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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 869 में से

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पृष्ठ 414

३९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार हमारी प्रकृति अनेक प्रकार के मतों से पुष्ट हुई है यह ध्यान में रखो। वह मतवाद पूर्णतयः ठीक
है यह बात जब मन में धँस जाती है तो वही चित्त में घर कर जाती है। स्वप्न मिथ्या रहता है फिर भी सोये हुए
मनुष्य को वही सच मालूम होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न मतों की बातों को वे सच ही मान लेते हैं। यह
वेदवेत्ताओं की बात हुई। किन्तु जिनका वेदों पर अधिकार नहीं है उन्हें उपदेश परम्परा से चले आ रहे भिन्न-भिन्न
मत ही सच मालूम होते हैं। किसी की विचारशैली वेदों के विरुद्ध रहती है। वे अपने मत के अनुसार पाखण्ड
मत की ही स्थापना करते हैं और वही शिष्यों के मन में भर देते हैं।
मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ।
श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि॥ ९॥
उद्धव! विभिन्न प्रकार की वासनाएँ गुणों के अनुसार बनी रहती हैं। इससे पुरुषों की प्रकृति भी भिन्न-भिन्न
हो जाती है। लेकिन इन सबको उत्पन्न करने के पीछे मेरी माया ही है यह निश्चित रूप से जान लो। मेरी ही
माया से श्रेष्ठ लोग भी मोहित हुए हैं, लोगों का विवेक नष्ट हुआ है और उन्हें मोक्षमार्ग का विस्मरण होकर वे
विषय लंपटता की ओर उन्मुख हुए हैं। हे पुरुषश्रेष्ठ उद्धव! सुनो। इस प्रकार लोगों की निष्ठा भ्रष्ट हो जाने के
कारण मोक्ष का द्वार चूक जाता है और वे गलत साधकों के प्रयासों की बात करते रहते हैं। वे अनेक प्रकार के
साधनों की चतुराई जो अपने-अपने मतवाद का प्रतिपादन करती हैं उनका उल्लेख भी श्रीकृष्ण डेढ़ श्लोकों में
करते हैं।
धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम्।
अन्ये वदन्ति स्वार्थं वा ऐश्वर्यं त्यागभोजनम्।
केचिद्यज्ञतपोदानं व्रतानि नियमान् यमान्॥ १०॥
अब इस सम्बन्ध में मीमांसकों का मत है कि काम्यकर्म को निषिद्ध मान कर उसे हटा कर शेष कर्म मुख्य
साधन हैं जिनसे मोक्ष प्राप्त होता है। काव्य, नाटक तथा अलंकार शास्त्र के रचयिता कवित्त्व को ही प्रमुख साधन
मानते हैं। विभिन्न प्रकार की कविताएँ, पद्य और उनकी रचना पद्धति से प्राप्त कीर्ति से ही मोक्ष प्राप्त होता है
ऐसा उनका मानना है। महान कवियों का मत है कि हमारी काव्यकीर्ति के कारण ही हमें सहज ही मोक्ष प्राप्त
होगा। श्रेष्ठ कवियों में इस प्रकार का पागलपन होता है। वात्स्यायन आदि कामशास्त्रियों का अभिप्राय इसके
विपरीत दिखायी देता है। काम के सुखोपभोग से मोक्ष प्राप्त होगा ऐसा उनका मानना है, इसलिये वे सदा
कामसेवन करने के लिये कहते हैं। सांख्य योग के मतावलम्बियों का कहना है कि सत्य, शम, दम आदि जो
सम्पत्ति है, वही मोक्ष का साधन है। उनका यही निश्चय है। नीतिशास्त्रियों के अनुसार सार्वभौम राज्य प्राप्त हो
जाय तो वही मोक्ष है। उसमें साम, दान आदि साधन हैं। किसी का मत है कि चुटिया और यज्ञोपवीत का त्याग
करने मात्र से ही मोक्ष का मार्ग प्राप्त हो जाता है। वे उसी मार्ग को अत्यन्त उत्तम समझते हैं। जो देहात्मवादी हैं
उनका योगमार्ग यही है कि इच्छा के अनुसार मिलने वाले भोगों को भोगना चाहिये। कैसा स्वर्ग और कैसा नर्क !
मरने के बाद कौन जन्म लेता है? किसी के लिये अश्वमेध, राजसूय यज्ञ यही मोक्षमार्ग होता है। मूर्ति की
यथाविधि उपासना करना, उसकी विधिपूर्वक पूजा करना इसी को कुछ लोग मोक्षमार्ग का साधन समझते हैं।
कुछ लोगों का मत है अनेक प्रकार के कष्ट सह कर शरीर का शोषण कर तप करना, यही मोक्ष का सबसे सरल
मार्ग है। कुछ लोग कहते हैं कि दान करना यही मोक्ष प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन है। याज्ञिकों के अनुसार व्रतों