श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 403, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ३८७
संभोग में है ? यह गधे में है या सर्प में है ? या यह शरीर में ही है ? यह स्वयं उसे याद नहीं रहता। यह काशी
में है या कैकट देश में है ? यह नरक में है या वैकुण्ठ में है ? यह घर में है या गिरिकंदरा में है ? अथवा यह
एकान्त में ध्यानमग्न है ? यह भी उसे स्मरण नहीं आता ? इसकी लोगों ने पूजा की है या इसे छला है ? उसे
पकड़ा है या मारा है ? यह देह में एकरूप हुआ या इसका क्या हुआ ? उसे यह स्मरण नहीं आता। मैं शेष पर
सोया हुआ हूँ या किसी भिखारी के घर में हूँ। क्या मैं सूली पर बैठा हुआ हूँ। इसका भी उसे शायद स्मरण नहीं
होता। ऐसे ज्ञाताओं की निरभिमानता मैं सचमुच नहीं बता सकता। जो मेरे ही पद पर पहुँच गये उनका चरित्र
बताना सम्भव नहीं है। जहाँ वेद भी मौन हो जाते हैं, स्वर और वर्ण के साथ वाणी भी डूब जाती है उन महान
संतों का गुणवर्णन मुझसे नहीं किया जाता। ज्ञाताओं की यह स्थिति देखकर शायद आप मन में यह विचार करें
कि उनमें जड़त्व और मूढ़त्त्व आ गया है। उनमें किसी भी प्रकार की स्फूर्ति नहीं उपजती। जिस प्रकार शुद्ध
पाषाण रहता है, वैसा ही उनका अंतःकरण हो जाता है क्योंकि उनमें किसी भी बात का स्फुरण नहीं होता। फिर
ज्ञातापन कैसा होता है ? यदि आपकी ऐसी शंका हो तो उसका निराकरण भी ध्यान देकर सुनें। ज्ञान और अज्ञान
की भूमिकायें लोगों के लिये सचमुच अतर्क्य हैं। जो शुद्ध ज्ञान होता है और जो जड़ मूढ़ अज्ञान होता है उन
दोनों की अवस्था एक जैसी होती है। उनकी पहचान भी मैं जानता हूँ। घनघोर अँधेरा छाया हुआ हो, उसमें
काजल का पर्वत हो और इसे दो भागों में विभाजित करने के लिये कोई अन्धा आये वैसी ही स्थिति अज्ञान के
आचरण की है। वेदांतशास्त्र के अच्छे से अच्छे ग्रन्थ लाकर उनका संशोधन कार्य अन्धे अथवा गूँगे के हाथ
सौंपा जाय तो वह न तो देख सकता है, सुन सकता है और न बोल ही सकता है। जड़त्व के कारण अज्ञान की
भी वैसी ही स्थिति हो जाती है। अब सज्ञान की स्थिति सुनिये। उन्हें आत्मसाक्षात्कार का अनुभव होने के कारण
वे देह में भी विदेह की तरह रहते हैं। जिस प्रकार रत्न और ओला एक जैसे दिखायी देते हैं किन्तु लोग काफी
धन देकर हीरा खरीदते हैं और ओला कोई मुफ्त में भी नहीं लेना चाहता। जिस प्रकार अनाज का दाना और
उसका छिलका दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं उसी प्रकार ज्ञान और अज्ञान पास-पास ही होने के कारण दोनों एक
जैसे दिखायी देते हैं। जिस प्रकार असली सिक्का और नकली सिक्का देखने में एक जैसा होता है और पारखी
व्यक्ति ठीक पहचान कर असली सिक्का लेता है और मूर्ख व्यक्ति फँस जाता है उसी प्रकार ज्ञान और अज्ञान का
बाजार एक ही जगह लग गया है ऐसा लगता है। यदि जरा भी रास्ता चूका तो भीषण पाखण्ड माथे पर गिरेगा।
उसी प्रकार जो मेरी भक्ति के लिये आते हैं वह मेरे प्रति विश्वास के कारण स्थिर हो जाते हैं, उन्हें मैं अपना
शुद्ध और सच्चा स्वरूप प्रदान करता हूँ। मेरे नाम के प्रति विश्वास के कारण ही प्रह्लाद ने सारे द्वंद्व दुत्कार दिये।
ऐसा भक्त न भी चाहे तो मुक्ति उसके पीछे खड़ी रहती है और विश्वास के कारण ही मेरे स्वरूप से भेंट होती
है। जिस प्रकार पानी में मिलने पर नमक अपना स्वरूप खो देता है उसी प्रकार जो मेरे स्वरूप तक पहुँचते हैं वे
मेरी भक्ति के साथ मद्रूप ही होते हैं। उनका स्वतंत्र स्वरूप शेष नहीं रहता। फिर नमक को अपना स्मरण नहीं
रह जाता, वह स्वयं समुद्र बन जाता है; उसी प्रकार ज्ञानी भी मद्रूप हो जाते हैं। इस प्रकार मेरे स्वरूप तक पहुँच
कर जो देहाभिमान को भूल जाते हैं वे सबके साथ ज्ञानमय होकर आनन्दरस में लीन रहते हैं। जिस प्रकार रस्सी
में सर्प का आभास होता है और कुछ देर के बाद वह आभासरूप सर्प नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मुक्तों को
देहभावना का आभास होता है। अतः 'मैं' और 'तुम' का स्मरण कराने वाला कौन है? अंतःकरण का ही
विस्मरण हो जाने के कारण वह स्वयं ही अपने को भूल जाता है। फिर कैसा स्वर्ग और कैसा नरक ? अच्छा
किस बात का और बुरा किस चीज का ? चौदह लोक कैसे ? केवल ब्रह्मस्वरूप ही शेष रहता है। वहाँ पवित्र