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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 869 में से

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पृष्ठ 405

तेरहवाँ अध्याय ३८९
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः ।
तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ ३७॥
देह का जो भी आचरण है वह दैवयोग से ही होता है इसे ध्यान में रखो। अज्ञान में देहाभिमान रहता है जो
ज्ञाताओं में कभी नहीं होता। जिस प्रकार पूर्वसंचित कर्म रहता है, उसी प्रकार यहाँ देह उत्पन्न होता है। वह सभी
इन्द्रियों और प्राणों के साथ अगर दैवयोग से ही आचरण करता है तो आप कहेंगे कि दैवयोग से यदि वह देह में
है तो इससे देह का अहंकार अवश्य बढ़ना चाहिये। जिस प्रकार साथ-साथ चलने वाले राही परस्पर संकट
भोगते रहते हैं, लवण के मिश्रण से जल भी खारा हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञाता भी देह की संगत से देहाभिमानी
हो जायेगा। जिस प्रकार लोहे की संगत से अग्नि को भी हथौड़े के घाव सहन करने पड़ते हैं उसी प्रकार देह की
संगति से ज्ञाता भी सुख-दुःख भोगते हैं। इस प्रकार की कल्पना आप मन में कर सकते हैं किन्तु यह बात
ज्ञाताओं पर लागू नहीं होती क्योंकि वे सारा अहंभाव त्याग कर चिदानंद में ही समाधिस्त रहते हैं। 'अधिरूढ
समाधियोग' इस आशय का स्पष्ट पद है। इसका अर्थ है कि उसने आत्मज्ञान से अत्यन्त निर्दोष समाधि प्राप्त कर
ली है। वह समाधि कैसी रहती है? उसमें रहने वाला पुरुष क्या काष्ट की तरह तटस्थ रहता है या निरा पागल
हो जाता है या ज्ञानसम्पन्न रहता है? उस समाधि के सम्पूर्ण लक्षण बताता हूँ, सुनो। उसके योग से ज्ञानसम्पन्न
व्यक्ति को देह में रहते हुए भी देह के बन्धन में नहीं फँसना पड़ता। 'केवल तटस्थ होकर रहने का ही नाम
समाधि है' यह बात यदि ज्ञाता ही कहने लगें तो समझ लो उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी क्योंकि वास्तव में वह
समाधि नहीं है। ऐसी स्थिति में वृत्ति मूर्च्छाना की अवस्था में रहती है। सदा अभिमानरहित रहना इसी का नाम
अखण्ड समाधि है। लेकिन काष्ट की तरह होकर रहने का नाम समाधि कदापि नहीं है। तटस्थता को ही जो
समाधि मानते हैं उन्हें वास्तव में सच्चे स्वरूप का ज्ञान नहीं है और निश्चय का भी ज्ञान नहीं है। उनकी बातों में
केवल अनुमान रहता है। किसी भयंकर आघात से बेसुध होकर मनुष्य में लकड़ी की सी तटस्थता आ जाती है।
तो क्या उसे समाधि कहा जाय? पुरस्कार की आशा से बहुरुपिया अपना स्वांग रचते समय कभी अपनी सांस
रोक कर तटस्थता लाने का प्रयत्न करता है। लेकिन वह कोई समाधि नहीं है क्योंकि जब तक अंतःकरण में
वासना शेष है तब तक समाधि कैसे लगेगी? वह बहुरुपिया होश में आते ही कहता है, "आप उदारश्रेष्ठ हैं
अतः मुझे योग्य पुरस्कार दें।" सारे संकल्पों का जो चरम बिन्दु है उसी का नाम निर्विकल्प समाधि है। सभी
शास्त्रों ने इसे प्रतिपादित किया है। बकरी के पास साँप आता है तो वह भी सभी वृत्तियों से शून्य होकर तटस्थ हो
जाती है। लेकिन वह समाधि नहीं है। सहसा कोई दिव्य स्वरूप देखने पर आश्चर्य के कारण तटस्थता प्राप्त होती
है। ऐसे प्रसंग में सचमुच वृत्ति रहती ही है ऐसा समझना चाहिये। उसी प्रकार पहली ही बार आँखों को
आत्मस्वरूप दिखायी देने पर इतना अधिक आश्चर्य होता है कि सँभाले नहीं सँभलता। लेकिन उस आश्चर्य को
पेट में दबाने पर जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसी का नाम है, 'समाधि'! कल्पना जहाँ पूरी तरह नष्ट हो जाती है
वहाँ विस्मय का स्फुरण कैसे होगा? वहाँ अतिसूक्ष्म कल्पना भी नष्ट हो जाती है, इसलिये आश्चर्य भी नष्ट हो
जाता है। जिसे सचमुच ब्रह्म की ही प्राप्ति हो जाती है, उसमें देह का ही स्फुरण नहीं होता और उस समय वह
तटस्थ खड़ा है या चल रहा है यह भी दूसरों को ही देखना पड़ता है। इस प्रकार जहाँ देह ही मिथ्या होता है वहाँ
उसके लक्षण कौन देखेगा? मृगजल के स्नान से ज्ञाता को जितना संतोष प्राप्त होगा उतना ही यह भी सम्भव है।
मिथ्या देह को तटस्थता प्राप्त हो जाय उसी को समाधि की अवस्था समझा जाय इस लक्षण को सच मानकर
बड़े-बड़े ज्ञानी भी फँस गये हैं। स्वप्न में ज्ञानी बने मनुष्य को तटस्थ स्थिति प्राप्त हुई और वह स्वप्न देखने वाले