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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 869 में से

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पृष्ठ 424

४०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्तिमार्ग से चिपक कर रह रहे हैं। मेरी उस भक्ति की पवित्रता सुन कर तुम्हें आश्चर्य होगा लेकिन उसे बताने
में मुझे कोई सन्देह नहीं है। उस भक्ति की सच्ची महिमा सुनो। दांभिक लौकिक छोड़ कर जो शुद्ध भाव से मेरा
भजन करने लगा वह जाति से भले ही चांडाल क्यों न हो फिर भी वह मुझे अत्यन्त पूज्य है। अमंगल रीछ
अथवा वानर अथवा छाछ पीने वाले तथा जंगलों में भटकने वाले ग्वालों के लड़कों को भी मैंने पूज्य माना। जो
जाति से भले ही निम्न था किन्तु भक्तिभाव के कारण महत्त्वपूर्ण हो गया। वह मत्स्वरूप तक पहुँच गया और
त्रैलोक्य में पूज्य हो गया। 'विप्रात द्विषड्गुणयुता' इस श्लोक का सारांश यही है। जो ब्राह्मण मेरे भजनमार्ग से
विन्मुख हुआ उस ब्राह्मण की पवित्रता जल गयी समझो। उसकी अपेक्षा मेरे भजन में भजननिष्ठ होने वाला
चाण्डाल ही श्रेष्ठ है। उसका महान कविश्रेष्ठ तथा ज्ञाता भी वन्दन करते हैं। विदुर वास्तव में दासीपुत्र था।
लेकिन अपनी भक्ति के कारण वह भगवान का प्रिय बना। इसलिये परमार्थ साधने के लिये भाव ही मुख्य है।
जाति का अभिमान उपयोगी नहीं रहता। सचमुच मुझे पाने के लिये मेरी भक्ति ही श्रेष्ठ है। इसीलिये मैंने सबसे
पहले वनचरों का (वानर, रीछ आदि) उद्धार किया। पक्षियों अत्यन्त निन्द्य गिद्ध जटायु का मैंने उद्धार किया।
मैंने धर्मव्याध नामक अंत्यज का उद्धार किया। क्योंकि मेरे प्रति उसकी विशुद्ध भक्ति थी। कोई किसी भी जाति
में क्यों न उत्पन्न हुआ हो, लेकिन जिसे मेरी भावार्थपूर्ण भक्ति प्राप्त होती है वही पवित्रता की मूर्ति है यह समझ
लो। मेरे भजन से ही मेरी प्राप्ति होती है। मेरी भक्ति को छोड़ अनेक साधनों का प्रयोग करने अथवा वाद-विवाद
करने से मेरी प्राप्ति नहीं होती। यही तथ्य श्रीकृष्ण बताते हैं।
धर्मः सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।
मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि॥२२॥
मेरी भक्ति के बिना कोई भी कर्म अथवा आचरण करना केवल भ्रम है यह समझ लो। इससे मेरी प्राप्ति
का मार्ग चूक जाता है और उस धर्म का परिणाम अधर्म में होता है अथवा मेरी भक्ति के बिना सत्य भाषण करना
भी किसी जन्मांध की तरह ही है क्योंकि उसमें पग-पग पर प्रमाद होता है और वह स्वयं यह नहीं देखता कि
वह पतन की ओर जा रहा है। भक्ति के बिना दया का महत्त्व उसी प्रकार है जिस प्रकार पुरुष के बिना उसकी
सुन्दर स्त्री का जो विधवा होने के कारण धार्मिक कृत्यों से वंचित रहती है। मेरी भक्ति के बिना विद्या अविद्या ही
है यह जान लो। जिस प्रकार कौआ चन्द्रमा को नहीं पहचानता उसी प्रकार वे मेरे आत्मबोध को नहीं पहचानते।
गधा चन्दन का बोझ ढोता है लेकिन चन्दन के गंध का रहस्य वह नहीं जानता। उसी प्रकार मेरी भक्ति के बिना
विद्या और शास्त्र पढ़ना भार ढोने की तरह है। मेरी भक्ति के बिना शरीर शोषण का जो तप मनुष्य करता है वह
मानों पूर्वसंचित के अनुसार पाप ही भोगता है क्योंकि तप की वह क्रिया सत्त्वस्वरूप नहीं होती। मेरी भक्ति के
बिना किया हुआ साधन उस कीड़े की तरह है जो अपने चारों ओर खोल बनाकर उसके भीतर रहता है क्योंकि
भक्ति के बिना जो भी क्रिया की जाती है वह स्वयं के लिये ही बन्धनकारी होती है। सारांश, मेरी भक्ति के बिना
किया हुआ सभी कार्य अप्रामाणिक है। अब उसी भक्ति का शुद्ध स्वरूप भगवान बता रहे हैं।
कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना।
विनाऽऽनन्दाश्रुकलया शुध्येद् भक्त्या विनाऽऽशयः॥२३॥
स्वेच्छा से हरि की कथा श्रवण करने से अथवा नाना प्रकार के चरित्रों के बारे में सुनने से अथवा हृदय में
निरन्तर मेरे ही स्वरूप का विचार करने से चित्त में परिवर्तन होता है। इससे मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। वे मेरे