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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 869 में से

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पृष्ठ 409

फिर भी उसे गुरु तो पूज्य है ही। सद्गुरु सचमुच ही परिपूर्ण ब्रह्म है यह बात सनकादिकों ने भी मान ली।
जिनके शब्दों रो सब ब्रह्मस्वरूप होकर रहता है उन पूज्य सद्गुरु के चरणों का वर्णन मैं किन शब्दों में करूँ?
परब्रह्म जिसे प्राप्त होता है वही सद्गुरु की पूज्यता जानता है ? इतरों की समझ में वह बात नहीं आती। शब्दों से
बताने पर वह केवल अनुमान मात्र होता है। अस्तु ! वे सब सनकादिक मेरी यथासांग पूजा कर बार-बार मेरा
स्तवन करने लगे और नम्रतापूर्वक मेरे चरणों पर गिर गये। मेरे भजन में वे सब एकदिल से तल्लीन हो गये मेरी
भक्ति से वे अत्यन्त भक्तियुक्त हो गये तो मुझ निरन्तर पूर्णकाम को भी उनकी पूजा से सन्तोष प्राप्त हुआ। फिर
उन्होंने प्रदक्षिणा की और मेरे चरणों को नमस्कार किया। मेरे भाषण के गहन अर्थ से उन ब्राह्मणों को अत्यन्त
सन्तोष प्राप्त हुआ। ब्रह्मदेव यह सब देख रहे थे और सनकादिक वहीं खड़े थे तभी उनके सामने मैंने निजधाम
के लिये प्रस्थान किया। उद्धव ! इस प्रकार सनकादिक मेरे शिष्य बन गये हैं इसे ध्यान में रखो। वही अलौकिक
इतिहास मैंने तुम्हें संक्षेप में बताया। योगियों में अत्यन्त श्रेष्ठ, भक्तों में अत्यन्त श्रेष्ठ ज्ञाताओं में अत्यन्त अधिकारी
पुरुष सनकादिक मेरे सर्वोत्तम शिष्य हैं। 'हंसगीत निरूपण' नाम से प्रसिद्ध जो पुरातन ब्रह्मज्ञान था वह श्रीकृष्ण
ने प्रसन्न होकर उद्धव को सुनाया। भागवत धर्म का आचरण करते हुए यह पुरातन ब्रह्मकथा एकनाथ को
एकादशस्कंध का अवलोकन करते समय साज हाथ लगी। हंस के मुख से निकले वे ज्ञानरत्न जो सनकादिकों को
अलंकारों के रूप में प्राप्त हुए उनसे श्रीकृष्ण ने उद्धव का श्रृंगार किया और उनमें से जो बचे उन्हें श्रीगुरु जनार्दन
ने मुझे सौंपा। लेकिन यह बात सत्य नहीं है क्योंकि सनकादिक व उद्धव को हुए अनेक दिन व्यतीत हो गये।
इसलिये यह व्यर्थ की बकवास है ऐसा शायद आप कहेंगे लेकिन भगवान ने शंखासुर का कृतयुग में संहार किया
था किन्तु जो भाग्यवान है उसे आज भी वहाँ दाहिने शंख प्राप्त होते हैं। रामचन्द्रजी ने बहुत पहले अयोध्या में
बहुत बड़ा यज्ञ किया था लेकिन उस स्थान पर आज भी यज्ञद्रव्यों का बचा हुआ भाग मिलता है। उसी प्रकार
यहाँ भागवत में जनार्दन गुरु की कृपा से सनकादिकों के ज्ञानरत्न से बचे हुए ज्ञान की प्राप्ति मुझे एकादशस्कंध
के अर्थ के रूप में प्राप्त हुई। पीछे हो या आगे लेकिन सर्वत्र परब्रह्म ही भरा हुआ है। यही एकादश स्कंध का
विचार है। इसी कारण से सनकादिक और उद्धव के ज्ञानरत्न का अवशेष हमें भी प्राप्त हुआ। जब तक आज्ञा
प्राप्त न हो तब तक समर्थ जन भी गया में श्राद्ध कर्म नहीं कर सकते हैं लेकिन उसी पद पर यदि कोई मक्खी
बैठी हो तो उसका निवारण कोई नहीं कर सकता। उसी प्रकार अनेक प्रकार के शास्त्रों का विचार कर थक जाने
पर बड़े-बड़े साधकों को भी जिस ज्ञानशेष की प्राप्ति नहीं होती वह हमें इस एकादशस्कंध से हुई। हंस, कृष्ण
और जनार्दन ये नाम भले ही भिन्न हों लेकिन स्वरूप एक है। उसी ने यह बोधरूपी अंजन डाल कर यह प्राचीन
निधि दिखा दी। वहाँ मैं एक एकनाथ देखने वाला और वह एक मुझे दिखलाने वाला यह बोध और यह
बोधकता भी नहीं रहती। क्योंकि देखने वाला और दिखलाने वाला एक ही है। दर्पण सामने लाने पर उसमें चेहरा
दिखाई देता है और दूर हटाने पर अदृश्य हो जाता है। लेकिन वह चेहरा न कहीं आता है न जाता है। वह
स्वभावतः जहाँ है वहीं रहता है। देखने वाला यह नहीं कहता कि दर्पण के साथ चेहरा भी चला गया क्योंकि वह
जानता है कि चेहरा जहाँ था वहीं है। उसी प्रकार अज्ञान से जो गया वह ज्ञान होने पर वापस आये ऐसा परब्रह्म
में नहीं होता। परब्रह्म स्वाभाविक रूप से वैसा ही है। उसी प्रकार देखने वाला और दिखानेवाला ये दोनों चले
जाते हैं और वहाँ मेरा जो मूलतत्त्व था वही जनार्दन ने मुझे दिखाया। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से सूर्य के ही
कारण सूर्य दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरे आत्मप्रकाश से मैं ही स्वयं को देखता हूँ। ऐसे स्थान पर नया ज्ञान
और नया पुराना ज्ञान कैसा? दीर्घकाल से रखे हुए सुवर्ण को सड़ा हुआ कौन कहेगा? कल का ही सूर्य आज