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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 869 में से

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पृष्ठ 433

चौदहवाँ अध्याय ४१७
खड़ी है ऐसा ध्यान करना चाहिये। उस मूर्ति का मुखकमल प्रसन्न और अत्यन्त रमणीय होना चाहिये। वह इस
प्रकार हो कि मूर्ति का मुँह देखते ही हृदय में आनन्द भर जाय। कमल की विशाल पंखुड़ियों की तरह कान तक
पहुँचने वाले विशाल नेत्र हों। काजल से रेखांकित काली और धनुष्याकृति भौंहें हों। साँवले ललाट पर पीला
चन्दन हो और उस पर कस्तूरी के दो टीके हों तथा उस पर कुकुमांकित अक्षत लगी हों। नाक और ललाट भव्य
होना चाहिये। ललाट के दोनों ओर की ऊँचाइयाँ तेजःपुंज हो। मुँह नाजुक तथा कोमल हो और होंठ मूँगे के
समान लाल हों और द्वितीया के चन्द्रमा की कला की तरह अत्यन्त सुन्दर ठुड्डी हो। भक्त चकोर को जैसे
चन्द्रमा होता है वैसा ही मनोहर और सुकुमार मुख हो। मुख में हीरे के समान तेजस्वी अथवा अनार के दाने जैसे
तेजयुक्त दंतपंक्ति हो। दोनों ओर समान और सुन्दर कान हों और उसमें मत्स्याकृति कुण्डल लटकते हों। गालों में
मनोहर हास्य खिलता हो और कण्ठ की आकृति शंख जैसी हो। गले में तीस लड़वाली कंठी हो और उसमें
कौस्तुभमणि शोभायमान हो। उसके तेज के प्रकाश का वर्णन कौन कर सकता है? उस तेज के सामने सूर्य भी
फीका लगेगा। स्वाभाविक रूप से ही भुजंग जैसे दीखने वाले अजानबाहु चार हाथ, विशाल वक्षःस्थल हो और
उस पर श्रीवत्स का चिह्न हो। हृदय पर दोनों ओर श्रीवत्स और श्रीनिकेतन; उदर गहरा हो और उस पर तीन
पंक्तियाँ हों, दामोदर चिह्न उसमें प्रकट हो रहा हो। बिजली की चमक जैसा चमकीला, सुवर्ण की आभावाला
पीला पीताम्बर परिधान की हुई घनश्याम की सुशोभित मूर्ति! जिस प्रकार आकाश में चाँदनी छिटकने पर नीले
रंग पर शुभ्र वर्ण की आभा चमकती है उसी प्रकार श्यामवर्ण अंग पर शुभ्र चन्दन का उबटन होने से श्रीहरि की
शोभा अप्रतिम दिखाई देती है।
शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम् ।
नूपुरैर्विलसत्पादं कौस्तुभप्रभया युतम्॥४०॥
द्युमत्किरीटकटककटिसूत्राङ्गदायुतम् ।
सर्वाङ्गसुन्दरं हृद्यं प्रसादसुमुखेक्षणम्॥४१॥
कौस्तुभमणि से युक्त कंठ, पैरों तक लटकने वाली वनमाला कमर में परिधान की हुई रत्नों से जड़ित
मेखला और उसमें लगे हुए झुनझुन करने वाले घुँघरू। कर में कंकण और बाहुओं में अंगद, शंख, चक्र, पद्म,
गदा आदि आयुध हों और उँगलियों में नाना प्रकार की रत्नजड़ित मुद्रिकाएँ हों। गहरी और निर्मल नाभि जिसमें
से बालक ब्रह्मा का जन्म हुआ और जो त्रैलोक्यरूपी कमल का भी मूल स्थान है, वह श्रीहरि का नाभिकमल है।
उसके सुडौल, सुन्दर तथा स्वयंभू चरण मणिरत्नों के खम्भों की तरह शोभा दे रहे हैं। हरि के शरीर में वे चरण
अत्यन्त शोभा प्रदान करते हैं और उस श्रीहरि के चरणों पर ध्वज, वज्र, अंकुरा, यवांकित ऊर्ध्व रेखा, पद्म, चक्र
आदि शुभ चिह्न होने के कारण वे अत्यन्त सुन्दर दिखायी देते हैं। इंद्रनील मणि कांति का त्रिकोण बना हो, इस
प्रकार मनोहर, पारदर्शी, श्यामवर्ण और कोमल सुकुमार तलुवों की आरक्त आभा है। तलुवों के नीचे आरक्त
आभा और पैरों के ऊपर साँवली छटा है जिससे संध्या में नीले आकाश पर लाल छटा का आभास होता है।
नभोमण्डल में चन्द्र की रेखा सुशोभित हो रही हो, इस प्रकार उँगलियों के सिरे पर नख शोभा दे रहे हैं।
पिण्डलियाँ भी उसी प्रकार कोमल तथा मनोरम और जंघायें भी अत्यन्त सुन्दर हैं। सिंहों को अपनी कमर पर गर्व
था किन्तु श्रीहरि की कमर देखते ही वे जंगल में भाग गये। अभी भी वे जंगल में ही निवास कर रहे हैं।
लज्जावश वे किसी को मुँह नहीं दिखाते और श्रीहरि की कमर देखने को मिल सके इसलिये वे मेखला पर चित्र