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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 869 में से

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पृष्ठ 421

चौदहवाँ अध्याय ४०५
उन्हीं को वह प्राप्त होता है। देखो ! जिस सुख का उपभोग लेते समय देही भी विदेही हो जाता है, वह सुख मेरे
भक्तों में प्रकट होते ही वह कभी कम नहीं होता। इस प्रकार के ये उत्तम भक्त जब सुखी हो जाते हैं तो इसमें
आश्चर्य कैसा ? लेकिन जो केवल विषयी थे, उन्हें भी मेरे भजन से सुख की प्राप्ति हुई। सौभाग्य से सत्संग प्राप्त
हुआ हो और मन में आस्तिक बुद्धि उत्पन्न होकर मेरे प्रति अनन्यभाव उत्पन्न हुआ तो मेरी थोड़ी-सी भक्ति से भी
विषयों की निवृत्ति होती है।
बाध्यमानोऽपि मद्द्क्तो विषयैरजितेन्द्रियः।
प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते ॥ १८ ॥
मेरे प्रति एकनिष्ठ प्रेम रखने वाले तथा प्रेमयुक्त भजन करने वालों को विषयों की बाधा सतायेगी, यह
विचित्र बात क्या सम्भव है ? प्रेम से मेरी भक्ति करने पर विषय वासनायें जल जाती हैं। वहाँ विषयों के प्रति
रुचि जगेगी इसे कौन स्वीकार करेगा ? दर्पण को चूर्ण से साफ करने पर वह निर्मल हो जाता है। उसी प्रकार
भक्ति के योग से विषय धुल जाते हैं। अतः ऐसे स्थान पर विषय की आसक्ति बढ़ेगी यह बात ही बचकानी और
क्षुद्र है। जो पूर्णतयः विषयासक्त रहता है तथा प्रपंचयुक्त होकर संसार में मग्न रहता है वह भी अगर प्रसंगवश
भक्त हो गया तो विरक्त होता है। उसके बारे में भी सुनो। मन को भक्ति अच्छी लगे और विषयों की इच्छा भी
नष्ट नहीं हुई है ऐसे संकट में फँस जाने पर मेरी भक्ति का ही आश्रय करना चाहिये। विषयासक्ति को गौण
समझना चाहिये। उसे विषयासक्ति से भी विरक्ति हो सकती है। उसका उपाय बताता हूँ, सुनो। नमक से पानी
मिल जाने पर वह उसे तत्काल घोल कर अदृष्य कर देता हैं उसी प्रकार भक्ति जब बहुत अधिक बढ़ जाती है तो
वह विषयों का जाल तोड़ देती है। इस प्रकार भजन के अभ्यास से विषयों से बिछोह हो जाता है तथा आत्मसुख
का लाभ होकर आत्मानंद से मुलाकात होती है। मुझे विषय से निवृत्ति चाहिये लेकिन उसके लिये मैंने भक्ति नहीं
की, तो किस प्रकार मुझे विषयों से विरक्ति मिलेगी ? इसका उत्तर श्रीकृष्ण दे रहे हैं। दीपक से आग भड़के तो
वह घर को तथा शहर को भी जला देगी। वैसा ही प्रकार है यह।
यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात् ।
तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः ॥ १९ ॥
दीप जलाने के लिये आग जलाई तो एक चिनगारी जंगल के फूस में लग गयी जिससे आग जलाने वाले
के न चाहने पर भी एक के बाद एक झोपड़े, घर, गाँव, शहर, मन्दिर तथा पर्वत शिखर सभी जलकर भस्म हो
जाते हैं। उसी प्रकार मेरी जरा सी भी भक्ति अगर श्रद्धापूर्वक मन में प्रवेश करे तो संचित तथा नित्य होने वाले
पापों की राशियाँ पूरी तरह भस्म हो जाती हैं। पूर्व पापों का मल चित्त को अत्यन्त कस कर चिपका रहता है
जिससे चित्त अत्यन्त चंचल होकर सदा विषयों के लिये व्याकुल रहता है। उसे यदि मेरी भक्ति का थोड़ा-सा
अंश भी मिल गया तो उतने से ही पूर्व पातकों का संग्रह नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार दीपक के स्पर्श से कपूर
तत्काल पूरी तरह नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार वह भस्म हो जाता है। चित्त इस प्रकार निर्मल हो जाने पर वहाँ
सदा ब्रह्म प्रकट हो जाता है। फिर वह चित्त विषयासक्त नहीं होता। इच्छा न करने पर भी वह अपने आप विरक्त
हो जाता है। भक्ति के अंशमात्र की इतनी बड़ी महिमा है। हे भक्तोत्तम उद्धव ! मेरी सम्पूर्ण भक्ति की महिमा कौन
जान पायेगा ? वेदशास्त्रों के लिये भी वह अतर्क्य है। मेरी भक्ति अलक्ष्य होने के कारण वह दिखायी नहीं देती।
अतर्क्य होने के कारण शास्त्रमीमांसा द्वारा भी उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं हो सकता। अगाध होने के कारण