श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय ४०१
के साथ समुद्र से घिरी हुई सारी पृथ्वी का साम्राज्य स्वयं ही सामने आ जाय तो मेरे भक्त उस पर थूकते हैं। नरक
में पड़े हुए चने सुअर को भले ही अच्छे लगें लेकिन बुद्धिमानों को उसे देखकर घिन लगती है। उसी प्रकार मेरे
भक्तों ने सार्वभौम राज्य का भी त्याग किया रहता है। रसातल आदि सभी पातालों में अमृतादिक सभी भोग प्राप्त
होने पर भी मेरे भक्त उन पर लात मारते हैं। मुँह में रखे हुए अमृतफल को फेंक कर कोई बुद्धिमान पुरुष घास
का गोला नहीं खायेगा। उसी प्रकार मेरा सौख्यलाभ छोड़कर मेरे भक्त रसातलादिक सुख भोगों की ओर नहीं
जाते। जहाँ देवतागण, महान पुरुष तथा नाग भी वन्दन करते हैं वह श्रेष्ठ अमरावती प्राप्त होने के बाद मेरे भक्त
उसका उसी प्रकार त्याग करते हैं जिस प्रकार लोग कस्तूरी मिलने पर मिट्टी फेंक देते हैं अथवा मेरी भक्ति से
सुखसम्पन्न होने वाले मेरे भक्तगण इन्द्रादिक देवताओं को वंद्य ब्रह्मलोक को भी तुच्छ मानते हैं। मट्ठा और दूध
आँखों को सफेद ही दिखायी देता है लेकिन ज्ञाता दूध ही होठों से लगाते हैं और मट्ठा रख देते हैं। उसी प्रकार
जो मूर्ख हैं वही सत्यलोक और भक्ति के सुख को एक समान कहेंगे। लेकिन मेरे जो भक्त भक्ति से शुद्ध रहते हैं
वे सत्यलोक का धिःकार ही करते हैं अथवा इन्द्र पद, ब्रह्मलोक, पाताललोक के ऐष आराम, अमृतपान ये सब
एक साथ प्राप्त कराने के लिये सारी सिद्धियाँ तैयार हो जाएँ या जिन महासिद्धियों को प्राप्त करने में योगी सारी
विधियाँ करके थक जाते हैं वे भी यदि सामने खड़ी हो जाएँ तो भी सद्बुद्धिवाले भक्त उनका स्पर्श नहीं करते।
उद्धव! मेरे भक्त उन अणिमादिक सिद्धियों पर लात मार कर मेरे भक्तिमार्ग पर लग गये हैं। इन सिद्धियों की कथा
का क्या वर्णन करें? किन्तु सलोकता, निकटता अथवा मेरा स्वरूप देने वाली सायुज्यता भी यदि उन्हें दी जाय तो
भी मेरे भक्त सलोकातादि मुक्ति कभी ग्रहण नहीं करते। जिसके आगे काल की सत्ता भी नहीं चलती, जिसमें
जन्म-मरण के फेरे नहीं होते, वह सायुज्यता मुक्ति भी मेरे भक्त स्वीकार नहीं करते। पहले अलगाव स्वीकारे और
फिर सायुज्यमुक्ति से एक हो जायें यही बात असंगत है। इसलिये मेरे भक्त सायुज्य मुक्ति कभी स्वीकार नहीं
करते। भक्ति के सुख से ही उनकी वृत्ति प्रसन्न रहती है इसलिये उन्हें मेरी भक्ति ही अच्छी लगती है। चारों
मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़े, फिर भी मेरे भक्त उन्हें स्वीकार नहीं करते। लोकों में नहीं समाते। मेरे सिवा चारों
मुक्तियों से जो सुख प्राप्त होता है उसे मेरे भक्त कभी ग्रहण नहीं करते क्योंकि वे मेरी अभेद भक्ति से सराबोर
रहते हैं। मेरे सिवा जो भी कोई सुख रहता है उसे वे तुच्छ समझ कर छोड़ देते हैं। मेरे भक्तों को मेरे भजन में ही
अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है। अब शायद तुम यह सोचोगे कि भक्त निरे पागल हैं, उन्हें तुम्हारे भजनों में ही
आनन्द प्राप्त होता है। परन्तु तुम्हें उनके प्रति चाह या गहरी प्रीति नहीं होगी। किलनी को भैंस अच्छी लगती है
लेकिन भैंस किलनी को नहीं चाहती, उसी प्रकार भक्तों को तुमसे प्रेम हो लेकिन तुम्हें उनसे प्रेम न हो। भव्य,
भजन और भजनेवाला यह त्रिकुट ही मूलतः अविद्या से उत्पन्न है अर्थात् मिथ्या है अतः ऐसे अविद्यायुक्त
भजनमार्ग में तुम्हें रुचि न हो। जिस प्रकार स्वप्न मिले निमंत्रण पर कोई जागृत होने पर भोजन करने नहीं जाता
उसी प्रकार अविद्यायुक्त मिथ्या भजन से तुम प्रेम करो यह संभव नहीं है। इस शंका का सारांश जानकर भगवान
कहते हैं कि यदि भजन में भक्त की भक्ति शुद्ध हो तो वहाँ मुझे भी अत्यन्त प्रेम रहता है। मुझसे जो जैसा
व्यवहार करता है, उससे मैं भी वैसा ही व्यवहार करता हूँ। भक्त को मेरे प्रति अनन्य भक्ति रहती है इसलिये मैं
भी उस पर अनन्य भक्ति रखता हूँ।
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ॥ १५॥
मेरे भक्तों का मुझ पर कितना प्रेम है यह मैं श्रीकृष्ण ही जानता हूँ। उस प्रीति की उपमा देने के लिये