श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ४१५
घंटानाद की तरह अखण्ड चलता रहता है। कमलनाल के सूक्ष्म तंतु की तरह मूल से ब्रह्मरन्ध्र के अन्त तक
प्राणायाम से प्रणव का आभास होता है। वहाँ अत्यन्त दीर्घ स्वर में नाद होता है इसलिये अत्यन्त सूक्ष्म रीति से
प्रणव का भास होता है। उसे प्राणायाम से स्थिर, अखण्ड रूप तथा नादयुक्त करना चाहिये।
एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणमेव समभ्यसेत्।
दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग् जितानिलः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार स्वर, वर्ण और मात्रा इनसे भी निराला अत्यन्त श्रेष्ठ तथा अदृश्य ऐसा जो (ॐकार) है उसे
कितने ही पुरुष अभ्यास के सामर्थ्य से स्वयं इन्द्रियों को वृत्तिगोचर कर लेते हैं। उस उच्चार का चमत्कार
आश्चर्यजनक है। वह ऊर्ध्वमुख होकर अखण्ड अस्तित्व में रहता है। उसी झंकारयुक्त तथा नादमय प्रणव को
अभ्यास के योग से स्थिर करते हैं। इस प्रकार आलस्य का त्याग कर प्रणव का त्रिकाल अभ्यास करते समय
धीरे-धीरे दस आवृत्तियाँ करने से, जिस प्रकार कोई महासाध्वी पतिव्रता अपने पति के वचन का जरा भी
उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार एक माह पूरा होने के भीतर ही यह प्राणजप साध्य होता है। इस अभ्यास में
सतत दक्ष रहने पर वह पुरुष योगाभ्यास का रहस्य सहज ही प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार प्राणनिरोध साध्य होने
से भजन की स्थिति भी दो प्रकार की होती है। पहली शास्त्रोक्त विधि से सगुणोपासना तथा दूसरी योगाभ्यास से
निर्गुणोपासना। लेकिन दोनों का समाधान निर्गुण में ही मिलता है, यह ध्यान में रखो। इन दोनों का उपलक्षण
श्रीकृष्ण संक्षेप में बताते हैं। अरे! ॐकार का स्मरण ही जहाँ नष्ट होता है और यदि स्मरण किया ही तो स्वर के
साथ प्राण ही प्रणव में भर जाता है और फिर अखण्ड आकार से उल्हास पाने वाला प्रणव ही स्फुरण करता रहता
है। जहाँ से अक्षरों का उद्गम होता है और बोलने के बाद शब्द जिसमें समाविष्ट होते हैं और फिर जो स्फूर्ति
शेष रहती है, उसी को सचमुच प्रणव कहते हैं। उस प्रणव के ही आधार पर छहों चक्र जीतने पर प्रणव आगे
बढ़कर निश्चयपूर्वक चलने लगता है। तब कुण्डलिनी शक्ति के जोर और वैराग्य की प्रबलता के कारण वह
सुषुम्ना नाड़ी (इडा और पिंगला के बीच सुषुम्ना नाड़ी है) के द्वार का मार्ग तत्परता से पार कर पश्चिम मार्ग के
पहले स्थान को प्राप्त कर लेता है। उस समय दशनादों के घोष से विजय का निशान लहराने लगता है। तब आगे
चलने का जो योगमार्ग है वह अपने आप ही आगे आता है। वहाँ औटपीठ और गोल्हार अत्यन्त आनन्द और
उत्साह से दोनों चक्रों का मार्ग जीतकर तत्परता से आगे बढ़ने लगते हैं। पीछे का विस्मरण हो जाता है, विकल्प
का भी नाश हो जाता है और जीने की कला प्राप्त हो जाती है। वहाँ सहस्रदल कमलों से छूटी धारायें नीचे की
ओर आती रहती हैं और सीधे स्वानंदजीवन (जीवनकला के निकट) के पास आती हैं। वहाँ का जल
आनन्दपूर्वक सेवन करने से संतप्त हुई जमीन हरी हो जाती है, इन्द्रियों की बेचैनी शान्त हो जाती है और गुणों
की त्रिवेणी डूब जाती है। तब भ्रमर गुफा के अन्दर जीव और शिव की एकान्त में भेंट होती है। उससे जीवत्व
के प्रान्त और वृत्ति इन दोनों का नाश होता है। यहाँ आत्मस्वरूप से ऐक्य हो जाने के कारण शिव और शक्ति का
उत्कृष्ट तालमेल हो जाता है और परमानन्द से शरीर सौष्ठव बढ़ जाता है और सुख का उपभोग ही शेष रह जाता
है। उस समय उद्देश्य, बोलना, दृष्टांत अथवा वेदवाद आदि की बातें समाप्त हो जाती हैं। 'मैं' और 'तू' का अन्त
होता है और अकेला एकान्त शेष रह जाता है। लेकिन यह कहनेवाला भी कोई नहीं रहता इसे ध्यान में रखो। इस
प्रकार जो मेरे योगसामर्थ्य से बलवान हुए उन्हें ही मेरा आत्मसुख प्राप्त हुआ। लेकिन योगमार्ग का यह रास्ता
अत्यन्त कठिन है और उसमें कष्ट भी अनेक हैं। इसलिये इसमें योग की प्राप्ति एकआध को ही होती है। मेरा