श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ३९१
उसकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। सिंहासन पर बैठने से उसे जो राजत्व प्राप्त होता है वह बगीचे में
खेलते समय भी कायम रहता है और शिकार खेलते समय शिकार का पीछा करते हुए भी बना रहता है। राजा
जंगल में भी जाकर रहे तो भी उसके राजभोग वहाँ पहुँच जाते हैं। वहाँ राजा की सत्ता समाप्त हो जाती है यह
कोई मूर्ख भी स्वीकार नहीं करेगा। उसी प्रकार योगी स्वस्वरूप पर पहुँच कर प्रारब्ध की अवस्था के अनुसार
अनेक प्रकार के कर्म करते हुए दिखायी देते हैं लेकिन इससे उनकी आत्मस्वरूप स्थिति नहीं बिगड़ती। समाधि
लगना या समाधि टूटने का अनुभव केवल अधूरे ज्ञानी को ही होता है। परिपूर्ण ज्ञानी के ये लक्षण नहीं होते।
क्योंकि जो परिपूर्ण होते हैं उनमें आत्मस्वरूप के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता। समाधि और समाधि
विसर्जन का सुख सामने आने में भी शरमाता है। अर्जुन को समाधि लगायी और तत्काल उसे घोर युद्ध में झोंक
दिया। दयानिधि श्रीकृष्ण ने उसे कभी तटस्थ (क्रियाशून्य) रखा ही नहीं। इसलिये परिपूर्णत्त्व से आत्मस्वरूप में
रममाण होते होते, समाधि लगाना और उसका विसर्जन करना यह परिश्रम तटस्थता को भी सर्वथा निगल कर
सच्ची समाधि लग पाती है। इस प्रकार जब तक प्रारब्ध चाहता है तब तक मुक्त का देह इस प्रकार आचरण
करता रहता है। लेकिन उसे अहंता की ममता पहले जैसी पीड़ा नहीं देती। जिस प्रकार स्वप्न में देह को प्राप्त
अवस्थाओं को पुरुष जागृत होने पर अपने माथे पर नहीं लेता उसी प्रकार समाधि में रहने वाला व्यक्ति देह के
कर्म अपने माथे पर नहीं लेता। यही श्रेष्ठ ब्रह्मस्वरूप स्थिति है। अनेक प्रकार के स्पष्टीकरण देकर मैंने तुम्हें
अपने गुह्यज्ञान सम्पत्ति का निरूपण सुनाया। सनकादिकों ने पूछा था, 'तुम कौन?' उन्हें बताने के लिये तथा
उनका विश्वास दृढ़ करने की दृष्टि से मैंने अपने आत्मस्वरूप का निरूपण किया।
मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत् सांख्ययोगयोः।
जानीत माऽऽगतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥ ३८ ॥
इस प्रकार अत्यन्त गुह्य, श्रेष्ठों में श्रेष्ठ उपनिषद का भण्डार तथा योगियों के योगमार्ग का रहस्य मैंने तुम्हें
बताया। जिस ज्ञान के लिये मुमुक्षु लोग अत्यन्त कष्ट सह कर सहस्रों साधन करते हैं और जिसके लिये योगी
गिरि कन्दराओं में रहकर आसन मुद्रा आदि करते हैं, जिसके आगे वेदशास्त्रों की सारी युक्तियाँ असमर्थ सिद्ध हुई
वह आत्मज्ञान मैंने यथार्थ रूप में तुम्हें बताया। इतना ज्ञान देने वाला ज्ञानवक्ता मैं कौन हूँ? यह बिल्कुल मालूम
नहीं होगा। तो समस्त यज्ञों का यज्ञभोक्ता जो विष्णु है वह मैं हूँ इसे ध्यान में रखिये। मेरे यहाँ आने का कारण
यही है कि आपने ब्रह्मदेव से जो प्रश्न किया था उस ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने के लिये मैं यहाँ स्वयं आया हूँ।
जिस उपदेश में वर्णाश्रमधर्म की पद्धति छोड़े बगैर मेरा दर्शन होता है, वह बात भी ध्वनित की गयी है। ब्राह्मण
धर्म छोड़ कर, फिर सन्यासग्रहण करना चाहिये ये दोनों धर्म देह के ही हैं। किन्तु उपदेश के अनुसार मुख्य रूप
से देह ही मिथ्या रहता है। उपदेश को ही प्रमाण मानकर सनकादिकों ने अभी तक ब्राह्मण धर्म नहीं छोड़ा फिर
भी उन्हें मेरा गुह्य ज्ञान प्राप्त हुआ और सचमुच उसी उपदेश से नारद भी ब्राह्मण के ही रूप में रहते हैं और
आत्मानंद में निमग्न होकर नाचते गाते ब्रह्मानन्द में डोलते रहते हैं। अपना वही चैतन्यधनस्वरूप वे स्वयं अपनी
महिमा प्रकट करने के लिये वर्णन कर रहे हैं।
अहं योगस्य सांख्यस्य सत्यस्यर्तस्य तेजसः।
परायणं द्विजश्रेष्ठाः श्रियः कीर्तेर्दमस्य च॥ ३९॥
सांख्य नाम का श्रेष्ठ ज्ञान, अष्टांगादि साधनों से सिद्ध होने वाला योग अथवा सत्य का सत्यत्त्व वही मेरा