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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

३७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जागृति में स्वप्न नहीं होता इसलिये स्वप्न जागृति को नहीं जानता इसे स्मरण रखो। सुषुप्ति जागृति और स्वप्न
इन दोनों को नहीं जानती इसलिये उन दोनों को सुषुप्ति का ज्ञान नहीं होता। यदि जीव को अवस्थाओं का
अभिमानी कहें तो जीव के साथ यह भी नहीं घटता। विश्व, तैजस और प्राज्ञ ये तीनों तीन अवस्थाओं के
अभिमानी हैं। जो जिस अवस्था का अभिमानी होता है वह उस अवस्था के साथ तद्रूप हो जाता है। लेकिन
'जीव' तीनों अवस्थाओं का साक्षी होकर साक्षित्व के कारण स्वतंत्र रहता है अतः वह अवस्थाभिमानी नहीं है।
यहाँ 'जीव' वह है जो देह से स्वतंत्र, गुणों से निराला तीनों अवस्थाओं से अलग, केवल द्रष्टा, साक्षी और
सचमुच जो जानता है। जीव को यदि अवस्थाभिमानी न कहें तो फिर तीनों अवस्थाएँ कौन भोगता है ? मैं सोया,
मैंने जिया, मैंने स्वप्नावस्था देखी यह प्रत्यक्ष अनुभव स्वयं जीव ही करता है। यदि इसे जीव का स्वभाव ही कहें
तो उसका अभिप्राय बताता हूँ।
अहंकारकृतं बन्धमात्मनोऽर्थविपर्ययम्।
विद्वान् निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेद् ॥ २८ ॥
जो आराम से झूले पर बैठा रहता है वह स्वयं हिले बिना भी उस झूले के हिलने से आनन्द से झूलता
रहता है और अपनी इच्छा से झूले के साथ हिलता रहता है। वह जब जोर-जोर से झूलता रहता है उस समय
वास्तव में झूला ही हिलता रहता है और बैठने वाला अपने स्थान पर स्थिर रहता है। जीव की वैसी ही स्थिति
है। जिस प्रकार वह स्वप्न का घर, स्त्रियाँ आदि को अपना ही मानता है उसी प्रकार अहंममता के अभिमान के
कारण वह तीनों अवस्थाएँ मैं ही भोग रहा हूँ यह मानता है। लोहे का काम करते समय, अग्नि के साथ तादात्म्य
होने के कारण लोहे पर किये हुए प्रहार अग्नि पर किये गये मालूम होते हैं। अग्नि की संगतिसे ही लोहे का काम
पूर्ण होता है या पूर्ण नहीं होता लेकिन अग्नि न बनता है न बिगड़ता है। इसी प्रकार जीव भी यहीं रहता है। जिस
प्रकार अग्नि के बिना लोहे का सामान नहीं बनता उसी प्रकार आत्मा के संयोग के बिना बुद्धि जड़ है। आत्मा के
बिना वह कभी भी कोई भी क्रिया नहीं कर सकती। लोहे की सलाख बनाकर भी अग्नि उसका निर्माण कर्त्ता
नहीं होती। उसी प्रकार कर्म करवा कर भी जीव अकर्त्ता ही होता है। फिर भी वृत्ति के साथ तादात्म्य होने के
कारण वह 'कर्त्ता मैं हूँ' यही मानता है। जीव ने अपने प्रकाश से वृत्ति को प्रकाशित किया है और यह वृत्ति ही
जीव को अपने स्वभाव के अनुसार विविध अवस्थाएँ देती रहती हैं। सूर्य के कारण ही जल प्रकाशित होता है,
उस जल ने ही सूर्य का प्रतिबिम्ब निर्मित किया है और उस पानी के कलकल निनाद की तरह अथवा चंचलता
के अनुसार या स्थिरता के अनुसार सूर्य का प्रतिबिम्ब पानी के कम्पन्न के अनुसार थरथर काँपता है अथवा स्थिर
रहता है। सूर्य का निवास ऊपर आकाश में है, पानी उसे नीचे ले आता है। उसी प्रकार वृत्ति भी अपने
नामलौकिक के अनुसार मुक्तों को भी बन्धन में डालती है। आत्मा से वृत्ति प्रकाशित होती है लेकिन उसी वृत्ति
के कारण आत्मा में जीवभाव आता है, उस जीवभाव के कारण जीव में देह की ममता उत्पन्न होती है और इसी
कारण वह प्राप्त सुख-दुःख का उपभोग करता है। सारांश, वृत्ति की संगत से ही विषयों की आसक्ति बढ़ती है
और वास्तव में इसी कारण से जीव को संसार बन्धन प्राप्त होता है। इस प्रकार गुण और चित्त की विषयासक्ति से
जीव को भले ही बन्धन प्राप्त हो जाय, फिर भी वैराग्य भाव से तथा गुरु की कृपा से विषयवृत्ति को नियंत्रित
करना चाहिये। अब गुरुकृपा की बात सुनो। मैं जो निरन्तर तीनों अवस्थाओं में ज्ञानस्वरूप तथा गुणों से अलिप्त
हूँ, उसे गुरुकृपा आत्मज्ञान के योग से अभ्यास की ओर प्रवृत्त करती है। अभ्यास की बात तो विचित्र ही है। वह

तेरहवाँ अध्याय ३७९
आत्मज्ञान से, उपदेश के रूप में विषयवृत्ति के आगे-पीछे अपना ज्ञानस्वरूप दृष्टि को दिखलाता रहता है। मैं तो
सदा ज्ञानस्वरूप ही हूँ। मैं सब में सर्वत्र हूँ। इसलिये गुरु, शिष्य को मुझ में आत्महित ही दिखलाता है। अरे!
साड़ी को सूत से अलग करने का प्रयत्न करने पर वह कृति ही नष्ट हो जाती है क्योंकि उसमें भीतर-बाहर सूत
ही रहता है। उसी प्रकार साधकों में विषयों का जो भान रहता है वह भी मेरे स्वरूप से भिन्न नहीं है क्योंकि सारे
ज्ञान का स्वरूप मैं ही हूँ। उसमें नाम, रूप, वर्ण आदि का भेद नहीं है अथवा कर्म, कर्त्ता अथवा कर्म सम्बन्धी
विवाद भी नहीं है। ॐकार के साथ सारे वेद जिसमें डूबे, ऐसा शुद्ध केवल एक मैं ही हूँ। जहाँ से भ्रम के साथ
भ्रान्ति का पलायन हो गया, क्रिया के साथ प्रवृत्ति टूट कर गिर पड़ी, निवृत्ति तो लज्जा से ही अदृश्य हो गयी और
वृत्ति स्वस्वरूप में एकरूप होकर रह गयी। सूर्य उदय होने पर वह अन्धकार को पूर्णरूप से निगल लेता है, जुगनूँ
को तो मार ही डालता है और नक्षत्रों को तत्काल नष्ट कर देता है। उसी प्रकार मेरे स्वरूप की प्रवृत्ति और
निवृत्ति लज्जा से नष्ट हो जाती हैं और आत्मानन्द से नित्य तृप्ति रहती है। मेरे इस स्वरूप का आनन्द जब
साधकों को प्राप्त हो जाता है, तो चित्त भी विषयों का त्याग करता है और विषय भी चित्त को छोड़ देता है। जो
फल डाल पर पकते हैं वे पकने के समय डाल से अलग हो जाते हैं। डाल भी उस फल को नहीं रखती। दही
मथ कर निकाले हुए मक्खन को यदि पुनः मट्ठे में डाल दिया जाय तो वह मट्ठे से अलग ही रहता है। उसी
प्रकार चित्त भी विषयों से अलग रहता है। मेरा स्वरूप प्राप्त हो जाने पर यदि दैव जबर्दस्ती उसे विषयोपभोग देने
लगे तो भी उसके चित्त में विषयवासना उत्पन्न नहीं होती क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से अलग ही रहता है। इस
प्रकार मेरा योग साधने पर अपने आप ही चित्त और विषय का उत्तम रीति से वियोग होता है। इसका सरल
उपाय बताता हूँ। जरा देखो। इसमें भी शायद आपको शंका होगी कि सर्वत्र एक ही स्वरूप व्याप्त है और वह
शुद्ध है। वहाँ बाध्य कैसा और बाधक कैसा ? अर्थात् उस समय साधक किस चीज की साधना करते हैं ? लेकिन
ऐसे समय भी अहंता ही बाधक होती है। उसका भी लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो।
यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिदः ।
मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तद्गुणचेतसाम् ॥ २९ ॥
जहाँ क्षणभर की भी बस्ती होती है उस स्थान का भी मनुष्य को अभिमान चढ़ता है। अभिमान का उसे
इतना व्यसन रहता है। उसका यह कौतुक प्रत्यक्ष ही देखने लायक है। जरा सा भी अहंकार उत्पन्न हो जाय तो
बुद्धि पवित्र मनुष्य को भी मायाग्रस्त कर देती है। देह की संगति से वह अहंकार प्रबल होते ही तत्काल कुछ न
कुछ विपरीत परिणाम कर देता है। अहंकार जब उफनता है तो वह आनन्द को ढँक देता है। इससे परमात्मस्फूर्ति
का स्फुरण नष्ट होता है, जीव की विषयासक्ति बढ़ती है और वे स्त्री के विषय के अधीन हो जाते हैं। उनके
चित्त में सदा विषयों की ही चिन्ता रहती है। ऐसा मनुष्य भूल जाता है कि मैं स्वयं ही परिपूर्ण हूँ और धन के
लिये असहाय हो उठता है। अपने मर्यादित देहाकार का ही उसे अभिमान हो जाता है। इससे कर्माकर्म के आघात
होकर अनेक प्रकार की नरक यातनाएँ होती हैं और जन्म-मरण के भँवर में पड़ कर वह महान दुःख से व्याकुल
हो जाता है। उन दुःख यातनाओं को भोगते समय जिसके मन को कष्ट होता है और उससे गृहस्थी की वेदना
नहीं सही जाती उसे देहाभिमान छोड़ देना चाहिये। लेकिन संकट यही है कि यह देहाभिमान नहीं छूटता।
इसीलिये साधकों को साधनों का संकट सहना अनिवार्य हो जाता है। लेकिन वह जो भी साधन करता है उसमें
साधनाभिमान उत्पन्न हो जाता है। जिस प्रकार लुटेरे सब कुछ लूट लेते हैं, उसी प्रकार साधनों में अहंकार विघ्न

३८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूप हो जाता है। अब साधकों के साधन सुनो। वह इस प्रकार है कि वेदोक्त स्वधर्माचरण करना, पूर्ण वैराग्य
रखना और अत्यन्त प्रेम से मेरा भजन करना। देहाभिमान को तत्काल दूर करने के लिये मेरा अखण्ड नामस्मरण
करते रहना चाहिये। गायन, नृत्य आदि से युक्त होकर हरि का कीर्तन करना चाहिये और समस्त प्राणिमात्र के
प्रति समान मत्स्वरूप भावना रखें। समस्त भूत मत्स्वरूप हैं इस भावना से सदासर्वदा देखने से ज्ञानस्वरूप और
सर्वव्यापी मुझ में चित्त प्रवेश करता है। मैं निरन्तर तीनों अवस्थाओं में रहता हूँ। तीनों अवस्थाओं को मैं प्रकाशित
करता हूँ। लेकिन तीनों अवस्थाओं से भिन्न जो मैं हूँ वह सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ। तीन गुणों से परे, चौथा हुए
बिना भी चौथा मैं सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ। ऐसे मुझमें जो अपना चित्त रखता है वह ऐसा करते ही मत्स्वरूप हो
जाता है। सांसारिक चिन्ताएँ दूर होकर विषयावस्था समाप्त हो जाती है। उस समय चित्त, चिन्ता और चिन्तन,
विषयवासना व अभिमान इन सबका विनाश होकर स्वानंदघन मैं स्वयं ही प्रकट होता हूँ। द्वैत की भावना टूटे
बिना जो स्वयं को ज्ञानी समझता है और वृथा ज्ञान का अभिमान करता है वह भी अज्ञानी ही है।
यावन्नार्थेधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः ।
जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३०॥
अनेक वर्ण, अनेक व्यक्ति, विविध गोत्र, विभिन्न जातियाँ, अधम व उत्तम विधि के प्रकार इन सबसे चित्त
में दृढ़तर भेद उत्पन्न हो जाते हैं। मैं काला, गोरा, साँवला, उत्तम ज्ञान से श्रेष्ठ मैं, उत्तम पवित्र कृति मेरी, मेरा
कुल श्रेष्ठ और मैं उत्तम कुलवान इस प्रकार का भेद मन में उत्पन्न होने पर अद्वैत बताने वाली श्रुति देखकर या
शास्त्रार्थ की युक्ति सुनकर भी जिन साधकों के मन से भेद की निवृत्ति नहीं होगी उसका ज्ञानाभिमान व्यर्थ है।
उसका कर्माचरण व्यर्थ है। जागृत अवस्था में होने पर भी उसे सोया हुआ समझना चाहिये। उसमें जागृत अवस्था
है ही नहीं। तब देहाभिमान दृढ़ होता है उस समय उसने मानो धतूरे का सेवन किया रहता है और वह अत्यन्त
भ्रमजाल में फँस कर मानो अविद्यारूपी प्रदीर्घ सपना देखता रहता है। नींद में कहे गये शब्दों का जैसे कोई अर्थ
नहीं निकलता उसी प्रकार केवल पठन करने से परमार्थ प्राप्त नहीं होता। इतना ही नहीं बल्कि श्रुति शास्त्रों का
वास्तविक अर्थ भी उनकी समझ में नहीं आता। नित्य वेदाध्ययन करते हैं, अरण, ब्राह्मण, सूत्र, निरुक्त का पाठ
करते हैं लेकिन यदि कामक्रोध की निवृत्ति नहीं होती तो उस पठन से परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होगी। मन में
देहाभिमान रखकर और भेद दृष्टि रखकर सहस्र वेदशास्त्र का पठन करने से भी परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं
होगी। जो स्वप्न में ही जागता है और स्वप्न में ही वेदशास्त्र पढ़ता है उसे जाग्रत कहने पर भी वह सोया हुआ
है। उसी प्रकार शास्त्रज्ञों का व्यवहार रहता है। देहाभिमान के साथ सभी भेद भावनाओं का जब तक विलय नहीं
होता तब तक आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होगा। क्योंकि भेद ही सबसे बड़ा बन्धन है। सनकादिकों की ही शंका ध्यान
में रखकर, सबकी समझ में ठीक से आ सके ऐसी भाषा में वेदों का अर्थ भगवान अच्छी तरह समझाने लगे।
स्वयं ही सारा भेद प्रकट कर तुम्हारा वेद जोर-जोर से गर्जना कर रहा है। भेद का प्रतिपादन तो वेद ने ही किया
है और वेद का कथन तो असत्य नहीं होता। वेद का वचन सत्य ही है और उसे मान्य करना चाहिये यह तुम्हारा
ही कथन है तो उस वेद को असत्य कैसे कहा जाय? वेदज्ञा सबमें श्रेष्ठ है। वेद ने ही क्रिया और कर्म का
प्रतिपादन किया है। सारे वर्णाश्रम अपना स्वधर्म वेद के ही बल पर चलाते हैं। वेद को जो झूठा कहेगा वही
वास्तव में वेद बाह्य है यह तुमने ही कहा है। उस वेद को झूठा कैसे मानूँ? यदि ऐसी शंका हो तो उसके सम्बन्ध
में मैं ही तुम्हें वेद वचनों के भिन्न-भिन्न भागों का विचार सुनाता हूँ। अविद्यात्म भेद जिसमें प्रबल हुआ रहता है

तेरहवाँ अध्याय ३८१
उसी के लिये मैंने वेद का यह नियम लगाया है। किन्तु जो भक्त मेरे स्वरूप में एक हो जाता है उसके आगे
वेदवचन लाचार हो जाते हैं। वेद तीन गुणों से व्याप्त हैं और अभेद भजन के कारण भक्त निर्गुण बन जाता है
अतः उसे मेरी आज्ञा के कारण वेद का बन्धन नहीं रह जाता। राजा का प्रिय चाकर हो तो पहरेदार उसे नहीं
रोकता अथवा किसी दासी को राजा की गोद में बैठने का अधिकार प्राप्त हो तो बड़े-बड़े प्रधान भी उसे सम्मान
देते हैं। माँ भी अपनी कन्या को सिखाती है कि दूसरों के सामने पति से भी लज्जा करनी चाहिये लेकिन एकान्त
में लज्जा छोड़ देनी चाहिये। भेदों की भेदभावना जब तक प्रबल रहती है तब तक वेदों के वचन का उल्लंघन
नहीं हो सकता। लेकिन मेरे अभेद भावना धारण करने वाले जो भक्त हैं उनके लिये कोई भी नियम बाधक नहीं
होता। जिस प्रकार सूर्योदय के आगे चन्द्रमा का तेज फीका रहता है उसी प्रकार आशा अविद्या रूप में बाधक
होती है। उसे नष्ट कर देने पर वेदों की बाधा नहीं होती।
असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा।
गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा॥३१॥
जो गुरुकृपा से ज्ञानसम्पन्न होता है, उसे देह की भावना बाधक नहीं होती। उसके लिये प्रपंच का दर्शन
मिथ्या होता है और कर्म करने पर भी उसे कर्त्ता नहीं होना पड़ता। वर्ण और आश्रम अज्ञान की ही उपज हैं
इसलिये उसमें का क्रियाकर्म भी अज्ञानात्मक ही रहता है इसलिये उस वर्णाश्रम का वेदोक्त धर्म अज्ञानी के ही
मन में अविद्या का भ्रम उत्पन्न करता है। किन्तु ज्ञानसम्पन्न भक्तों में वह अविद्या बिलकुल नहीं होती। फिर उनमें
वेद विधान को स्थान कहाँ? आम के वृक्ष पर जब तक फल लगे रहते हैं तभी तक उनकी रखवाली की जरूरत
पड़ती है लेकिन एक बार फल हाथ में आ जाए तो रखवाली निष्फल सिद्ध होती है। उसी प्रकार जब तक अज्ञान
का बन्धन है तभी तक वेदों का विधान है। वह अज्ञान ही जब नष्ट हो जाता है तब वेदविधान वह स्थान छोड़
देते हैं। अज्ञान नष्ट होकर जब देह आचरण करता है तो देह का देहत्व से कोई हेतु नहीं होता। लेकिन आप
कहेंगे कि ऐसा कुछ होगा ही नहीं। तो उसके सम्बन्ध में भी बताता हूँ। सुनो। स्वप्न में देहादिक प्रपंच का भान
स्वप्न में ही सच होता है। कुछ संस्कारों से स्वप्न आने पर भी नींद खुलने पर वह सब व्यर्थ लगने लगता है।
किसी व्यक्ति को यदि स्वप्न में राजपाट मिल जाय या वह बाघ के मुँह में पड़ जाय अथवा उसे धन का लाभ हो
कर अमूल्य रत्न मिल जाए तो वहाँ का सुख, दुःख अथवा हर्ष नींद खुलने पर नहीं होता। उसी प्रकार ज्ञानी को
भी आत्मज्ञान के कारण अज्ञानात्मक कुछ भी बाधक नहीं होता। देह में रहकर भी विदेह स्थिति धारण करने के
जो ज्ञानदायक उपाय हैं, उस भेद का नाश करने के लिये भगवान स्वयं बता रहे हैं।
यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणैर्हृदि तत्सदृक्षान्।
स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात्त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः॥ ३२॥
तीनों अवस्थाओं में देह में आत्मा एक ही रहता है। वही देह में विदेही होकर सबका साक्षी है। मैं बच्चा
था, फिर युवा हुआ और अब वृद्ध हो गया हूँ। इस प्रकार उम्र की साक्ष्य हम स्वयं देखते रहते हैं। जागृत अवस्था
में वह अनेक प्रकार के सुखोपभोग अनेक प्रकार से भोगता है और उन्हीं का स्वप्न में अपने हृदय में अच्छे ढंग
से विस्तार करता है। जागृति में भोग का जो संस्कार घटता है उसी का स्वप्न में विस्तार होता है। स्वप्न में
मनोमय विश्व उत्पन्न कर अपने हृदय में उसी का विस्तार बढ़ाता है। हाथी, घोड़ा, गधा, पुरुष, पर्वत, नगर,
बड़ी-बड़ी नदियाँ, समुद्र आदि वासनाओं को स्वप्न में देखता है। वही सुषुप्ति में, न जागृति न स्वप्न ही ऐसी

स्थिति में, अंतःकरण को भी लीन कर अहंकार विहीन होकर रहता है। विश्वाभिमानी पुरुष देह को ही 'मैं' और
विषय को 'मेरा' समझने की प्रवृत्ति का रहता है। उस वृत्ति से वह जागृति में निरन्तर देखता रहता है। जो तैजस
अभिमानी होता है वह अज्ञानवृत्ति का होता है इसलिये वह स्वप्नस्थिति देखता रहता है। ज्ञान का अभिमानी मूढ़
प्रवृत्ति का होता है इसलिये वह सुषुप्ति अवस्था देखता है। अब आप कहेंगे कि एक ही आत्मा इन तीन
अवस्थाओं में हो यह सम्भव नहीं है और तीनों अवस्थाओं को देखने वाले तीनों अभिमानी भिन्न होंगे यह कहें तो
अन्त में एक ही आत्मा शेष रहता है। ऐसा क्यों होता है? तो सुनो। पहला जो मैं जागने वाला हूँ उसने
स्वप्नावस्था देखी और वही मैं सुख से सोया भी था। इससे स्पष्ट है कि ये तीनों अवस्थायें मैं स्वयं जानता हूँ।
जिसने जो अवस्था देखी ही नहीं है वह उस अवस्था को कैसे बता सकता है? यही कारण है कि तीन
अवस्थाओं में आत्मा एक ही है। जागृति में इन्द्रियों में देखने का सामर्थ्य होता है, स्वप्न में तो देखने वाला मन
होता है और सुषुप्ति में पूरी तरह मूढ़ अज्ञान ही होता है। वह आत्मा को कैसे देखेगा? हे ब्राह्मण! इस शंका का
उत्तर भी शान्त चित्त से सुनें। मन और इन्द्रिय जड़ ही हैं। उनमें देखने का सामर्थ्य कहाँ से आयेगा? जो मन को
चलाता है, जो इन्द्रियों का प्रकाशक है, जो सुषुप्ति का द्योतक है, वह साक्षी रूप में रहने वाला आत्मा ही है।
अब अगर यह कहें कि सुषुप्ति में आत्मा होता ही नहीं है तो यह कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि, मैं आनन्दपूर्वक
सोया था यह अनुभव किसे होता है? तो प्राकृतिक कार्यों से अलग, देहादि अवस्थाओं को प्रकाशित करने वाला
तथा गुण और इन्द्रियों का नियंता वही वास्तव में आत्मा है। इन्द्रियाँ आत्मा नहीं होती यह नियम है क्योंकि
उनका कर्म केवल एकदेशी होता है और आत्मा तो सर्वकर्ता, सर्वोत्तम होते हुए सदा निष्कर्म है। मन आत्मा नहीं
है, इसका मर्म सुनो। संकल्प और विकल्प यह मन का कर्म है और आत्मा निर्विकल्प, निरुपम होते हुए संसार
का विश्रामस्थल है। जो सुषुप्ति भोग का साक्षी, त्रिभुवन में देखना ही जिसका स्वरूप है, ऐसा जो अद्वितीय
आत्मा है वह मैं ही हूँ इसे निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। इस युक्ति से जो एक परमात्मा को साध्य कर लेता है
वही साधकों के काम आता है और उसी के सामर्थ्य से योग भी साध्य होता है।
एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्था मन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्थाः।
संछिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्णज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम्॥ ३३॥
जो-जो युक्तियाँ मैंने तुम्हें बतायी हैं और जो श्रुति शास्त्रसम्मत भी हैं उन पर विचार कर परमार्थ के मार्ग
के संकटों को सुलझाना चाहिये। संसार के बन्धनों का कारण गुणावस्था है जिनसे मन व्याप्त है। जिसे मेरा ही
आच्छादन है ऐसी जो माया है वही मूल कारण है। जिस प्रकार आँख का पानी जम कर उसी का परदा बन जाता
है और जो आँख को ढँक देता है, उसी प्रकार मेरी माया मेरे ही कारण प्रबल हुई है और उसने मुझे ही ढंक दिया
है अथवा जिस प्रकार पूर्णिमा को अत्यन्त निर्मल पूर्णचन्द्र का उदय होते हुए उस पर पृथ्वी की छाया पड़ती है
और चन्द्रमा पर काला दाग दिखायी देने लगता है। पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच का अन्तर काफी है अर्थात्
चन्द्रमा का दाग झूठा है लेकिन लोग उसे सच मानते हैं। उसी प्रकार माया मेरे पास है, उसने मुझे स्पर्श भी नहीं
किया है फिर भी लोग मिथ्याभास के कारण ही उसके भुलावे में आ जाते हैं। इसीलिये मिथ्या गुणों की अवस्था
अपने माथे पर ढोते हैं। इसी कारण विषयभोग की अवस्था वासनामुक्त होकर बढ़ती है। इस प्रकार उभय देह
बन्धन जीव से व्यर्थ ही चिपके हुए हैं। इसलिये उसे तोड़ने के लिये मेरी युक्ति पर विचार करना चाहिये। मुक्ति
का केवल अनुमान ही करते रहने से अनुमानिक ज्ञान होता है। उससे अविद्या का बन्धन नहीं टूटता। इसलिये

तेरहवाँ अध्याय ३८३
साधु संतों की सेवा करनी चाहिये। साधुओं में भी परिपूर्ण साधुत्त्व केवल सद्गुरु के ही पास है इसलिये उनके
चरणों की सेवा करनी चाहिये। उस सेवा से संसार बन्धन टूटता है क्योंकि सद्गुरु ही सच्चे साधु और सज्जन
पुरुष रहते हैं। उस साधु के सरस वचन श्रुति का ही उपदेश करते हैं जिससे ज्ञानरूपी खड्ग की प्राप्ति होती है
और उसे बुद्धि के हाथ में दिया जा सकता है। उसी शस्त्र को फिर वैराग्य और नैराश्यरूपी सील पर घिस कर
उसे प्रखर बनाना चाहिये और उसे धैर्य की मुठिया लगाकर अंतःकरण में सावधानी से रखना चाहिए। उस शस्त्र
से स्वयं को एकजुट करना चाहिये और फिर लक्ष्य साधकर देहाभिमान को छाँट देना चाहिये जो सभी संशयों का
गड़ढा है, जिससे देहदुःख उत्पन्न होता है, जिसके कारण सदा विषयों का व्यसन लगता है, जो काम और क्रोध
का पोषण करता है, जो तीनों गुण बढ़ाता है, जो शुद्ध आत्मा में जीवत्त्व लाता है, जिसके कारण जीव को जन्म-
मरण भोगना पड़ता है, जो सभी अनर्थों का दाता है, ममता जिसकी लाडली बेटी है, ऐसा यह अभिमान है।
मायारूपी माँ ही ममता को बढ़ाती है और उसी के सामर्थ्य पर यह इतना अहंकारी हो जाता है। इसलिये वीर को
समरभूमि में तेज धार वाला शस्त्र लेकर, धैर्यपूर्वक खड़े होकर इतने जोर से प्रहार करना चाहिये कि एक ही घाव
में माया, ममता और अभिमान इन तीनों के एक साथ टुकड़े हो जाएँ। भोज्य, भोग और भोक्ता, कर्म, कार्य और
कर्त्ता, ध्येय, ध्यान और ध्याता इस त्रिगुट को ही काट डालना चाहिये। 'मैं हूँ', 'मैं कौन' अथवा 'मैं ही ब्रह्म हूँ'
इस आत्मीयता का अहंभाव भी काट डालने से साधकों को मेरे पद के पास स्थान प्राप्त होगा। इस प्रकार वे स्वयं
ही ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। अब आप कहेंगे कि यह तो केवल शब्दज्ञान का व्यवहार है। जोर शोर से बातें करने
से अहंकार कैसे नष्ट होगा? यदि शब्दों से ही अभिमान नष्ट होता तो बड़े-बड़े विद्वान अभिमान में क्यों चूर हो
जाते? अभिमान अगर सामने दिखायी देता तो दौड़ कर उसे काट डालते। लेकिन वह तो अतर्क्य है। अतः शब्दों
से तो अभिमान नष्ट नहीं होगा। उसी प्रकार आत्मानुभव का जो साक्षात्कार होता है वह कोई शब्दों का खेल नहीं
है। तो ऐसी शंका का समाधान सुनो। जो सदा सावधान रहकर अनन्य भाव से मेरा भजन करता है अथवा मेरी
ही भावना से जो सद्गुरु के पवित्र चरणों की सेवा करता है, मुझमें और सद्गुरु के कल्पांत में भी कोई भेद नहीं
है इस अभेदभाव से जो मेरा भजन करते हैं उन्हें सहज ही ज्ञान प्राप्त होता है। स्वाभाविक रूप से मेरे भजन में
मग्न रहने के कारण उन्हें ज्ञानरूप खड्ग की प्राप्ति होती है। जिस शस्त्र की धार से काल का हृदय भी काँप
उठता है वह शस्त्र ही अपने आप उसके हाथ लग जाता है। उस शस्त्र के भय से ही माया, ममता और अभिमान
जीव को छोड़ कर पूरी तरह भाग जाते हैं। अहंममता तथा अविद्या पर पूरी तरह प्रहार करने के लिये तैयार हो
जाइये तो वे स्वयं ही भय के कारण भाग जाते हैं और अहंममता तथा अविद्या का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता
है। उत्तम भक्तिभाव से मेरा जो भजन करना चाहिये उसे करने से इतना ज्ञान प्राप्त होता है। अब मन में ऐसी
शंका आएगी कि यह भजन कहाँ किया जाय? तुम्हारा स्वरूप अतर्क्य, अत्यन्त सूक्ष्म और निर्गुण है। अतः
तुम्हारा भजन करने के लिये कौन-सा स्थान उपयुक्त है यही समझ में नहीं आता। अगर मन में ऐसी कल्पना
आती है तो उसका उत्तर ध्यानपूर्वक सुनो। सहस्रों पर्वतों को पार किये बिना, गुफाओं में गये बिना, कहीं दूर
जाने का परिश्रम किये बिना, जहाँ मेरी सदा सर्वदा भेंट होती है, जहाँ मैं पुरुषोत्तम रहता हूँ, वह भजन स्थान
निरूपम है। मुझे प्राप्त करने के लिये वह भक्तों का अत्यन्त सुलभ विश्राम स्थल है। सर्वसुखों का विश्रामस्थल
जो आत्माराम है वह अपने हृदय में सदा समभाव से रहता है। वहीं उसका प्रेम से भजन करना चाहिये। ब्रह्मदेव
से लेकर मक्खी तक सबके हृदय में एक मैं ही हूँ यह जो जानता है वही भाग्यवान है। मेरी प्राप्ति के लिये यही
भजन उत्तम है। जो मेरे हृदयस्थ तेज से मन-बुद्धि से आचरण करते हैं, जिस मेरे स्फुरण स्फूर्ति से ज्ञान पैरों पर

३८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लोटता है, उस मुझ हृदयस्थ के प्रति जो भजन तत्पर नहीं होता वह बाह्य उपायों से थक कर अनेक प्रकार के
संकटों में पड़ जाता है। ऐसे लोगों में भी कोई तो ऐसा भाग्यवान पुरुष होता है और वही मुझ हृदयस्थ का विचार
कर निश्चयपूर्वक मेरे भजन में लग जाता है। मुझ हृदयस्थ का भजन करने से, जिस ज्ञान से अधःपतन नहीं
होता, ऐसा मेरा पूर्ण वैराग्ययुक्त आत्मज्ञान वह प्राप्त करता है। उस ज्ञान के भय से ही अभिमान भाग जाता है।
वह ज्ञान मैं उन्हें देता हूँ जो सदा सर्वदा मुझ हृदयस्थ का भजन करते हैं। जिस ज्ञान की सिद्धि से समस्त
व्याधियाँ दूर हो जाती हैं और सारे संशय भी भाग जाते हैं उस ज्ञान से भक्त आत्मपद प्राप्त करते हैं। इसलिये मैंने
बड़े आग्रह से कहा कि बलशाली वीरों को तेज शस्त्र से सन्देह को काट देना चाहिये। इस पर मन में यह विचार
आयेगा कि यदि सचमुच संसार प्राप्त हो जाय तो उसका शस्त्र से किस प्रकार छेदन करना चाहिये ? तो जो भी
संसार है वह सब भ्रांति है यही बात श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्।
विज्ञानमेकमुरुधैव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्पः ॥ ३४ ॥
देह से लेकर अहंकार तक जिस पिण्ड-ब्रह्माण्ड का आभास होता है वह सब मन का ही विलास है।
संसार मिथ्या ही होता है। जिस प्रकार सुषुप्तावस्था में स्वप्न में मन स्वयं सारे त्रिभुवन को देखता है, उसी प्रकार
अविद्या यह लम्बा संसाररूपी स्वप्न का निर्माण करती है। जो एक स्वरूप का रहता है और दूसरे स्वरूप में
दिखायी देता है, उसे आभास कहते हैं। सीप में चाँदी का आभास होता है, रस्सी को बड़ा सर्प कहते हैं। अथवा
जहाँ केवल सूर्यकिरण होते हैं वहाँ लोग मृगजल देखते हैं, उसी प्रकार जो केवल शुद्ध परब्रह्म है उसे लोग भ्रम
के कारण संसार कहते हैं। लेकिन इस आरोप का कारण स्वयं मैं हूँ। मशाल को गति से घुमाने से वह अग्नि का
कंगन मालूम होता है, वह केवल अग्नि के तेज के आभास के कारण। उस अग्निचक्र का विस्तार करने पर
अग्नि सत्य होता है और कंगन मिथ्या रहता है। उसी प्रकार संसार के सम्बन्ध में विचार करें तो ब्रह्म सत्य है
और संसार मिथ्या। उस संसार के आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक आदि सब मशाल की तरह होते
हैं। वे तीन गुणों से उत्पन्न माया का ही परिणाम है। मशाल के परिभ्रमण के आभास के कारण और उसकी घूमने
की गति के कारण वह मशाल चक्र की तरह दिखायी देती है। वह क्षणभर के लिये ही दिखाई देती है और
क्षणभर में अदृश्य हो जाती है। उसी प्रकार यह संसार है। जब तक परिभ्रमण तीव्रगति से होता है तब तक मशाल
का कंगन दिखायी देता है। परिभ्रमण समाप्त होने पर कंगन का स्वरूप भी नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार जब
तक भ्रम रहता है तब तक संसार सत्य मालूम होता है। वह भ्रम समाप्त होने पर संसार दिखायी भी नहीं देता। मैं
ही देह हूँ, स्त्री और बच्चे मेरे हैं यही भ्रम का मुख्य सूत्र है। उसका नाश किये बिना ही क्षुद्र लोग मुक्त होने का
अहंकार करते हैं। इस प्रकार यह संसार मायामय है यह निश्चित है और उसकी आसक्ति त्याग कर शान्ति किस
प्रकार प्राप्त की जाय उसका प्रकार बताते हैं।
दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्णस्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः।
संदृश्यते क्व च यदीदमवस्थितवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ्रमाय न भवेत् स्मृतिरानिपातात् ॥ ३५॥
भजन से अभ्यास से दृष्टि भी सहज ही पवित्र होती है और संसारात्मक त्रिपुटी भी मिथ्या है इस बात का
दृढ़ निश्चय अंतःकरण में होता है। उस समय संसारात्मक त्रिपुटी को छोड़ दृष्टि शांत करने पर जिस प्रकार
अलंकार सुवर्ण के रूप में दिखायी देते हैं उसी प्रकार मेरी हृदयस्थ के साथ भेंट होती है। तब दृश्य, द्रष्टा और

दर्शन इस त्रिपुटी का भान छोड़ कर वही धारणा और वही ध्यान है यह मानकर उसमें समाधान मानना चाहिये।
वही स्वयं को साध्य हो इसलिये सारी आशाओं को त्याग देना चाहिये, वाणी से मौन धारण करना चाहिये, देह
के व्यापार पर नियंत्रण रखना चाहिये, वेदशास्त्रों को दूर रखें, वाद-विवाद से दूर रहें और जिससे आशा का मूल
समूल नष्ट हो जाये इस प्रकार भगवान की दृढ़ धारणा करें। काया, वाचा और मन को अपने काबू में रखें।
आत्मस्वरूप के लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिये। सदा आत्मस्वरूप में ही लीन रहना चाहिये। उस स्वरूप
के सुख में लीन होने पर देह का देहपन भी याद नहीं रहता। अहंकार के साथ-साथ मन भी लुप्त हो जाता है
और परिपूर्ण स्वानंद की धारा बहने लगती है। वहाँ न कोई सामने है न कोई पीछे है। एकलापन भी नहीं है और
न दूजापन ही है। वहाँ भगवान और भक्त यह भेदभाव भी शेष नहीं रह जाता। सुख के सुख से वह सुखस्वरूप
होकर रहता है। सुखस्वरूप वैसे अकेला मैं ही हूँ, अलगपन से रहना मैं नहीं जानता इस आत्मानुभव में वह मग्न
रहता है। मेरे भक्तों को इतना लाभ होता है। आप शायद इससे यह कहें कि तुम रात-दिन कष्टवत् पड़े रहते
होगे लेकिन उसके साथ वैसा भी नहीं घटता। वह हेतु को छोड़ देह में विचरण करता रहता है। प्रारब्ध के बल
से वह आहार, निद्रा आदि दैहिक कर्म स्वाभाविक रूप से करते हुए भी देहबुद्धि को स्पर्श नहीं करता। कुम्हार
डंडा भले ही हटा ले लेकिन उसका चाक पहले की सी गति से ही चलता रहता है। उसी प्रकार प्रारब्ध के
संस्कार के अनुसार देह कर्म के अनुसार आचरण करता रहता है अथवा कुम्हार के चाक पर जब मक्खी बैठती
है तो वह बिना हिले ही चाक के साथ घूमती रहती है। इसलिये उसके भी करोड़ों फेरे हो गये ऐसा कहते हैं।
उसी प्रकार मुक्त को भी देहकर्म होते रहते हैं। इस प्रकार देहकर्म में आचरण करने वाला कभी नहीं कहता कि मैं
कर्त्ता हूँ। जिस प्रकार वायु के स्वभाव के कारण गिरे हुए पत्ते को भी चपलता प्राप्त होती है उसी प्रकार कर्म पूर्व
संस्कार के अनुसार चलते रहते हैं अथवा जिस प्रकार पुरुष के साथ छाया रहती है किन्तु पुरुष उस छाया में नहीं
रहता उसी प्रकार ज्ञाता के साथ भी देह रहता है किन्तु वह देह के दोष से मलिन नहीं हो जाता। यदि हम अपनी
ही छाया में बैठें तो वह छाया ही भाग जाती है। उसी प्रकार मेरे भक्त जब माया को देखते हैं तो माया उन्हें देखते
ही भाग जाती है अथवा मोतियों की कोई माला भ्रम में साँप की तरह दिखायी देती है लेकिन वह भ्रम दूर हो
जाने पर, उसे गले में पहनने पर साँप का भय नहीं रहता। उसी प्रकार अधम योनी हो या उत्तम योनी हो, लोगों
में वंद्य हो या निंद्य हो, उस देह को 'मैं' कहने में शंका नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि देह ही मिथ्या है।
इस प्रकार ज्ञानसम्पन्न होने के कारण देह का भान मिथ्या है यह जानने के कारण ही देह के कर्म में आचरण
करते हुए भी उन्हें देह का देहपन बाध्य नहीं करता। उस देह के अवयवों को तोड़ने पर अथवा बाघ आदि
जानवरों द्वारा उसके फाड़े जाने पर अथवा अग्नि में उसे जलाने पर भी उसके देह को अहंता का भान नहीं रहता।
सूली पर अपनी छाया देखने पर जिस प्रकार कोई बेचैन नहीं होता, उसी प्रकार देह की होली जलने पर भी ज्ञाता
आत्मज्ञान के कारण भयभीत नहीं होता। अब शायद आप यह कहेंगे कि देह के साथ रहते हुए देह की अहंता
किस प्रकार बाधक नहीं होती ? अपनी स्वाभाविक नमकीनी छोड़कर यदि नमक व्यवहार करने लगे तो वह कैसे
बच पायेगा ? हींग अपनी गन्ध छोड़कर सुगन्धित कैसे रह पायेगा ? केला अपना सारा पानी त्याग कर केले के
रूप में कैसे रहेगा ? मैं युद्ध नहीं करूँगा कह कर यदि कोई लड़ाई में घुस पड़े तो क्या वह मस्तक पर होने वाले
प्रहार से बच पायेगा ? उसी प्रकार देह की संगत में आचरण करते समय देह की अहंता हमें छोड़ नहीं पायेगी।
इस शंका का उत्तर भी ध्यानपूर्वक सुनें। ज्ञाता को देह का भान बाधक नहीं होता। उस देह के प्रति जो अभिमान
जागता है वह भुने हुए बीज की तरह होता है। भुने हुए बीज से भूख का निवारण हो सकता है लेकिन उसे बोने

३८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर उसमें से अंकुर नहीं निकल पायेगा इसे ध्यान में रखिये। चित्र में बाघ दिखायी देता है लेकिन उसमें पीड़ा
करने का सामर्थ्य नहीं होता। उसी प्रकार भुना हुआ अभिमान यदि शेष बचा भी हो तो वह ज्ञाता को बाधक नहीं
होता। चित्र के बाघ में जिस प्रकार बाघ की हिंस्रता नहीं होती, उसी प्रकार मुक्तों के देह में भी देह के गुण नहीं
होते। चैतन्यघन आत्माराम जब हृदय में दृढ़ हो कर बैठ जाता है तो उसी के स्वरूप में वृत्ति निमग्न हो जाती है।
तब दिखायी देने वाला भान भी भुना हुआ होने के कारण उसका प्रभाव भी नष्ट हो जाता है। इस प्रकार जब
स्मृति का लय हो जाता है तो ज्ञाता किस प्रकार आचरण करते हैं उसका यथातथ्य वर्णन श्रीकृष्ण आत्मबोध से
बता रहे हैं। सब कर्मों में आचरण करते हुए देह का देहपन याद नहीं रहता, यह समाधि का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं
बता रहे हैं।
देहंच नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम्।
दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः॥ ३६॥
वह जिस देह से मेरा भजन कर मेरे शुद्ध स्वरूप को पहुँचता है, उस देह को ही वह भूल जाता है और
उस देह को वह अपनत्व की दृष्टि से नहीं देखता। जिस प्रकार कोई किराये के घोड़े को अपने घर तक ले
आता है लेकिन कार्य पूरा हो जाने के बाद वह कहाँ चला गया इसका उसे स्मरण भी नहीं होता अथवा कोई
स्त्री मैके से ससुराल आते समय किसी विश्वस्त मजदूर को साथ लेती है लेकिन रात को अंतःपुर में पति के
साथ सोने के बाद वह उस मजदूर को भूल जाती है अथवा जिस प्रकार दैवयोग से पालकी में बैठने वाला
व्यक्ति अपने फटे-पुराने पादत्राणों को भूल जाता है अथवा जिस प्रकार कोई स्त्री बहुत दिनों के बाद पति का
सान्निध्य प्राप्त होने पर लाज-लज्जा भूल जाती है वैसी ही उसके देह की अवस्था होती है। लेकिन दाम्पत्य की
उस सुखकारी भेंट में यदि कोई पराया व्यक्ति वहाँ आ जाता है तो उनमें लज्जा उत्पन्न होती है, उसी प्रकार द्वैत
दृष्टि से देखने पर ही देह का भान होता है। लेकिन मुझसे एकता का बल प्राप्त होने पर देह कैसा? इस प्रकार
मेरे स्वरूप तक पहुँचकर आत्मानंद से भरे उस साधक को अपने देह का विस्मरण होकर आनन्द से सुखरूपता
प्राप्त होती है। फिर शरीर उठा है या बैठा है, चल रहा है या स्थिर है, जाग रहा है या सो रहा है इन बातों का
स्मरण ही बन्द हो जाता है। वह तृप्त है या भूख से व्याकुल है, वह जाड़े से ठिठुर रहा है या गरमी से तप रहा
है, उसने जल का प्राशन किया है या उसे प्यास लगी है या वह यों ही शान्त बैठा हुआ है, इसका भी उसे
स्मरण नहीं होता। वह यहाँ है या वहाँ है, वह गूँगा है या बोलता है। यह था या नहीं था? इन बातों का स्मरण
करने का वह प्रयास नहीं करता। यह छूत या अछूत है? स्वच्छ है या मलिन है? यह आँखवाला है या अन्धा
है? या शरीर से यह विकलांग है? यह आया या गया? यह मूल रूप में था या कोई इसे ले आया है? इसने
जन्म लिया या मर गया? या स्थिर होकर रह गया? इसका भी उसे स्मरण नहीं होता। यह बाल है या युवा है।
यह मोटा है या पतला है? यह हल्का है या भारी है? इसका उसे पूरी तरह स्मरण नहीं होता। यह खाट पर
लेटा है या धरती पर है, यह अच्छी जगह है या खराब जगह? यह है या नहीं है इसकी भी उसे याद नहीं
रहती। यह मंत्र में है या तंत्र में है। तीर्थ में है या क्षेत्र में है। यह विष्ठा में है या मूत्र में है? या किसी पवित्र
स्थान पर है? इसका भी उसे स्मरण नहीं होता। यह जन में है या वन में है? या निर्गुण में है? जप में है या
ध्यान में है? इसका भी वह मन में स्मरण नहीं करता। यह सज्जनों में है या दुर्जनों में? यह किसी कारागृह में
है या विमान में है? यह घर में है या श्मशान में है? क्या कोई इसे देख रहा है? यह घर में है श्मशान में है?
क्या कोई इसे देख रहा है? इसका भी उसे स्मरण नहीं होता। यह हाथी में है या घोड़े में है? या स्त्रियों के

तेरहवाँ अध्याय ३८७

संभोग में है ? यह गधे में है या सर्प में है ? या यह शरीर में ही है ? यह स्वयं उसे याद नहीं रहता। यह काशी
में है या कैकट देश में है ? यह नरक में है या वैकुण्ठ में है ? यह घर में है या गिरिकंदरा में है ? अथवा यह
एकान्त में ध्यानमग्न है ? यह भी उसे स्मरण नहीं आता ? इसकी लोगों ने पूजा की है या इसे छला है ? उसे
पकड़ा है या मारा है ? यह देह में एकरूप हुआ या इसका क्या हुआ ? उसे यह स्मरण नहीं आता। मैं शेष पर
सोया हुआ हूँ या किसी भिखारी के घर में हूँ। क्या मैं सूली पर बैठा हुआ हूँ। इसका भी उसे शायद स्मरण नहीं
होता। ऐसे ज्ञाताओं की निरभिमानता मैं सचमुच नहीं बता सकता। जो मेरे ही पद पर पहुँच गये उनका चरित्र
बताना सम्भव नहीं है। जहाँ वेद भी मौन हो जाते हैं, स्वर और वर्ण के साथ वाणी भी डूब जाती है उन महान
संतों का गुणवर्णन मुझसे नहीं किया जाता। ज्ञाताओं की यह स्थिति देखकर शायद आप मन में यह विचार करें
कि उनमें जड़त्व और मूढ़त्त्व आ गया है। उनमें किसी भी प्रकार की स्फूर्ति नहीं उपजती। जिस प्रकार शुद्ध
पाषाण रहता है, वैसा ही उनका अंतःकरण हो जाता है क्योंकि उनमें किसी भी बात का स्फुरण नहीं होता। फिर
ज्ञातापन कैसा होता है ? यदि आपकी ऐसी शंका हो तो उसका निराकरण भी ध्यान देकर सुनें। ज्ञान और अज्ञान
की भूमिकायें लोगों के लिये सचमुच अतर्क्य हैं। जो शुद्ध ज्ञान होता है और जो जड़ मूढ़ अज्ञान होता है उन
दोनों की अवस्था एक जैसी होती है। उनकी पहचान भी मैं जानता हूँ। घनघोर अँधेरा छाया हुआ हो, उसमें
काजल का पर्वत हो और इसे दो भागों में विभाजित करने के लिये कोई अन्धा आये वैसी ही स्थिति अज्ञान के
आचरण की है। वेदांतशास्त्र के अच्छे से अच्छे ग्रन्थ लाकर उनका संशोधन कार्य अन्धे अथवा गूँगे के हाथ
सौंपा जाय तो वह न तो देख सकता है, सुन सकता है और न बोल ही सकता है। जड़त्व के कारण अज्ञान की
भी वैसी ही स्थिति हो जाती है। अब सज्ञान की स्थिति सुनिये। उन्हें आत्मसाक्षात्कार का अनुभव होने के कारण
वे देह में भी विदेह की तरह रहते हैं। जिस प्रकार रत्न और ओला एक जैसे दिखायी देते हैं किन्तु लोग काफी
धन देकर हीरा खरीदते हैं और ओला कोई मुफ्त में भी नहीं लेना चाहता। जिस प्रकार अनाज का दाना और
उसका छिलका दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं उसी प्रकार ज्ञान और अज्ञान पास-पास ही होने के कारण दोनों एक
जैसे दिखायी देते हैं। जिस प्रकार असली सिक्का और नकली सिक्का देखने में एक जैसा होता है और पारखी
व्यक्ति ठीक पहचान कर असली सिक्का लेता है और मूर्ख व्यक्ति फँस जाता है उसी प्रकार ज्ञान और अज्ञान का
बाजार एक ही जगह लग गया है ऐसा लगता है। यदि जरा भी रास्ता चूका तो भीषण पाखण्ड माथे पर गिरेगा।
उसी प्रकार जो मेरी भक्ति के लिये आते हैं वह मेरे प्रति विश्वास के कारण स्थिर हो जाते हैं, उन्हें मैं अपना
शुद्ध और सच्चा स्वरूप प्रदान करता हूँ। मेरे नाम के प्रति विश्वास के कारण ही प्रह्लाद ने सारे द्वंद्व दुत्कार दिये।
ऐसा भक्त न भी चाहे तो मुक्ति उसके पीछे खड़ी रहती है और विश्वास के कारण ही मेरे स्वरूप से भेंट होती
है। जिस प्रकार पानी में मिलने पर नमक अपना स्वरूप खो देता है उसी प्रकार जो मेरे स्वरूप तक पहुँचते हैं वे
मेरी भक्ति के साथ मद्रूप ही होते हैं। उनका स्वतंत्र स्वरूप शेष नहीं रहता। फिर नमक को अपना स्मरण नहीं
रह जाता, वह स्वयं समुद्र बन जाता है; उसी प्रकार ज्ञानी भी मद्रूप हो जाते हैं। इस प्रकार मेरे स्वरूप तक पहुँच
कर जो देहाभिमान को भूल जाते हैं वे सबके साथ ज्ञानमय होकर आनन्दरस में लीन रहते हैं। जिस प्रकार रस्सी
में सर्प का आभास होता है और कुछ देर के बाद वह आभासरूप सर्प नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मुक्तों को
देहभावना का आभास होता है। अतः 'मैं' और 'तुम' का स्मरण कराने वाला कौन है? अंतःकरण का ही
विस्मरण हो जाने के कारण वह स्वयं ही अपने को भूल जाता है। फिर कैसा स्वर्ग और कैसा नरक ? अच्छा
किस बात का और बुरा किस चीज का ? चौदह लोक कैसे ? केवल ब्रह्मस्वरूप ही शेष रहता है। वहाँ पवित्र

कैसा और अपवित्र कैसा ? तीर्थ कैसा और क्षेत्र कैसा ? वेद कैसा और शास्त्र कैसा ? ब्रह्म तो स्वतंत्र और अद्वय
ही है। वहाँ उत्पत्ति कैसी और विनाश कैसा ? बैकुण्ठ कैसा और कैलास कैसा ? ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर भी
कैसे ? एक अविनाशी ब्रह्म ही शेष रहता है। वहाँ किसका बोध और कैसी बुद्धि ? वहाँ तो वास्तव में देवत्व भी
नष्ट हो जाता है। मोक्षसिद्धि भी लज्जा से विनष्ट हो जाती है। वही क्षीरसागर का शेषशायी भी कैसा ? वहाँ तो
मेरा भगवान स्वरूप भी नष्ट हो जाता है। ॐकार का मस्तक भी डूब जाता है। इतना सायुज्यस्वरूप उन्हें प्राप्त
होता है। इसलिये देह बचा भी तो क्या और आया भी तो क्या इसका उन्हें स्फुरण भी नहीं होता। उसका
स्पष्टीकरण इस प्रकार है। अविद्या यह कारण है और देह उसका कार्य है। वह अविद्या ही जब नष्ट हो जाती है
तो कारण के बिना कार्य रहे यह सम्भव नहीं है ऐसा आप कहेंगे। वृक्ष यदि जड़ के साथ गिर पड़े तो भी
उसकी आर्द्रता तत्काल समाप्त नहीं होती। पत्ते, फूल, फल आदि आर्द्र रहते ही हैं। उसे सूखने में काफी समय
लगता है। उसी प्रकार अविद्या का नाश भले ही हो जाय लेकिन भोगरूप दैव के रूप में जो शेष रहता है उसके
कारण ज्ञानी पुरुष कर्म करता है। वह अपने देह में ही विदेह के रूप में रहता है। अब शायद आप यह कहें कि
देह को बड़े प्रेम से बड़ा करते हैं, उसका बड़े लाड़-प्यार से पोषण करते हैं और निरन्तर सुरक्षा करने पर भी
उसका पतन होता है यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। जिसका देह उसके स्वाधीन न हो उसका तत्काल पतन होना
चाहिये। फिर भी वह बचता क्यों है ? ऐसी भी कल्पना मन में आ सकती है। जिसका वह देह है वही जब उसे
नहीं पूछता तो फिर वह देहकर्म किस लिये करेगा ? यदि आपकी ऐसी शंका हो तो उसका भी उत्तर दूँगा। ध्यान
देकर श्रवण करें। देह की उत्पत्ति स्थिति और लय यह पुरुष के वश में नहीं रहती। दैव ही उसे चलाता है
इसलिये दैव योग से ही देह का कर्म होता रहता है। उठना या बैठना देह को दैवयोग के कारण ही प्राप्त होता
है। लेना-देना भी दैवयोग से होता है और खाना-पीना भी दैवयोग से होता है। देह को स्वदेश या परदेस दैव ही
ले जाता है। देह को स्वर्ग या नरक के भोग दैव के कारण ही भोगने पड़ते हैं। यश, लाभ, हानि अथवा मृत्यु
यह सब देह को दैव के कारण ही प्राप्त होते हैं किन्तु मृत्यु यह सब देह को दैव के कारण ही प्राप्त होते हैं
किन्तु जो ज्ञानसम्पन्न रहता है वह जिस प्रकार घट में दिखाई पड़ने वाला चन्द्रमा घट से अलग रहता है उसी
प्रकार वह देह से अलग रहता है। जिस प्रकार पुरुष के पास छाया रहती है उसी प्रकार ज्ञाता के सान्निध्य के
लिये देह रहता है। वह देह अपने कर्म भोगने के लिये दैव के अधीन रहता है। छाया मुझसे ही उत्पन्न होती है
और मेरे ही सान्निध्य में बढ़ती है फिर भी वह मेरी ही है इसका कभी किसी को गर्व नहीं होता। उसी प्रकार
ज्ञाता के पास देह रहता है फिर भी वह अभिमानपूर्वक 'यह मेरा' है नहीं कह सकता। छाया सदा निकट ही
रहती है लेकिन वह कहाँ रहती है और कहाँ नहीं रहती यह वह जिसकी है वह भी उससे नहीं पूछता। उसी
प्रकार ज्ञाता का देह के सम्बन्ध में आचरण रहता है। छाया विष्ठा पर भी पड़ती है और पालकी में भी चढ़ती है
लेकिन इसके कारण उस पुरुष को किसी भी प्रकार का सुख या दुःख नहीं होता। उसी प्रकार ज्ञाता को भी
देहभोग का सुख-दुःख नहीं होता। लेकिन उसे इस प्रकार अपने देह का विस्मरण कैसे होता है ? उसका कारण
भी दृष्टांत देकर बताता हूँ। जो पैसा देकर दारू पीता है वह उस दारू के नशे में नाचने, गाने लगता है। वास्तव
में देहधारी होते हुए भी वह अपने देह को भूल जाता है। शरीर पर वस्त्र है या नहीं इसका भी उसे भान नहीं
रहता और यह तो ब्रह्मरस का पान कर परमानन्द से तृप्त हुआ रहता है। अतः उस नशे की धुंध में उसे देह का
भी स्मरण नहीं होता। सारांश, देह का पालन अथवा पोषण, जन्म अथवा मृत्यु यह सब दैवयोग से ही होता
रहता है। हंस ने अपने भाषण में इसी बात का प्रतिपादन किया।

तेरहवाँ अध्याय ३८९
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः ।
तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ ३७॥
देह का जो भी आचरण है वह दैवयोग से ही होता है इसे ध्यान में रखो। अज्ञान में देहाभिमान रहता है जो
ज्ञाताओं में कभी नहीं होता। जिस प्रकार पूर्वसंचित कर्म रहता है, उसी प्रकार यहाँ देह उत्पन्न होता है। वह सभी
इन्द्रियों और प्राणों के साथ अगर दैवयोग से ही आचरण करता है तो आप कहेंगे कि दैवयोग से यदि वह देह में
है तो इससे देह का अहंकार अवश्य बढ़ना चाहिये। जिस प्रकार साथ-साथ चलने वाले राही परस्पर संकट
भोगते रहते हैं, लवण के मिश्रण से जल भी खारा हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञाता भी देह की संगत से देहाभिमानी
हो जायेगा। जिस प्रकार लोहे की संगत से अग्नि को भी हथौड़े के घाव सहन करने पड़ते हैं उसी प्रकार देह की
संगति से ज्ञाता भी सुख-दुःख भोगते हैं। इस प्रकार की कल्पना आप मन में कर सकते हैं किन्तु यह बात
ज्ञाताओं पर लागू नहीं होती क्योंकि वे सारा अहंभाव त्याग कर चिदानंद में ही समाधिस्त रहते हैं। 'अधिरूढ
समाधियोग' इस आशय का स्पष्ट पद है। इसका अर्थ है कि उसने आत्मज्ञान से अत्यन्त निर्दोष समाधि प्राप्त कर
ली है। वह समाधि कैसी रहती है? उसमें रहने वाला पुरुष क्या काष्ट की तरह तटस्थ रहता है या निरा पागल
हो जाता है या ज्ञानसम्पन्न रहता है? उस समाधि के सम्पूर्ण लक्षण बताता हूँ, सुनो। उसके योग से ज्ञानसम्पन्न
व्यक्ति को देह में रहते हुए भी देह के बन्धन में नहीं फँसना पड़ता। 'केवल तटस्थ होकर रहने का ही नाम
समाधि है' यह बात यदि ज्ञाता ही कहने लगें तो समझ लो उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी क्योंकि वास्तव में वह
समाधि नहीं है। ऐसी स्थिति में वृत्ति मूर्च्छाना की अवस्था में रहती है। सदा अभिमानरहित रहना इसी का नाम
अखण्ड समाधि है। लेकिन काष्ट की तरह होकर रहने का नाम समाधि कदापि नहीं है। तटस्थता को ही जो
समाधि मानते हैं उन्हें वास्तव में सच्चे स्वरूप का ज्ञान नहीं है और निश्चय का भी ज्ञान नहीं है। उनकी बातों में
केवल अनुमान रहता है। किसी भयंकर आघात से बेसुध होकर मनुष्य में लकड़ी की सी तटस्थता आ जाती है।
तो क्या उसे समाधि कहा जाय? पुरस्कार की आशा से बहुरुपिया अपना स्वांग रचते समय कभी अपनी सांस
रोक कर तटस्थता लाने का प्रयत्न करता है। लेकिन वह कोई समाधि नहीं है क्योंकि जब तक अंतःकरण में
वासना शेष है तब तक समाधि कैसे लगेगी? वह बहुरुपिया होश में आते ही कहता है, "आप उदारश्रेष्ठ हैं
अतः मुझे योग्य पुरस्कार दें।" सारे संकल्पों का जो चरम बिन्दु है उसी का नाम निर्विकल्प समाधि है। सभी
शास्त्रों ने इसे प्रतिपादित किया है। बकरी के पास साँप आता है तो वह भी सभी वृत्तियों से शून्य होकर तटस्थ हो
जाती है। लेकिन वह समाधि नहीं है। सहसा कोई दिव्य स्वरूप देखने पर आश्चर्य के कारण तटस्थता प्राप्त होती
है। ऐसे प्रसंग में सचमुच वृत्ति रहती ही है ऐसा समझना चाहिये। उसी प्रकार पहली ही बार आँखों को
आत्मस्वरूप दिखायी देने पर इतना अधिक आश्चर्य होता है कि सँभाले नहीं सँभलता। लेकिन उस आश्चर्य को
पेट में दबाने पर जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसी का नाम है, 'समाधि'! कल्पना जहाँ पूरी तरह नष्ट हो जाती है
वहाँ विस्मय का स्फुरण कैसे होगा? वहाँ अतिसूक्ष्म कल्पना भी नष्ट हो जाती है, इसलिये आश्चर्य भी नष्ट हो
जाता है। जिसे सचमुच ब्रह्म की ही प्राप्ति हो जाती है, उसमें देह का ही स्फुरण नहीं होता और उस समय वह
तटस्थ खड़ा है या चल रहा है यह भी दूसरों को ही देखना पड़ता है। इस प्रकार जहाँ देह ही मिथ्या होता है वहाँ
उसके लक्षण कौन देखेगा? मृगजल के स्नान से ज्ञाता को जितना संतोष प्राप्त होगा उतना ही यह भी सम्भव है।
मिथ्या देह को तटस्थता प्राप्त हो जाय उसी को समाधि की अवस्था समझा जाय इस लक्षण को सच मानकर
बड़े-बड़े ज्ञानी भी फँस गये हैं। स्वप्न में ज्ञानी बने मनुष्य को तटस्थ स्थिति प्राप्त हुई और वह स्वप्न देखने वाले

३९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
उस व्यक्ति को वह सच भी मालूम हुई तो भी जागृति में आने पर वह उसी अवस्था में नहीं आता अथवा
स्वप्नावस्था में रहने वाले व्यक्तियों को समाधि में बड़ा सम्मान प्राप्त हो जाय लेकिन वह सम्मान उसे जागृत
अवस्था में नहीं प्राप्त होगा। वास्तव में वह सो गया है यही समझना चाहिये। उसी प्रकार तटस्थता को समाधि
कहना ही अविद्या है। वह अविद्या स्वप्न और मूर्च्छा का स्वरूप है। वह आत्मस्वरूप ज्ञान में जागृत नहीं हुआ है
यही समझना चाहिये। जागृत होकर जब वह स्वप्न की ओर देखता है तो उसे झूठा ही मानता है। क्या उसमें
उसका देह भी सत्य था ? अमर वह सत्य है तो फिर उसमें तटस्थता आ सकती है ऐसा प्रश्न उसके मन में आता
है। जो सचमुच जागृत होने के बाद उस स्वप्न के देह को अपनी कल्पना से तटस्थता देने का प्रयास करता है
उसे तब लज्जा होने लगती है। उसे इसमें इससे अधिक महत्त्व नहीं मालूम होता। वह जागृत होने पर जिस स्वप्न
का वर्णन करता है वह असत्य रहता है। वह उसे स्पर्श भी नहीं करता। उसी प्रकार जिसे सचमुच परब्रह्म की ही
प्राप्ति होती है वह भी देह की स्थिति में लिप्त नहीं होता। तो फिर उसका देह किसके बल से क्रियाएँ करता है ?
वह शेष प्रारब्ध की गति से क्रियाशील रहता है। अग्निपात्र का अग्नि भले ही बुझ जाय लेकिन जमीन में उसकी
उष्णता कायम रहती है। कपूर भले ही जल जाय लेकिन उस स्थान पर उसका सुवास कायम रहता है। पालने
को झुलाने वाला आदमी भले ही थक जाय लेकिन पालना अपनी पूर्व गति के कारण चलता रहता है। उसी
प्रकार अविद्या का नाश होने पर भी प्रारब्ध तो शेष रहता ही है। उसी शेष प्रारब्ध से मुक्तों का देह चलता रहता
है। शरीर के ही कारण छाया हिलती है किन्तु शरीर छाया से भिन्न ही रहता है। इस प्रकार मुक्तों का देह मिथ्या
होता है और वह प्रारब्ध के सहारे व्यवहार रहता है। पुरुष के साथ जो छाया रहती है वह किसी कारण से नहीं
बल्कि सहज ही रहती है। उसी प्रकार ज्ञाता के साथ देह भी मिथ्या रहता है। जिस प्रकार जमीन पर पड़ा हुआ
पत्ता हवा के योग से हिलता है, उसी प्रकार देह भी पूर्व कर्म के अनुसार व्यवहार करता है। लेकिन ज्ञाता देहकर्म
के स्पर्श से मलिन नहीं होता। भले ही वह प्रारब्ध के अधीन रह कर पूरे संसार के साथ बातें करता रहे अथवा
मौन साध कर आनन्दपूर्वक गिरि कंदराओं में पड़ा रहे। भले ही वह सारे कर्म करे अथवा भ्रम के कारण पागल
हो जाये लेकिन वह प्रारब्ध के कारण प्राप्त स्थिति के अनुसार आचरण करता रहता है। वह पालकी में रहे
अथवा हाथी के गंडस्थल पर विराजमान हो या विष्टामूत्र में पड़ा रहे वह उसे स्थिति प्रारब्ध के कारण ही मानता
है। जिसमें बाध्य और बाधकता समाप्त हो जाती है, अहंकार की अविद्या समाप्त हो जाती है, उसकी उस स्थिति
को ही 'स्वभावसिद्ध समाधि' के नाम से जाना जाता है। सभी सिद्धान्तों का यही सारांश है। जिसे इस प्रकार की
प्राकृतिक समाधि अवस्था प्राप्त होती है वही सारे भोग भोग कर अभोक्ता बना रहता है और सारे कर्म करके भी
अकर्ता बना रहता है। वह क्रिया और कारण के संयोग से विषयोपभोग में लिप्त दिखायी देता है लेकिन इससे
उसकी समाधि अवस्था भंग नहीं होती। भोगों का भोग करते हुए भी वह अलिप्त ही रहता है। उसकी स्त्री उसे
मेरा पति कहती है, पुत्र उसे मेरा पिता कहता है शिष्य उसे 'मेरा सच्चा गुरु' कहता है। किन्तु वह इन सारे
सम्बन्धों से दूर रहते हुए भी उन सब में विचरण करता रहता है। अथवा जिस प्रकार लकड़ी से ही अग्नि उत्पन्न
होती है, लकड़ी में ही रहती है लेकिन यदि कोई कहे कि लकड़ियाँ उसे अपने अधीन रखती हैं तो वह उनके
नियंत्रण में नहीं रहतीं अथवा जो फूँकने से ही प्रकाश देने लगता है, जो फूँकने से ही उत्पन्न होता है वही दीपक
फूँक से बचने पर सुरक्षित स्थान पर दीपक के रूप में टिक पायेगा। उसी प्रकार कर्म से उत्पत्ति होती है, कर्म से
ही परब्रह्मप्राप्ति होती है लेकिन महान योगी उस कर्म में भी निष्कर्म स्थिति में व्यवहार करते रहते हैं। वह लोगों
में भले ही गृहस्थ दिखायी दे अथवा जंगल में पागलों की तरह नाचता फिरे या एकांत में शान्त पड़ा रहे लेकिन

तेरहवाँ अध्याय ३९१
उसकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। सिंहासन पर बैठने से उसे जो राजत्व प्राप्त होता है वह बगीचे में
खेलते समय भी कायम रहता है और शिकार खेलते समय शिकार का पीछा करते हुए भी बना रहता है। राजा
जंगल में भी जाकर रहे तो भी उसके राजभोग वहाँ पहुँच जाते हैं। वहाँ राजा की सत्ता समाप्त हो जाती है यह
कोई मूर्ख भी स्वीकार नहीं करेगा। उसी प्रकार योगी स्वस्वरूप पर पहुँच कर प्रारब्ध की अवस्था के अनुसार
अनेक प्रकार के कर्म करते हुए दिखायी देते हैं लेकिन इससे उनकी आत्मस्वरूप स्थिति नहीं बिगड़ती। समाधि
लगना या समाधि टूटने का अनुभव केवल अधूरे ज्ञानी को ही होता है। परिपूर्ण ज्ञानी के ये लक्षण नहीं होते।
क्योंकि जो परिपूर्ण होते हैं उनमें आत्मस्वरूप के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता। समाधि और समाधि
विसर्जन का सुख सामने आने में भी शरमाता है। अर्जुन को समाधि लगायी और तत्काल उसे घोर युद्ध में झोंक
दिया। दयानिधि श्रीकृष्ण ने उसे कभी तटस्थ (क्रियाशून्य) रखा ही नहीं। इसलिये परिपूर्णत्त्व से आत्मस्वरूप में
रममाण होते होते, समाधि लगाना और उसका विसर्जन करना यह परिश्रम तटस्थता को भी सर्वथा निगल कर
सच्ची समाधि लग पाती है। इस प्रकार जब तक प्रारब्ध चाहता है तब तक मुक्त का देह इस प्रकार आचरण
करता रहता है। लेकिन उसे अहंता की ममता पहले जैसी पीड़ा नहीं देती। जिस प्रकार स्वप्न में देह को प्राप्त
अवस्थाओं को पुरुष जागृत होने पर अपने माथे पर नहीं लेता उसी प्रकार समाधि में रहने वाला व्यक्ति देह के
कर्म अपने माथे पर नहीं लेता। यही श्रेष्ठ ब्रह्मस्वरूप स्थिति है। अनेक प्रकार के स्पष्टीकरण देकर मैंने तुम्हें
अपने गुह्यज्ञान सम्पत्ति का निरूपण सुनाया। सनकादिकों ने पूछा था, 'तुम कौन?' उन्हें बताने के लिये तथा
उनका विश्वास दृढ़ करने की दृष्टि से मैंने अपने आत्मस्वरूप का निरूपण किया।
मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत् सांख्ययोगयोः।
जानीत माऽऽगतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥ ३८ ॥
इस प्रकार अत्यन्त गुह्य, श्रेष्ठों में श्रेष्ठ उपनिषद का भण्डार तथा योगियों के योगमार्ग का रहस्य मैंने तुम्हें
बताया। जिस ज्ञान के लिये मुमुक्षु लोग अत्यन्त कष्ट सह कर सहस्रों साधन करते हैं और जिसके लिये योगी
गिरि कन्दराओं में रहकर आसन मुद्रा आदि करते हैं, जिसके आगे वेदशास्त्रों की सारी युक्तियाँ असमर्थ सिद्ध हुई
वह आत्मज्ञान मैंने यथार्थ रूप में तुम्हें बताया। इतना ज्ञान देने वाला ज्ञानवक्ता मैं कौन हूँ? यह बिल्कुल मालूम
नहीं होगा। तो समस्त यज्ञों का यज्ञभोक्ता जो विष्णु है वह मैं हूँ इसे ध्यान में रखिये। मेरे यहाँ आने का कारण
यही है कि आपने ब्रह्मदेव से जो प्रश्न किया था उस ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने के लिये मैं यहाँ स्वयं आया हूँ।
जिस उपदेश में वर्णाश्रमधर्म की पद्धति छोड़े बगैर मेरा दर्शन होता है, वह बात भी ध्वनित की गयी है। ब्राह्मण
धर्म छोड़ कर, फिर सन्यासग्रहण करना चाहिये ये दोनों धर्म देह के ही हैं। किन्तु उपदेश के अनुसार मुख्य रूप
से देह ही मिथ्या रहता है। उपदेश को ही प्रमाण मानकर सनकादिकों ने अभी तक ब्राह्मण धर्म नहीं छोड़ा फिर
भी उन्हें मेरा गुह्य ज्ञान प्राप्त हुआ और सचमुच उसी उपदेश से नारद भी ब्राह्मण के ही रूप में रहते हैं और
आत्मानंद में निमग्न होकर नाचते गाते ब्रह्मानन्द में डोलते रहते हैं। अपना वही चैतन्यधनस्वरूप वे स्वयं अपनी
महिमा प्रकट करने के लिये वर्णन कर रहे हैं।
अहं योगस्य सांख्यस्य सत्यस्यर्तस्य तेजसः।
परायणं द्विजश्रेष्ठाः श्रियः कीर्तेर्दमस्य च॥ ३९॥
सांख्य नाम का श्रेष्ठ ज्ञान, अष्टांगादि साधनों से सिद्ध होने वाला योग अथवा सत्य का सत्यत्त्व वही मेरा

३९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सच्चा स्वरूप है। देखो! जिस सत्य में संत सद्धर्म से आचरण करते हैं अथवा इच्छारहित जो वाणी होती है वह
भी मुझसे भिन्न नहीं हो सकती। तेज की वह प्रगल्भता मेरे ही कारण प्रकाशित हुई है। अथवा लक्ष्मी को जो
ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है वह सचमुच मेरे ही कारण से है। साधु लोग कीर्ति को जो सम्मान देते हैं वह मेरे कीर्तन के
कारण ही प्राप्त होती है। मेरे सिवा उस कीर्ति को कोई स्वीकार नहीं करेगा। निग्रहता मेरे ही प्रभाव से सब से
निग्रह कराती है। मेरे सामर्थ्य से वे अदम्य का भी नमन करते हैं। ध्येय और ध्यान; अथवा साध्य और साधन;
इन सब के लिये आश्रय का स्थान मैं ही हूँ। मेरे सिवा उन्हें कार्य की प्रेरणा कैसे मिलेगी ? आप अत्यन्त श्रेष्ठ
ब्राह्मण हैं, आप मेरे लिये भी पूज्य हैं इसलिये मेरा शुद्ध आत्मज्ञान आपको स्पष्ट रूप से बताया।
मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।
सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणाः ॥ ४० ॥
वास्तव में मैं इच्छारहित तथा निर्गुण हूँ। मेरे गुणों की कल्पना से मेरी भक्ति कर वे मुझे सुहृद, आत्मा, प्रिय
आदि लक्षण लगाते हैं। समता और निःसंगता आदि गुणों की अवस्थाएँ भी मुझे लगाते हैं। जरा देखो! क्या कभी
अन्धकार अपनी पराक्रमी सेना लेकर सूर्य का मुकाबला करने के लिये खड़ा हुआ है ? फिर भी वह जिस प्रकार
सूर्य को अन्धकार का विनाश कह कर महिमा मण्डित करता है या क्या कभी किसी ने घर में आकाश को भरने
का प्रयास किया है ? फिर भी घर के ही कारण आकाश को घटाकाश यह नाम प्राप्त हुआ है। चन्द्रमा घर को
स्पर्श नहीं करता सदा आकाश में ही रहता है फिर भी घर चन्द्रमा को घटचन्द्र बनाता है और मूर्ख उसी को सच
मान लेते हैं। फिर भी, मैं निर्गुण होते हुए वे मेरे गुणों की कल्पना से भजन कर मुझे सुहृद, आत्मा, असंग आदि
विशेषणों से अलंकृत करते हैं। मैं गुणों को स्पर्श भी नहीं करता फिर भी वे मुझे लीलाधारी कहते हैं। इस प्रकार
गुण ही गुणों के पास रहते हैं, मुझ पर केवल आरोप लगता है। अतः मैं न लेने वाला हूँ, न देनेवाला हूँ। मैं न
कर्ता हूँ न करवाने वाला। मेरा यह स्वभावधर्म है। अन्य अवस्था गुणों की है। इस प्रकार ज्ञान और विज्ञान का
जो पहले से चला आ रहा विलक्षण स्वरूप है उसका उपसंहार अब श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
इति मे छिन्नसन्देहा मुनयः सनकादयः।
सभाजयित्वा परया भक्त्यागृणत संस्तवैः ॥ ४१ ॥
आत्मज्ञानी, अत्यन्त कुशल, मुमुक्षुओं में अत्यन्त श्रेष्ठ सनकादिक सन्देहयुक्त हो गये थे। मैंने उन्हें इस
प्रकार निःसन्देह किया वे सदा सावधान, शुद्ध, मेरे भजन के प्रति प्रेमभाव रखने वाले, निरन्तर मत्स्वरूप में
रहकर मनन करने वाले और उपदेश सुनने से कभी न ऊबने वाले थे। मेरा यह उपदेश सुनते ही वे तत्काल मेरे
गले लग गये और तत्काल मत्स्वरूप हो गये। ऐसे वे ब्रह्मपुत्र संसार में अत्यन्त धन्य हैं। मेरे उपदेश के कारण
उन्होंने दृश्य, द्रष्टा और दर्शन इस त्रिपुटी का शून्य कर डाला और वे पूर्णरूप से ब्रह्मस्वरूप हो गये। उन्हें
अत्यन्त समाधान प्राप्त हुआ और उन्होंने गद्य-पद्य में मेरा स्तवन कर मेरी पूजा प्रारम्भ कर दी।
तैरहं पूजितः सम्यक् संस्तुतः परमर्षिभिः ।
प्रत्येयाय स्वकं धाम पश्यतः परमेष्ठिनः ॥ ४२ ॥
यद्यपि उनकी पूज्यता और पूजकता ये वृत्तियाँ नष्ट हो गयी थीं फिर भी उन्होंने गुरु की पूजा की। द्वैत का
भ्रम त्याग कर उन्होंने परम भक्तिभाव से मेरी पूजा का प्रारम्भ किया। शिष्य भले ही ब्रह्मस्वरूप हो जाय लेकिन

फिर भी उसे गुरु तो पूज्य है ही। सद्गुरु सचमुच ही परिपूर्ण ब्रह्म है यह बात सनकादिकों ने भी मान ली।
जिनके शब्दों रो सब ब्रह्मस्वरूप होकर रहता है उन पूज्य सद्गुरु के चरणों का वर्णन मैं किन शब्दों में करूँ?
परब्रह्म जिसे प्राप्त होता है वही सद्गुरु की पूज्यता जानता है ? इतरों की समझ में वह बात नहीं आती। शब्दों से
बताने पर वह केवल अनुमान मात्र होता है। अस्तु ! वे सब सनकादिक मेरी यथासांग पूजा कर बार-बार मेरा
स्तवन करने लगे और नम्रतापूर्वक मेरे चरणों पर गिर गये। मेरे भजन में वे सब एकदिल से तल्लीन हो गये मेरी
भक्ति से वे अत्यन्त भक्तियुक्त हो गये तो मुझ निरन्तर पूर्णकाम को भी उनकी पूजा से सन्तोष प्राप्त हुआ। फिर
उन्होंने प्रदक्षिणा की और मेरे चरणों को नमस्कार किया। मेरे भाषण के गहन अर्थ से उन ब्राह्मणों को अत्यन्त
सन्तोष प्राप्त हुआ। ब्रह्मदेव यह सब देख रहे थे और सनकादिक वहीं खड़े थे तभी उनके सामने मैंने निजधाम
के लिये प्रस्थान किया। उद्धव ! इस प्रकार सनकादिक मेरे शिष्य बन गये हैं इसे ध्यान में रखो। वही अलौकिक
इतिहास मैंने तुम्हें संक्षेप में बताया। योगियों में अत्यन्त श्रेष्ठ, भक्तों में अत्यन्त श्रेष्ठ ज्ञाताओं में अत्यन्त अधिकारी
पुरुष सनकादिक मेरे सर्वोत्तम शिष्य हैं। 'हंसगीत निरूपण' नाम से प्रसिद्ध जो पुरातन ब्रह्मज्ञान था वह श्रीकृष्ण
ने प्रसन्न होकर उद्धव को सुनाया। भागवत धर्म का आचरण करते हुए यह पुरातन ब्रह्मकथा एकनाथ को
एकादशस्कंध का अवलोकन करते समय साज हाथ लगी। हंस के मुख से निकले वे ज्ञानरत्न जो सनकादिकों को
अलंकारों के रूप में प्राप्त हुए उनसे श्रीकृष्ण ने उद्धव का श्रृंगार किया और उनमें से जो बचे उन्हें श्रीगुरु जनार्दन
ने मुझे सौंपा। लेकिन यह बात सत्य नहीं है क्योंकि सनकादिक व उद्धव को हुए अनेक दिन व्यतीत हो गये।
इसलिये यह व्यर्थ की बकवास है ऐसा शायद आप कहेंगे लेकिन भगवान ने शंखासुर का कृतयुग में संहार किया
था किन्तु जो भाग्यवान है उसे आज भी वहाँ दाहिने शंख प्राप्त होते हैं। रामचन्द्रजी ने बहुत पहले अयोध्या में
बहुत बड़ा यज्ञ किया था लेकिन उस स्थान पर आज भी यज्ञद्रव्यों का बचा हुआ भाग मिलता है। उसी प्रकार
यहाँ भागवत में जनार्दन गुरु की कृपा से सनकादिकों के ज्ञानरत्न से बचे हुए ज्ञान की प्राप्ति मुझे एकादशस्कंध
के अर्थ के रूप में प्राप्त हुई। पीछे हो या आगे लेकिन सर्वत्र परब्रह्म ही भरा हुआ है। यही एकादश स्कंध का
विचार है। इसी कारण से सनकादिक और उद्धव के ज्ञानरत्न का अवशेष हमें भी प्राप्त हुआ। जब तक आज्ञा
प्राप्त न हो तब तक समर्थ जन भी गया में श्राद्ध कर्म नहीं कर सकते हैं लेकिन उसी पद पर यदि कोई मक्खी
बैठी हो तो उसका निवारण कोई नहीं कर सकता। उसी प्रकार अनेक प्रकार के शास्त्रों का विचार कर थक जाने
पर बड़े-बड़े साधकों को भी जिस ज्ञानशेष की प्राप्ति नहीं होती वह हमें इस एकादशस्कंध से हुई। हंस, कृष्ण
और जनार्दन ये नाम भले ही भिन्न हों लेकिन स्वरूप एक है। उसी ने यह बोधरूपी अंजन डाल कर यह प्राचीन
निधि दिखा दी। वहाँ मैं एक एकनाथ देखने वाला और वह एक मुझे दिखलाने वाला यह बोध और यह
बोधकता भी नहीं रहती। क्योंकि देखने वाला और दिखलाने वाला एक ही है। दर्पण सामने लाने पर उसमें चेहरा
दिखाई देता है और दूर हटाने पर अदृश्य हो जाता है। लेकिन वह चेहरा न कहीं आता है न जाता है। वह
स्वभावतः जहाँ है वहीं रहता है। देखने वाला यह नहीं कहता कि दर्पण के साथ चेहरा भी चला गया क्योंकि वह
जानता है कि चेहरा जहाँ था वहीं है। उसी प्रकार अज्ञान से जो गया वह ज्ञान होने पर वापस आये ऐसा परब्रह्म
में नहीं होता। परब्रह्म स्वाभाविक रूप से वैसा ही है। उसी प्रकार देखने वाला और दिखानेवाला ये दोनों चले
जाते हैं और वहाँ मेरा जो मूलतत्त्व था वही जनार्दन ने मुझे दिखाया। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से सूर्य के ही
कारण सूर्य दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरे आत्मप्रकाश से मैं ही स्वयं को देखता हूँ। ऐसे स्थान पर नया ज्ञान
और नया पुराना ज्ञान कैसा? दीर्घकाल से रखे हुए सुवर्ण को सड़ा हुआ कौन कहेगा? कल का ही सूर्य आज

३९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उदित हुआ उसे बासी कौन कहेगा ? आज का अग्नि यदि शुद्ध है तो क्या कल का अशुद्ध रहा ? उसी प्रकार
सनकादिकों का ज्ञान मराठी भाषा में लाने के लिये यदि कोई दोष देता है तो वह स्वयं दोषी होगा। सुवर्ण का
कुत्ता बनाया जाय तो वह कीमत में कम नहीं होगा उसी प्रकार सनकादिकों का ज्ञान लोक भाषा में लाने से वह
हीन नहीं होगा। जैसे गुड़ का करैला बनाने से वह कडुवा नहीं होता उसी प्रकार हंसगीत मराठी में लाने से
उसका अर्थ बदल नहीं जाता। मुकुट के सुवर्ण का जो मूल्य रहता है वही मूल्य सुवर्ण के श्वान का भी होता है।
ग्राहक दोनों का समान मूल्य देता है। उसी प्रकार जो आत्मानुभवी होंगे वही इस ग्रन्थ का सम्मान करेंगे और जो
आत्मानुभवी नहीं होंगे वे इसकी निन्दा करेंगे। हमारे लिये दोनों ही ब्रह्मस्वरूप हैं। आत्मानुभव का यही सच्चा
अनुभव जनार्दन ने हमें दिलाया है। एका जनार्दन की शरण जाते ही जिस प्रकार नमक समुद्र में मिलाने पर स्वयं
समुद्र रूप हो जाता है, उसी प्रकार एका और जनार्दन एक हो गये यह कौन कहेगा ? आँख का देखने का अपना
धर्म होता है जो स्वयं उसकी आँखों को मालूम रहता है। आँखों का समर्थ दर्शन, आँख ही स्वयं जानती है।
आँखों से दर्पण दिखायी देता है तो आँख को ही आँख दिखायी देती है। उसी प्रकार यह ज्ञान है। जिसे दृष्टि हो
वही दृश्य देखे। अपना अकेलापन छोड़कर एकनाथ जनार्दन की शरण में आया यहीं हंसगीत का निरूपण समाप्त
हुआ।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे टीकायां
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे हंसगीत निरूपण नाम त्रयोदशोध्यायः ॥ १३ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु

चौदहवाँ अध्याय

हे स्वामी ! सद्गुरु ! मेरा तुम्हें प्रणाम ! तुम स्वयं ही क्षीरसागर हो। तुम्हारे ज्ञानरूप चन्द्रमा का उदय होने से
प्रत्येक जीव प्रसन्न हो उठता है। जिस चन्द्रमा के सितारों ने हृदयाकाश को प्रकाशित कर घनघोर अज्ञानरूपी
अन्धकार के ताप दूर किये, जिस चन्द्रमा के चन्द्रकिरण तृषाकांत चकोरों के लिये स्वानंदामृत का स्राव कर उन्हें
सहज ही तृप्त करते हैं, अविद्यारूपी अँधेरे में अन्धकाररूपी बन्धनों से जीवों के जो देहरूपी कमल कुम्हलाये
रहते हैं वे जिसके किरणरूपी ज्ञान से आनन्द से मुदित होते हैं, जिस चन्द्रमा का दर्शन होने से जीव के
अंतःकरण में आनन्द होता है और जो अहंकार रूपी चन्द्रकान्त मणियों का तत्काल विलय कर देता है। पूर्णिमा
के दिन पुत्र (शिष्य) के पूर्णत्त्व से पूर्ण वृद्धि हुई यह देखकर क्षीरसागर में ज्वार आता है फिर भी उसके
गुरुगौरव की मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता। अद्वयानुभव के कारण अंतःकरण में आत्मानन्द बढ़ता ही रहता है।
सद्गुरुरूप क्षीरसागर अत्यन्त गहरा है। उसकी ओर आदरपूर्वक देखने से उस पर हिलोरें मारने वाली वेदांतरूपी
लहरों में शब्दरूपी ज्ञानरत्न दृष्टिगोचर होते हैं। उसमें विश्वासरूपी मंदराचल पर्वत तथा वैराग्यरूपी वासुकी के
रूप में मथनी को बाँधने वाली डोर, इनकी सहायता से निजधैर्यरूपी देव-दानव समसमान भाव से क्षीरसागर का
मंथन करने के लिये तत्पर रहते हैं। उस मंथन की पहली ही खेप में लय, विक्षेप आदि कालकूट उत्पन्न हुए और
विवेकरूपी महादेव ने आत्मदृष्टि से उन्हें अपने ही गले में निगल लिया। फिर अभ्यास की पुनरावृत्ति से सारे
कर्मों को विश्राम मिला उस समय श्रीकृष्ण जिसके वश हुआ, वह आत्मशान्ति रूपी लक्ष्मी प्रकट हुई। फिर वहाँ
ब्रह्मरस और भ्रमरस इन दोनों से भरा हुआ अमृत कलश जो देव-दानवों को समान रूप से प्रिय है, वह धीरे-धीरे
उस मंथन से बाहर निकला। उसी का बँटवारा करने के लिये श्रीहरि ने मोहिनी रूप लिया और अहंकाररूपी राहु
का शिरच्छेद कर देवताओं को तृप्त किया। वह वृत्तिरूप मोहिनी तत्काल रूप बदल कर नारायण स्वरूप हो
गयी। पहले की देहबुद्धि उसमें नहीं रही। क्षीरसागर का वह नारायण आज भी स्वयं समाधिरूप शेषशयन कर
सुखपूर्वक अत्यन्त संतुष्ट होकर अभी तक लेटा हुआ है। इस प्रकार सद्गुरु ज्ञानरूपी समुद्र है। नारायण आदि
अनेक अवतार सचमुच जिसके कारण उत्पन्न होते हैं, ऐसे उस सद्गुरु का अंत वेदों की भी समझ में नहीं आता।
जिसके सुन्दर ज्ञानरूपी रत्न शंकर और विष्णु के गले में तथा मुकुट पर शोभा बढ़ाते हैं और जिसका वेदपाठों ने
तथा महान कवियों ने वर्णन किया है ऐसे अत्यन्त गम्भीर सुखसागर ! जनार्दन ! अनंत, रूप धारण करने वाले तथा
जिसका अन्त मालूम नहीं हो पाता ऐसे देवता। तुम्हारे परे की वस्तु को कौन जानता है ? विचार की दृष्टि से भी
वह नहीं दिखायी देता, वेद भी उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकते तो मेरी मराठी उसका वर्णन करने में
किस प्रकार समर्थ होगी ? देखो ! सार्वभौम राजा के मस्तक पर कोई नहीं बैठ सकता। लेकिन मक्खी को वहाँ
बैठने में कोई कठिनाई नहीं होती। अथवा रानी के स्तन कौन देख सकता है ? लेकिन उसका बालक बड़े प्रेम से
स्तनपान करता है। उसी प्रकार मेरी यह मराठी भाषा भी जनार्दन कृपा के सामर्थ्य से आत्मज्ञान के गले लग कर
ब्रह्मा की भी बातें कर रही है। अस्तु आकाश घट के अन्दर और बाहर व्याप्त रहता है उसी प्रकार शब्दातीत
परब्रह्म शब्दों में ही रहता है। इसलिये प्रस्तुत प्रसंग में व्यर्थ के शब्द घुसाने के लिये स्थान ही नहीं बचा है।
बालक बोलना नहीं जानता इसलिये उसका पिता स्वयं बातें कर उससे बातें कराता रहता है। इस बात को भी

३९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसी प्रकार समझना चाहिये क्योंकि मेरी वाणी को स्वर देने वाला जनार्दन है। उस जनार्दन की कृपादृष्टि से
भागवत देशी भाषा में सुना रहा हूँ। सहस्त्रों ग्रन्थों का अध्ययन करने के उपरान्त भी उनमें भागवत का ज्ञान
दृष्टिगोचर नहीं होता। वही यह श्रीमद्भागवत है। उसमें का 'हंसगीत' नाम का जो ज्ञान है उसे जनार्दन की कृपा
से देशी भाषा में सुनाया। एकनिष्ठा से मेरी भक्ति करने से ज्ञानरूप खड्ग की प्राप्ति होती है और उसी शस्त्र से
संसार की आसक्ति को छेद कर मेरे भक्तों को सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है। मेरे भजन से ही मोक्ष प्राप्त होता है
यह बात उद्धव ने भगवान से सुन रखी थी। उसने मन में विचार किया कि भगवान भजन को ही मोक्ष का साधन
बताते हैं लेकिन ज्ञानी लोग मोक्ष प्राप्ति के लिये भिन्न-भिन्न साधन बताते हैं। तो इन दोनों प्रकारों में मोक्ष प्राप्ति
का श्रेष्ठ साधन क्या है ? वही शंकायुक्त प्रश्न उद्धव ने स्वयं ही श्रीकृष्ण से पूछा।
उद्धव उवाच
वदन्ति कृष्ण श्रेयांसि बहूनि ब्रह्मवादिनः ।
तेषां विकल्पप्राधान्यमुताहो एकमुख्यता ॥ १ ॥
उद्धव ने कहा, हे श्रीकृष्ण ! मोक्षमार्ग के कितने साधन हैं ? वेद वाले तो अनेक साधन बताते हैं। क्या वे
साधन समान योग्यता के हैं कि उसमें एक श्रेष्ठ और एक गौण है ? आपने तो मुक्ति के लिये भक्ति का ही कारण
बताया था।
भवतोदाहृतः स्वामिन् भक्तियोगोऽनपेक्षितः ।
निरस्य सर्वतः सङ्गं येन त्वय्याविशेन्मनः ॥ २॥
भक्त अन्य साधनों की आशा ही नहीं करते। सारे संगों का त्याग करते हैं क्योंकि जिसके योग से तत्काल
आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है ऐसी भक्ति ही मोक्षमार्ग में प्रमुख है। मेरे स्वरूप पर ध्यान रखकर फल की आशा
छोड़ मेरा भजन करना यही मोक्ष का मुख्य साधन है यह बात भगवान ने स्वयं ही कही थी। भगवान ने तो भक्ति
को ही मुख्य साधन बताया था अतः अन्य साधनों से आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है या नहीं यह ईश्वर स्वयं ही
बतायें। इसी प्रश्न का विचार कर भगवान श्रीकृष्ण विवरण के साथ कहने लगे। उन्होंने कहा-ज्ञाता का स्वभाव
त्रिगुणात्मक होने के कारण वह अपनी रुचि के अनुसार साधन स्वीकार करता है। जिस गुण में उसकी रुचि होती
है उसी साधन को वह ठीक मानता है। ज्ञान का अभिमान करने वाले इस प्रकार अनेक साधनों की बातें करते
रहते हैं। उद्धव ! यही परम्परा अनेक दिनों से चली आने के कारण अब मलिन हो गयी है। उसके फल क्षुद्र होते
हैं फिर भी उसी ज्ञान को वे सच्चा मानते हैं। उसका स्पष्ट रूप से श्रवण करो। चौदहवें अध्याय का प्रतिपादन
करते समय श्रीकृष्ण विस्तारपूर्वक इस विषय का निरूपण करेंगे कि ध्यानयोगस्थिति तथा समाधि से युक्त जो
भक्ति है वही सभी साधनों में प्रमुख है। अन्य साधनों में फल की इच्छा रहती है इसलिये वे तुच्छ हैं। इसे
श्रीकृष्ण सात श्लोकों में, अपनी वाणी में सुना रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता ।
मयाऽऽदौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मकः ॥ ३ ॥
मेरी वेदवाणी स्पष्ट है। ज्ञानरूपी प्रकाश से वह अत्यन्त उज्ज्वल हो गयी है। प्रलयकाल में जब सत्यलोक

चौदहवाँ अध्याय ३९७
जल कर भस्म हो गया तभी वह नष्ट हो गयी। उस प्रलय में जब ब्रह्मदेव का नाश हो गया तब सच्ची वेदवाणी
सुनाने वाला कोई शेष न रहा। वह पूरी की पूरी डूब गयी। कल्प के प्रारम्भ में वही वेदवाणी मैंने ब्रह्मदेव के
सामने प्रकट की। उसमें मैंने मेरी भक्ति का वर्णन यथार्थ रीति से किया है। वाणी का अनुसंधान जो मेरे स्वरूप में
ही सन्तोष प्राप्त करता है ऐसा वह आत्मज्ञान मैंने ब्रह्मदेव को सुनाया।
तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा।
ततो भृग्वादयोऽगृह्णन् सप्त ब्रह्ममहर्षयः ॥ ४॥
उस समस्त वेद का विचार कर ब्रह्मदेव ने पहले मनु को उपदेश दिया, फिर उस मनु से ही सात ऋषियों ने
सम्पूर्ण वेद प्राप्त किया। ब्रह्मदेव ने दक्षादि प्रजापतियों को भी उसी रीति से उपदेश किया। फिर उनसे और
कितने लोगों को वह ज्ञान सम्पत्ति प्राप्त हुई उनकी संख्या बताना सम्भव नहीं है। सप्तऋषियों के नाम पूछोगे तो
वे हैं—भृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और ऋतु ये सच्चे ऋषि हैं।
तेभ्यः पितृभ्यस्तत्पुत्रा देवदानवगुह्यकाः।
मनुष्याः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरचारणाः ॥ ५॥
किंदेवाः किन्नरा नागा रक्षःकिम्पुरुषादयः।
बह्व्यस्तेषां प्रकृतयो रजःसत्त्वतमोभुवः ॥ ६॥
उन अत्यन्त महान ऋषीश्वरों ने पुत्र, पौत्र, नर, किन्नर, देव, दानव, सिद्ध, विद्याधर, चारण, गुह्यक, गन्धर्व,
राक्षस, किंदेव और किंपुरुष आदि अनेकों को उपदेश किया। इतना ही नहीं, अपितु नाग-सर्पादि-तामस योनियों
में भी वह उपदेश परम्परा से प्राप्त हुआ। मुँह के आकार से जो मनुष्य की तरह दिखायी देते हैं किन्तु बाकी
शरीर पशु जैसा होता है ऐसे जो बड़े-बड़े भालू होते हैं उन्हें किंनर कहते हैं और मुँह पुरुष जैसा लेकिन शेष
शरीर चौपायों का ऐसे जो राम के सेवक वे हैं वानर, उन्हें किंपुरुष कहते हैं। पसीना, दुर्गन्ध तथा मलरहित
जिनके बड़े-बड़े भव्य शरीर दिखाई देते हैं और जो मनुष्य तथा देवताओं की तरह दिखायी देते हैं, उन्हें 'किदेव'
कहते हैं। ऐसे नाना प्रकार के व्यक्ति रज, तम अथवा सत्त्वप्रकृति के अनुसार उपदेश प्राप्त होने के कारण
अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार ज्ञान देते रहते हैं।
याभिर्भूतानि भिद्यन्ते भूतानां मतयस्तथा।
यथाप्रकृति सर्वेषां चित्रा वाचः स्रवन्ति हि ॥ ७॥
जिस गुण की प्रकृति होती है, उसी गुण का स्वभाव होता है। जैसा गुण होता है, वैसी ही वासना होती है।
समस्त प्राणिमात्र में जो कम या अधिक भेदभाव उत्पन्न हुआ है वह उस वासना के ही कारण हुआ है। देवत्व,
मानवता अथवा कीटक योनि ये सब वासना के ही प्रकार हैं। वह वासना ही अपनी रुचि के अनुसार प्राणियों में
अनेक प्रकार के भेद उत्पन्न करती है। जिनकी जैसी प्रकृति होती है, उसके अनुसार वे वेद का वैसा ही अर्थ ग्रहण
करते हैं। शिष्यों को वे उसी परम्परा से उपदेश देते हैं। वेद का विचित्र अर्थ लगाना और उसे ही सच मानकर
चलना, गलत साथ करना, गलत साधन रखना तथा विचित्र उपदेश करना यह सब प्रकृति के गुणों का मतभेद है।
एवं प्रकृतिवैचित्र्याद् भिद्यन्ते मतयोर्नृणाम्।
पारम्पर्येण केषांच्चि पाखण्डमतयोऽपरे ॥ ८॥