सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 415

चौदहवाँ अध्याय ३९९
का पालन करके रहना यही मोक्ष का साधन है। कुछ लोगों की विचार शैली के अनुसार व्रत, नियम आदि का
अवश्य पालन करना चाहिये। इस प्रकार अपने-अपने मतों के अनुसार प्रयास कर लोग अनेक प्रकार के साधनों
का महत्त्व प्रतिपादित करते रहते हैं। लेकिन इन सभी प्रकार के साधनों का विचार करने पर ज्ञात होता है कि ये
सब नाशवान हैं। यही बात कृपामूर्ति श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिताः।
दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठाः क्षुद्रानन्दाः शुचार्पिताः ॥ ११॥
फल की आशा और देह का अभिमान त्याग कर जो अपने साधन मुझे अर्पण नहीं करते, उनके साधनों का
फल दुःखस्वरूप होता है यह स्मरण रखो। वे बार-बार जन्म-मरण देते हैं। उन साधनों को जो साध्य करते हैं वे
सब नाशवान और क्षणिक होते हैं। उस लोक का जो सुख होता है वह शक्कर में मिले हुए विष की तरह होता
है। उसमें मिठास रहती है किन्तु उसमें मृत्यु अटल रहती है। उसके अनुसार उस लोक का आनन्द भी क्षुद्र और
शोक का कारण होता है। जो अपने ही कर्म से मलिन हो गये उन्हें सुख किस बात का होगा ? उसमें निरन्तर
बढ़ता जाने वालो दुःख ही रहता है और अद्यतम नरक की प्राप्ति ही उसका अन्तिम परिणाम होता है। जो मन
भोगों के प्रति आसक्त होता है उसे सदा विषयों की ही चिन्ता लगी रहती है। उन विषयों की आसक्ति के कारण
ही तमोगुण की वृद्धि होकर वह अधःपतन की ओर जाता है। लेकिन इन्हीं साधनों से जो प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति
करेगा, उस भक्ति का स्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
मय्यर्पितात्मनः सभ्य निरपेक्षस्य सर्वतः।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत् कुतःस्याद् विषयात्मनाम् ॥ १२ ॥
भक्ति से प्राप्त होने वाले आत्मसुख का महत्त्व बताने के लिये ही भगवान ने उद्धव को सम्बोधित करते हुए
कहा, "उद्धव ! भक्तिसुख का पात्र होने वाले भाग्यवान सचमुच तुम ही हो। इसे भक्तिसुख का भाग्य प्राप्त हुआ है
इसलिये इसे 'सभ्य' कहना उचित है ऐसा भगवान के मन में आया और 'हे सभ्या!' जैसा सम्मानसूचक सम्बोधन
देकर भगवान भक्ति सुख का वर्णन करने लगे। मेरे स्वरूप को प्राप्त करने के लिये इहलोक की भोगासक्ति से वैसे
ही दूर करना होगा जिस प्रकार रजस्वला स्त्री पति को स्पर्श नहीं करती और उससे दूर रहती है। मेरा ही अनुसंधान
साध्य कर लेने से उसकी वासना परलोक का स्पर्श ही नहीं करती। वह ब्रह्मलोक का भी धिःकार करती है फिर
औरों की क्या बात है ? ऐसी निरपेक्षता से मेरा भजन करते-करते जब अंतःकरण में प्रेम उत्पन्न होने लगता है तो मैं
उनमें अपने आप ही आत्मस्वरूप में प्रकट हो जाता हूँ। वास्तव में यहाँ 'मैं प्रकट होता हूँ' यह कहना भी व्यर्थ है
क्योंकि मैं सदा हृदय में ही वास करता रहता हूँ। जब चित्तवृत्ति निर्विकल्प हो जाती है तभी मैं दिखायी देता हूँ।
बादल दूर हटते ही उसके पीछे छिपा हुआ सूर्य भी दिखायी देने लगता है उसी प्रकार विषयावस्था दूर होते ही मैं भी
प्रकट हो जाता हूँ। उसी प्रकार भक्तों के भावार्थ तथा भक्ति सामर्थ्य से जब मैं प्रकट होता हूँ तो भक्त के मन में
विषय की बात ही नहीं आती। विषयावस्था छोड़कर जब चित्त मत्स्वरूप की ओर लग जाता है तो भक्तों को अपने
आप ही मत्स्वरूप प्राप्त होता है। लौह का स्पर्श पारस से भले ही एक ओर से ही हो लेकिन पूरा लौह सुवर्ण बन
जाता है। उसी प्रकार जब मेरे भक्त मेरे ही ध्यान में लीन हो जाते हैं तो उनका सर्वांग ही ज्ञानमय हो जाता है। उस
समय भक्तों को जो सहज सुख प्राप्त होता है उसे नापने का क्या मापदण्ड हो सकता है ? जिस आत्मसुख की प्राप्ति
के लिये शंकर ने श्मशान में रहना स्वीकार कर लिया वह सुख ब्रह्मदेव को कैसे प्राप्त होगा ? इसीलिये उसे मैंने