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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 869 में से

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४१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्तिमार्ग वैसा नहीं है और उसमें विघ्नों की तो बात ही नहीं है। भक्तों को यही स्थान प्राप्त होता है। उसका भी
प्रकार सुनो। अब इस पर आप कहेंगे कि ''योग कहाँ से मोल लिया ? मूल पद का अर्थ छूट गया है और यह
व्यर्थ की बकवास है।'' क्योंकि इसी श्लोक में भगवान ने कहा है 'मासादर्वाक' (एक माह के अन्दर ही)
प्राणायाम साध्य होता है। इसमें ध्वनितार्थ से योगाभ्यास को बताया गया है। इसीलिये मैंने उसे स्पष्ट किया। जहाँ
प्राणापान पर विजय प्राप्त होती है, वहीं यह महायोग साध्य होता है। यह योग शास्त्रों में वर्णित है। इसीलिये मैंने
उसे शास्त्रीय रीति से स्पष्ट किया। अहो ! प्राणापान का निग्रह हो जाने पर, साधक की योग्यता के अनुसार सगुण
अथवा निर्गुण उपासना के योग से उसके अनुकूल पद की सहज प्राप्ति होती है। एक बार प्राणापान पर विजय
प्राप्त हो जाय और सगुणोपासना पूर्ण हो जाय तो उस योग से किस प्रकार निर्गुण की भी प्राप्ति होती है यह
श्रीकृष्ण उद्धव से बता रहे हैं। तुम्हारा ध्यान किस प्रकार का है ? यह प्रश्न उद्धव ने किया इसलिये सगुण ध्यान
का निरूपण कर तत्काल निर्गुण स्वरूप की सिद्धता करके दिखा दी। मछली पकड़ने के लिये जिस प्रकार
आमिष का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार चित्त को पकड़ कर रखने के लिये सगुण मूर्ति की योजना की जाती
है। उसी मूर्ति का सगुण स्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
हृत्पुण्डरीकमन्तः स्थमूर्ध्वनालमधोमुखम्।
ध्यात्वोर्ध्वमुखमुन्निद्रमष्टपत्रं सकर्णिकम्॥ ३६॥
केले के फूल की तरह हृदय में अष्टदलात्मक कमल होता है। उसका मुँह नीचे की ओर तथा डंठल ऊपर
की ओर होता है और वह बिलकुल कोमल होता है। इसीलिये प्राणायाम के सामर्थ्य से हृदयकमल को ऊर्ध्वमुख
कर पूर्ण एकाग्रता से ध्यान करते हुए अष्टदल कमल को विकसित करना चाहिये। वहाँ अधोभाग में मुख और
नीचे डंठल इस प्रकार हृदय कमल की स्थिति का ध्यान करने के बाद उसकी आठों पंखुड़ियाँ प्रफुल्लित हुई हैं
ऐसी धारणा बना कर मन में स्थिर करना चाहिये।
कर्णिकायां न्यसेत् सूर्यसोमाग्नीनुत्तरोत्तरम्।
वह्निमध्ये स्मरेद् रूपं ममैतद् ध्यानमङ्गलम्॥ ३७॥
फिर उसकी कर्णिका में सोलह कलाओं से युक्त चन्द्रमण्डल है ऐसी कल्पना कर उसका ध्यान करना
चाहिये और उसके भीतर बारह कलाओं से युक्त देदीप्यमान सूर्यमण्डल है ऐसी कल्पना करनी चाहिये। उसके
भी अन्दर इसे कलाओं से युक्त धधकता अग्निमण्डल है ऐसी कल्पना कर अग्निमण्डल में मेरी अत्यन्त मंगलमय
दिव्य मूर्ति है ऐसा ध्यान करना चाहिये।
समं प्रशान्तं सुमुखं दीर्घचारुचतुर्भुजम्।
सुचारुसुन्दरग्रीवं सुकपोलं शुचिस्मितम्॥ ३८॥
समानकर्णविन्यस्तस्फुरन्मकरकुण्डलम्।
हेमाम्बरं घनश्यामं श्रीवत्सश्रीनिकेतनम्॥ ३९॥
उद्धव ! अब मेरी मूर्ति का ध्यान कैसा रहना चाहिये इसे ध्यानपूर्वक सुनो। यह कहकर श्रीकृष्ण अपनी
मूर्ति का ध्यान स्वयं ही बताने लगे। न बहुत ऊँची न बहुत नाटी, सभी अवयव समान प्रमाण में, बैठक भी
समतल, सुडौल और पुष्ट शरीर इन लक्षणों से युक्त मूर्ति का चिन्तन करना चाहिये। मूर्ति हमारी तरफ मुँह करके