्ति
के बिना ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
यथा यथाऽऽत्मा परिमृज्यतेऽसौ मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः।
तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम्॥ २६॥
मेरा वेदशास्त्रों ने बनाया स्वरूप, मेरे नाना प्रकार के चरित्र और मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, मनन
अथवा कीर्तन आदि से चित्त का क्षालन कर जो भी मेरी भक्ति करता है उसकी अविद्या की निवृत्ति होती है और
श्रुति को तथा वेदान्त को भी मेरे अतर्क्य स्वरूप की प्राप्ति होती है। जो अत्यन्त सूक्ष्म और निर्गुण रहता है वह
अलक्ष्य होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं होता इतना गहन होता है, वही स्वरूप जीव को प्राप्त होता है और मेरे
भजन से उसका समाधान होता है। जिसकी आँखों में अंजन लगा रहता है वह पृथ्वी के अन्दर का खजाना भी
देख सकता है, उसी प्रकार मेरे भजन से ज्ञान प्राप्त कर जीव ज्ञानस्वरूप हो जाता है। उद्धव! यह एक बात ध्यान
में रखो कि यहाँ अधिक परिश्रम की आवश्यकता नहीं है। जिसके चित्त में जैसा भाव रहता है वैसा ही फल उसे
प्राप्त होता है।
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥ २७॥
जो विषयों का ही ध्यान करता है वह विषयों में ही मग्न रहता है। जो सदा मेरा ही चिन्तन करता है, वह
ज्ञानस्वरूप मैं ही बन जाता हूँ। पत्नी मैके जाती है उस समय उसका ध्यान करते ही मन में उसकी मूर्ति साकार