श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ४०३
पड़ा हुआ और उसे अपना कहने वाला कोई न हो उसे भी यदि कोई अपने हाथ से उठाता है तो उससे
निरिच्छता नष्ट होती है। इच्छाशून्य स्थिति का नाम ही निरपेक्षता है। अब उस समय जो मननशीलता प्राप्त
होती है, उसे यथार्थ रूप से बताता हूँ। वेदशास्त्रार्थ ने मेरे जिस स्वरूप को प्रामाणिक माना है वह मेरा
अत्यन्त शुद्ध स्वरूप है, यह जान लो। उस स्वरूप के प्रति धारणा रखना इसी को मनन कहते हैं। उस स्वरूप
का विचार करते-करते मन ही स्वस्वरूपाकार हो जाता है। अर्थात् बिना धारणा के ही मनन होता है और
बिना किये ही स्मरण होता है। इसी का नाम है सच्ची मननशील स्थिति। इसे पूर्णरूप से सच मान लो। अब
इसके आगे शान्ति का स्वरूप बताता हूँ। सुनो। काम, क्रोध और लोभ का समूल उन्मूलन हुए बिना ही देह में
जो स्थिरता उत्पन्न होती है, वह यहाँ शान्ति नहीं हो सकती। मन में मत्स्य पर लक्ष स्थिर कर बगुला ध्यानस्थ
होकर बैठता है लेकिन उसके अंतःकरण में लोभ होने के कारण उसे शान्ति कौन कहेगा ? देह को देह का
भी भान न रहना, काम, क्रोध और लोभ का विलय हो जाना, ऐसी शान्ति किसी भाग्यवान को ही प्राप्त होती
है। इसी का नाम है, मुख्य शान्ति। हे उद्धव! मैं भी ऐसी ही शान्ति को मानता हूँ। अब इसके बाद तुम्हें
समता का रूप बताता हूँ, सुनो। समस्त प्राणि विविध प्रकार के हैं और उनके नाम भी अलग-अलग हैं। यह
सारा संसार ही विचित्र आकारों के कारण विषम बना हुआ है। लेकिन उन सब में परब्रह्म समान रूप से भरा
हुआ है। उठा-पटक में श्रम न कर, बिना तोड़-फोड़ किये, मेरे भक्तों को भक्ति के योग से ही सर्वत्र समानता
दिखायी देती है। मेरी भक्ति से समानता प्राप्त होते ही प्राणियों में भेद बुद्धि ही नष्ट हो जाती है। वह सहज
ही भेदभाव रहित हो जाता है। उसे सहज ही निर्वैरता प्राप्त होती है। जब तक द्वैत का भान रहता है, तभी
तक विरोध के लिये कोई कारण होता है। जब सर्वत्र एक ही व्याप्त है तो फिर बैरी कौन होगा? क्या कभी
आकाश आकाश से झगड़ा कर सकता है? या चन्द्र चन्द्र से ही लड़े? या वायु वायु को ही रोकेगा? या जीभ
ही जीभ के दो टुकड़े करेगी? भेद नष्ट होने का ही अर्थ है बैररहित होना। निरपेक्षता और मेरा मनन, शान्ति
और समदृष्टि तथा बैर रहित होना ये पाँच लक्षण मुख्य हैं। इन पाँच लक्षणों में से एक निरपेक्षता भी हाथ
लग जाय तो सायुज्यता मुक्ति पैर छूती है और ब्रह्मस्वरूप मन में स्थिर हो जाता है। निरपेक्ष मनुष्य का मन
स्थिर रहता है। जो निरपेक्ष है वह बैररहित है इसे समझ लो। जो निरपेक्ष है वही परिपूर्ण शान्त रहता है।
इसलिये मैं भी निरपेक्ष की ही सेवा करता हूँ। गिरि-कन्दराओं में गये बिना, विकट साधन सहन किये बिना
यदि ये पाँच साधन हाथ में आ जाएँ तो उनसे ही विश्व का उद्धार होगा। ऐसे भक्तों का दर्शन होने से लोग
तर जायेंगे इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। उनका केवल नामस्मरण करने से ही जड़ जीवों का उद्धार होगा। ये
पाँच लक्षण प्राप्त होने पर मेरे भक्तों को मुझसे भी अधिक पवित्रता प्राप्त होती है। मैं भी उनकी चरणधूलि
का वन्दन करता हूँ। समुद्र का पानी जब मेघ बनता है तभी उसमें माधुर्य आता है और वह सारे संसार को
शीतल करता है और अकाल का संकट दूर करता है। वही जल यदि समुद्र में रह जाय तो उसका कोई
उपयोग नहीं होता। उसी प्रकार मेरे भक्तों को मुझसे भी अधिक पवित्रता प्राप्त होती है। यदि केले का पेड़
खाने लगे तो उसमें कोई स्वाद नहीं होता लेकिन उसके केले अत्यन्त सुस्वादु होते हैं। उसी प्रकार मुझसे भी
अधिक मेरे भक्तों में पवित्रता बढ़ जाती है। मुझमें जो पवित्रता आयी है वह मेरे भक्तों के कारण ही है।
इसीलिये मैं अपने भक्तों के पीछे-पीछे उनके चरणों की धूल का वन्दन करने के लिये दौड़ता रहता हूँ। मेरे
चरणों का तीर्थ साक्षात शंकर भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं। सारांश मेरे भक्तों का जो सुख है वह सुख
की दृष्टि से अलौकिक है। वह सुख और कोई नहीं जानता और उसका वर्णन करने में वाणी भी असमर्थ है।