श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ४०७
भक्त्याहमेकयाग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ २१ ॥
अन्य साधन तथा युक्तियाँ दूर कर मेरी श्रद्धायुक्त भक्ति करने से मेरा लाभ होता है। मन में किसी भी प्रकार
का विकल्प लाये बिना, किसी भी प्रकार की शंका न कर समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवत्स्वरूप की भावना
रखना यही भक्ति का मुख्य लक्षण है। इसी का नाम है भजनभाव। सभी प्रकार की सम्पत्ति के प्रति उदासीन
होकर जब मेरे भजन में आनन्द आने लगे, जितनी मोक्ष की इच्छा नहीं की उससे अधिक मेरे भजन पर विश्वास
किया तो फिर तरने या न तरने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। मेरे भजन ने विधि निषेध के सभी वादों को निरस्त
कर दिया। इतने विश्वास से जिनकी भावना भक्ति के अलावा अन्य उपाय स्वीकार नहीं करती उसके ही जीवन
से हमारा जीवन चलता है। वह हमारा आत्मा ही है। ज्ञानियों का आत्मा मैं, भक्तों का प्रिय परमात्मा मैं, शास्त्रों में
जिस पुरुषोत्तम का वर्णन करते हैं वह मैं दौड़ कर उनकी अगवानी करने जाता हूँ। मुझे अनन्य भक्ति पसन्द है
इसलिये मैं उनके ही अधीन रहता हूँ। उनके ही कारण पूरे त्रैलोक्य में मेरी ख्याति है। उनके ही कारण मुझे
महत्त्व प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे अलंकार धारण करने को मिलते हैं तथा पहनने के लिये परिधान
मिलते हैं। उनके ही बल पर मैं सर्वत्र विचरण करता रहता हूँ। मेरी गाँठ में कुछ भी नहीं है। भक्तों ने अपना
सर्वस्व खर्च कर, विविध प्रकार के उपचारों से मुझे महत्त्व प्रदान किया है। मैं नेत्रहीन था उन्होंने मुझे आँखें दीं,
मुझे कान नहीं थे जो उन्होंने मुझे दिये, मैं मुखविहीन था तो उन्होंने मुझे मुख दिया, उनकी ही वाणी से मैं बोलने
लगा। उनके ही कारण मेरा आना-जाना होता है। उनके ही कारण मैं हाथों में तथा पैरों में अलंकार धारण करता
हूँ। उनके ही कारण मुझे निश्चित स्थान प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे सामर्थ्य प्राप्त हुआ है। मेरा नाम
और रूप उन्होंने ही बनाया, मुझे उनके गुणों से ही पवित्रता प्राप्त हुई है। वैकुण्ठ में मेरा स्थान मेरे भक्तों ने ही
अटल बना दिया है। इस प्रकार मेरे भक्तों को मैं भक्ति के ही कारण वशीभूत हुआ हूँ इसलिये रात-दिन मैं उनके
साथ खड़ा रहता हूँ। जन्मरहित होते हुए मैं उनके लिये जन्म लेता हूँ, कर्मशून्य होते हुए मैं उनके ही लिये कर्म
करता हूँ। उनके ही कहने से मैं महान पापियों का नाममात्र से उद्धार करता हूँ। वाल्मीकि इस संसार में महान
पापी था लेकिन नारदजी के कहने से मैंने उसे नामजप की पवित्रता के कारण पूजनीय बना दिया। मुझ पर भक्ति
का इतना अधिकार है। भक्ति के अलावा मैं किसी के भी हाथ नहीं आता। भक्तों के उपकार से मैं बिलकुल झुक
गया हूँ क्योंकि उसके उपकार को चुकाया नहीं जा सकता। इसलिये मैं पूरी तरह उनके अधीन रहता हूँ। उनके
उपकार का बदला चुकाने के लिये मेरी गाँठ में कुछ नहीं रहता। अब जो कुछ थोड़ा-बहुत मैंने उन्हें दिया है वह
भी तुम्हें धीरे से बता देता हूँ। भक्त मेरे ही कारण सनाथ हुए हैं। मेरे ही कारण वे कृतकृत्य हुए हैं। मेरे ही
आनन्द से वे सर्वदा तृप्त हुए हैं और आत्मज्ञान से अभिभूत हो गये हैं। मेरे ही बल पर वे सारी दुनिया पर भारी
हैं। वे प्रहार किये बिना ही सृष्टि को छेद देते हैं। मेरे सामर्थ्य के कारण ही कलिकाल उनके सामने नहीं आ
सकता। मेरे ही कारण वे त्रैलोक्य में किसी की चिन्ता नहीं करते। मेरे ही कारण वे देह में विदेह की भाँति रहते
हैं। मेरे ही बल पर उन्होंने प्रलयकाल को निगल लिया है। मेरे ही बल से उन्होंने जन्म-मरण को नष्ट कर दिया
है। मेरा भजन कर वे सनातन ब्रह्मस्वरूप हो गये। लेकिन यह सब भी उन्हें मैंने नहीं दिया। वे अपने भजन
सामर्थ्य से ही वह सब मुझसे ले गये। उनके आगे मेरी कुछ भी नहीं चलती। मेरा सर्वस्व मेरे भक्त मुझसे लूट
कर ले गये हैं। उन भक्तों ने भजनसामर्थ्य से मुझ अजेय को भी जीत लिया है और मुझे अपने वश में कर लिया
है। मेरा जो आत्मपद भले ही मेरे भक्तों के हाथ में आ गया हो लेकिन उसे मेरे ही अधिकार में रख कर वे