श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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अथक साधनों के बाद भी उसका आकलन नहीं होता। मेरी भक्ति की थाह स्वयं मुझे भी नहीं लग पाती।
इसीलिये मैं भक्तों का आज्ञाधारक बन कर रहता हूँ। उनके शब्दों का जरा भी उल्लंघन नहीं करता। भक्तों की
महिमा अगाध है इसलिये मैं भी उनकी सेवा करता हूँ। भक्त ने मारी हुई लात मैंने अपने हृदय पर धारण की।
भक्तों के चरणों की धूलि मैं माथे पर लगाता हूँ। भक्त कहलाना बहुत अच्छा लगता है लेकिन भजन का स्वरूप
अत्यन्त विकट है। भक्ति का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है। श्रुति शास्त्रों के भी वह ठीक से समझ में नहीं आता। कंजूस
व्यक्ति कितनी ही दूर क्यों न जाये लेकिन घर में रखी हुई निधि को वह अपने मन में सुरक्षित रखता है। उसी
प्रकार वह सदा सर्वदा मेरी प्रीति अपने अंतःकरण में सुरक्षित रखता है या बहुत दिन के बाद जब किसी स्त्री को
गर्भ रह जाता है तो वह सुन्दरी जिस प्रकार आनन्दपूर्वक उसका पालन पोषण करती है उसी प्रकार जब हृदय में
मेरे प्रति प्रेम जगता है अथवा बाँझ स्त्री जब गर्भवती होती है उसी प्रकार उसके मन में मेरे प्रेम का उत्सव मनाने
की इच्छा होती है और अंतःकरण से प्रेमविह्वल होकर पहले से भी अधिक उत्कर्ष से उल्हास बढ़ता जाता है।
अथवा भाग्यवान जामाता घर आने पर जिस प्रकार सास उसका स्वागत करने में किसी बात की कमी नहीं रहने
देती, अथवा बीज जितनी अधिक पैदावार देता है उतना ही किसान का उल्हास बढ़ता है, अथवा गुणवान, सुन्दर
और श्रीमान पति के घर से जाने पर उसकी पत्नी उसके लिये छटपटाती है, उसी प्रकार मेरे लिये उसके मन में
बेचैनी बढ़ने लगती है। उद्धव ! इसी का नाम है मेरे प्रति सच्ची भक्ति। जिस भक्ति के भुलावे में मैं लक्ष्मीकांत
भक्तों के हाथ में हूँ। मेरे लिये चाह बढ़ने से प्रीति उत्पन्न होती है। उद्धव को सीने से लगाकर भगवान उससे
बताने लगे कि जिसके पास मैं सदा रहता हूँ वह मेरी भक्ति ऐसी रहती है। संसार सागर को पार करने के लिये
भक्ति यही एक प्रमुख साधन है। मोक्ष भी उसके चरणों पर लोटता है फिर अन्य साधनों की क्या बिसात है?
देखो! पूरे त्रिलोक में मैं अविजीत हूँ। लेकिन भक्तों के सामर्थ्य ने मुझे जीत कर भक्ति के बल पर मुझे अपना
सेवक बना लिया है। इसीलिये सभी विजयों में श्रेष्ठ एक मेरी भक्ति ही है। उसकी भी कथा सुनो। तुम्हें
विस्तारपूर्वक बताता हूँ।
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ २० ॥
नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका ज्ञान देने वाला सांख्यशास्त्र अथवा नित्य-नैमित्तिक कर्म अपना
सर्व अष्टांगिक योग भी मेरी प्राप्ति कराने में समर्थ नहीं है अथवा जिसे 'स्वाध्याय' कहते हैं वह वेदाध्ययन
अथवा वायु, जल तथा पके हुए पत्ते खाकर किया जाने वाला तप अथवा संन्यास ग्रहण आदि त्याग ये सब मेरी
भक्ति के बिना दुर्बल हैं। जिस प्रकार बिना नाक का सौन्दर्य अथवा मस्तक बिना सारे अवयव अथवा पति बिना
सुहागन ये सब जिस प्रकार व्यर्थ हैं उसी प्रकार मेरी भक्ति के बिना सभी साधन दुर्बल हैं। उन सब में मुझ तक
पहुँचने का सामर्थ्य नहीं है। लेकिन मेरी भक्ति वैसी नहीं है। वह मेरे प्रेम की अधिकाधिक वृद्धि कर तत्काल
मेरी प्राप्ति कराती है। अन्य किसी के अधीन नहीं होती। जिस समय मेरी भक्ति उत्पन्न होती है तभी मेरी प्राप्ति
होती है। यह बात श्रीकृष्ण उद्धव को बार-बार, प्रसन्नतापूर्वक बताने लगे। हे उद्धव! जिस प्रकार रत्न के साथ
उसका तेज होता है, अरुण के साथ जैसे सूर्य होता है उसी प्रकार भक्ति के पास मैं लक्ष्मीपति खड़ा रहता हूँ। वह
भक्ति जिसके मन में लग गयी उसी समय मैं उसके हाथ लग जाता हूँ। अन्य कितने ही साधन कोई क्यों न प्राप्त
कर ले लेकिन भक्ति के बिना मैं नहीं प्राप्त हो सकता।